
विदिशा, 22 जून (हि.स.)। मध्य प्रदेश के विदिशा में ग्वालियर रियासत के शासनकाल का एक दुर्लभ और ऐतिहासिक दस्तावेज सामने आया है, जिसने क्षेत्र के प्रशासनिक एवं धार्मिक प्रबंधन की पुरानी व्यवस्था की झलक प्रस्तुत की है। लगभग साढ़े तीन शताब्दी पुराने प्रतीत हो रहे इस दस्तावेज में तत्कालीन ग्वालियर राज्य द्वारा किसी देवस्थान (मंदिर एवं उससे संबद्ध संपत्तियों) के प्रबंधन और संचालन संबंधी आदेश जारी किए गए हैं।
जनसम्पर्क अधिकारी बी.डी. अहिरवाल ने सोमवार को बताया कि दस्तावेज पर ग्वालियर राज्य की आधिकारिक मुहर अंकित दिखाई देती है तथा इसमें देवस्थान की भूमि, अभिलेख, रजिस्टर और प्रबंधन व्यवस्था के संबंध में विस्तृत निर्देश दिए गए हैं। इस आदेश में उल्लेख मिलता है कि देवस्थान के सुचारु संचालन और संपत्तियों के संरक्षण के लिए जिम्मेदार व्यक्ति के कार्यों की समीक्षा के बाद प्रबंधन में परिवर्तन किया गया तथा संबंधित दस्तावेज और अभिलेख नए प्रबंधक को सौंपने के निर्देश दिए गए।
उन्होंने बताया कि इतिहासकारों के अनुसार ग्वालियर रियासत के समय मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं के संचालन के लिए विशेष प्रशासनिक व्यवस्था लागू थी। देवस्थानों की आय, भूमि और धार्मिक गतिविधियों के प्रबंधन पर राज्य का नियंत्रण रहता था तथा समय-समय पर आदेश जारी कर व्यवस्थाओं को व्यवस्थित रखा जाता था। प्रस्तुत दस्तावेज उसी प्रशासनिक परंपरा का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जा रहा है।
जनसम्पर्क अधिकारी के अनुसार, दस्तावेज में तत्कालीन सरकारी भाषा शैली और प्रशासनिक शब्दावली का भी उल्लेख मिलता है। इसमें देवस्थान, आराजी, इंतजाम, रजिस्टर और सरकार जैसे शब्द स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं, जो उस दौर की प्रशासनिक कार्यप्रणाली को दर्शाते हैं। यह आदेश केवल धार्मिक प्रबंधन का रिकॉर्ड नहीं बल्कि तत्कालीन शासन व्यवस्था, राजस्व प्रणाली और अभिलेखीय संस्कृति का भी महत्वपूर्ण साक्ष्य है।
स्थानीय इतिहास प्रेमियों और शोधकर्ताओं का मानना है कि ऐसे दुर्लभ दस्तावेज क्षेत्र के इतिहास को समझने में अत्यंत उपयोगी हैं। यदि इनका वैज्ञानिक संरक्षण, डिजिटलीकरण और अध्ययन किया जाए तो ग्वालियर रियासतकालीन प्रशासन, सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक संस्थाओं के संचालन संबंधी अनेक महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आ सकती हैं।
विशेषज्ञों ने इस प्रकार के प्राचीन दस्तावेजों को सुरक्षित रखने, उनकी उच्च गुणवत्ता की प्रतिलिपियां तैयार करने तथा अभिलेखागारों में संरक्षित करने की आवश्यकता पर बल दिया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी ऐतिहासिक विरासत से परिचित हो सकें। यह दुर्लभ दस्तावेज न केवल ग्वालियर रियासत के प्रशासनिक इतिहास का साक्षी है, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को समझने का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी माना जा रहा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर