भोजशाला- ऐतिहासिक तथ्य और अकाट्य सत्य

युगवार्ता    15-May-2026
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नई दिल्ली, 15 मई (हि.स.)। राजा भोज ने अपनी राजधानी – धारा नगरी में संस्कृत के पठन-पठान के लिए भोजशाला नाम की एक पाठशाला बनवाई थी। इसे शारदा सदन, सरस्वती भवन और भोजशाला के नामा से भी पहचाना गया है। यहाँ देवी सरस्वती की एक प्रतिमा बनवाकर उन्होंने इसे तीर्थस्थान बना दिया।

उन्होंने अपनी कृति कूर्मशतक नाम के प्राकृत-काव्य और भर्तृहरि की कारिका आदि कई अन्य ग्रन्थ पत्थर की शिलाओं पर खुदवाए थे। राजा भोज के बाद उदयादित्य, नरवर्मा, अर्जुनवर्मा जैसे राजाओं ने भी इसमें वृद्धि की। इस प्रकार इस पाठशाला में लगभग 4000 श्लोकों का समूह श्याम पत्थर की बड़ी-बड़ी शिलाओं पर खुदवाया गया था।

अर्जुन वर्मा के समय की बनी पारिजात मंजरी नाटक में इस पाठशाला का नाम ‘शारदा सदन’ लिखा है। उससे यह ज्ञात होता है कि वहां बड़े-बड़े विद्वान अध्यापक हुआ करते थे।

भोज के वंशज नरवर्मा ने उस पाठशाला के स्तंभों पर अपने पूर्वज उदयादित्य के बनाये वर्णों, नामों और धातुओं के प्रत्ययों के नागबन्ध चित्र खुदवाए थे।

इस पाठशाला की लम्बाई 200 फुट और चौड़ाई 117 फुट थी। इसी के पास एक कुआं था, जो ‘सरस्वती कूप’ और अक्कलकुई कहलाता था। भोज के समय विद्या का प्रचार बहुत बढ़ जाने से लोगों की एक सामान्य धारणा हो गयी थी कि जो कोई इस कुंए का पानी पी लेता है, उसपर मां सरस्वती की कृपा हो जाती है।

राजा भोज ने अपनी इस शाला के समीप एक लोहे की लाट भी स्थापित की थी जो उनका एक विजयस्तंभ था। इसने उन्होंने दक्षिण के चालुक्यों, त्रिपुरी के हैहयों से मिली विजय के याद में खड़ा किया था।

हिजरी संवत 807 ( सन् 1405) में दिलावर खान गोरी ने इसे मस्जिद में बदल दिया। इस मस्जिद के पास ही एक लोहे की लाट है, इसलिए इसे लोग ‘लाट मस्जिद’ के नाम से भी पुकारते है। कुछ पुस्तकों में 861 हिजरी यानि 1457 में मोहम्मद खिलजी के भी यहाँ आने का उल्लेख मिलता है।

‘तुजुक जहाँगीरी’ में लिखा है कि धारा नगरी एक पुराना शहर है और यहाँ हिन्दुस्थान का बड़ा राजा भोज हुआ। देहली के बादशाह सुलतान फिरोज के लड़के सुलतान मोहम्मद के ज़माने में उम्मीदशाह गोरी, जिसका दूसरा नाम दिलावर खान था और जो मालवा का गवर्नर था, किले के बाहरवाले मैदान में जुमा मस्जिद बनवाकर उस लोहे की लाट को खड़ा कर दिया। इसके बाद जब गुजरात के सुल्तान ने मालवा पर कब्ज़ा कर लिया, तब उसने उस लाट को गुजरात ले जाना चाहा लेकिन लापरवाही से वह टूट गयी।

बाद में वहां किसी मौलाना कमरुद्दीन की कब्र बना दी गयी तो इस स्थान को मौलाकी मस्जिद भी कहा जाने लगा।

पाठशाला की शिलाओं को आक्रमणकारियों ने तोड़कर फर्श पर बिछा दिया। ऐसी लगभग 60 से 70 शिलाएं है लेकिन उस पर अब लेख नहीं पढ़े जा सकते।

राजा भोज ने चित्तौड़ के किले में भी भगवान् शिव का एक मंदिर बनवाया था। उसमें भगवान् की मूर्ति का नाम अपने नाम पर भोजस्वामीदेव रखा था। राजा भोज का उपनाम या उपाधि ‘त्रिभुवन नारायण’ था। इसलिए इस शिव-मूर्ति को त्रिभुवन नारायण देव भी कहा जाता है। यह बात चित्तौड़ से मिले विक्रम संवत 1358 के ‘श्री भोजस्वामिदेवजगति’ से सिद्ध होती है।

इस मंदिर का जीर्णोद्वार विक्रम संवत 1458 में महाराजा मोकल ने करवाया था और इस समय से इस मंदिर को ‘अदबदजी’ (अद्भुतजी) का या मोकल जी का मंदिर कहा जाने लगा।

त्रिभुवननारायण, परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर, सार्वभौम एवं मालबचक्रवर्ती जैसी अनेक उपाधियाँ राजा भोज ने धारण की थी। अपनी राजनीतिक उपलब्धियों के लिए तो वे प्रसिद्ध थे ही, साथ ही अपने सांस्कृतिक क्रियाकलापों के लिए वह और भी अधिक ज्ञात है। उन्होंने अपनी राजधानी उज्जैन से हटाकर धारा (शिप्रा के दाहिने किनारे पर) नगर में स्थापित की, जो शीघ्र ही विद्या और कला का केन्द्र तथा भारत की बौद्धिक राजधानी बन गयी।

कल्हण ‘राजतरंगिणी’ में लिखते हैं कि कश्मीर के पद्मगुप्त नामक व्यापारी ने भोज के भेजे हुए सोने से कपटेश्वर नामक एक कुण्ड बनवाया। राजा भोज की यह प्रतिज्ञा थी कि कपटेश्वर (कोटेर) के पापसूदन तीर्थ के जल से ही वह रोज स्नान करेंगे। अतः पद्मराज कांस्यकलशों में बराबर उसे उसका जल भेजते रहते थे।

भोज की सर्वाधिक प्रसिद्धि विद्वानों और कवियों को दिये गये उसके आश्रय और संरक्षण तथा निजी साहित्य-निर्माण से हुई। वह स्वयं कविराज की उपाधि से ज्ञात थे तथा अच्छी रचनाओं से प्रसन्न होकर अनेक कवियों और लेखकों को उन्होंने भी उपाधियां दीं। त्रिविक्रम के पुत्र भास्करभट्ट को उन्होंने विद्यापति की उपाधि दी। कश्मीर के एक राजा की भोज से तुलना में कल्हण कहते हैं कि दोनों ही अपने दानोत्कर्ष के कारण कविबान्धव रूप में अत्यन्त विश्रुत थे। विक्रमांकदेवच्चरित के रचयिता बिल्हण कहते हैं कि भोज की तुलना में कोई राजा था ही नहीं। उसकी दानशीलता इतनी प्रसिद्ध हुई कि आगे होने वाले मेरुतृंग और वल्लालभट्ट जैसे कवियों और फिरिश्ता जैसे मुसलमान लेखकों ने अनुश्रुति चला दी कि वह प्रत्येक श्लोक पर प्रत्येक रचयिता को एक लाख का पुरस्कार देता था। तत्त्वतः यह कथन अतिरंजित है, किन्तु इसमें सन्देह नहीं है कि भोज की अत्यधिक उदारता ही इसका आधार थी।

हिन्दुस्थान समाचार / जितेन्द्र तिवारी

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हिन्दुस्थान समाचार / पवन कुमार

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