लोकतंत्र में पद सेवा का माध्यम, विशेषाधिकार का नहीं : उपराष्ट्रपति

युगवार्ता    24-Jun-2026
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उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन बुधवार को उपराष्ट्रपति भवन में पूर्व राज्यसभा सदस्य नाबम रेबिया और सह-लेखक संदीप कुमार द्वारा लिखित पुस्तक भारत में वीआईपी संस्कृति का विमोचन करते हुए


नई दिल्ली, 24 जून (हि.स.)। उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने बुधवार को कहा कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति नागरिकों और सार्वजनिक पदों पर आसीन लोगों के बीच विश्वासपूर्ण संबंध में निहित है तथा सार्वजनिक पद को विशेषाधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए।

उपराष्ट्रपति भवन में पूर्व राज्यसभा सदस्य नबाम रेबिया और सह-लेखक संदीप कुमार द्वारा लिखित पुस्तक ‘भारत में वीआईपी संस्कृति : सत्ता, विशेषाधिकार और लोकतंत्र से दूरी’ के विमोचन समारोह को संबोधित करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि भारतीय संविधान न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित समाज की परिकल्पना करता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब सार्वजनिक जीवन में विनम्रता, जवाबदेही और जनसेवा की भावना को प्राथमिकता दी जाए।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र का सार नागरिकों और सार्वजनिक प्राधिकार से जुड़े लोगों के बीच संबंधों में निहित है। उन्होंने महान तमिल संत-कवि तिरुवल्लुवर का उल्लेख करते हुए कहा कि सच्चे नेतृत्व की पहचान उसकी सुलभता, करुणा और उत्तरदायित्व से होती है। जो नेता जनता के प्रति सम्मानजनक और सहज उपलब्ध रहते हैं, वे स्थायी विश्वास अर्जित करते हैं।

उन्होंने कहा कि पुस्तक में उठाए गए विषय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उस सोच से मेल खाते हैं, जिसमें सार्वजनिक पद को सेवा का माध्यम माना गया है। राधाकृष्णन ने वीआईपी वाहनों पर लाल बत्ती की व्यवस्था समाप्त करने और हाल में नीट अभ्यर्थियों को यातायात प्रतिबंधों से असुविधा न हो, इसके लिए प्रधानमंत्री द्वारा अपने प्रस्थान में देरी किए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे कदम नागरिक-केंद्रित शासन के उदाहरण हैं और यह सिद्ध करते हैं कि सार्वजनिक सत्ता का उद्देश्य नागरिकों की सेवा करना है।

उन्होंने प्रधानमंत्री के शब्दों को दोहराते हुए कहा, “हर भारतीय विशेष है, हर भारतीय वीआईपी है।” साथ ही उन्होंने कहा कि “सेवा ही सर्वोच्च धर्म है।”

उपराष्ट्रपति ने पुस्तक में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री सहित कई महान व्यक्तित्वों की सादगी और जनसेवा की भावना का उल्लेख किए जाने की सराहना की। उन्होंने कहा कि लेखकों ने अपने विश्लेषण को भारतीय सभ्यता और बौद्धिक परंपराओं के संदर्भों से समृद्ध किया है, जिनमें उपनिषद, रामचरितमानस, भगवान बुद्ध की शिक्षाएं और पंचतंत्र शामिल हैं।

उन्होंने गणराज्य के मूल मूल्यों के प्रति नई प्रतिबद्धता का आह्वान करते हुए कहा कि कानून के समक्ष समानता, प्रत्येक नागरिक की गरिमा और विनम्रता से प्रेरित जनसेवा ही लोकतांत्रिक नेतृत्व की कसौटी है। नेतृत्व की वास्तविक पहचान उसे मिलने वाले विश्वास और समाज को दी जाने वाली सेवा से होती है।

इस अवसर पर अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नबाम तुकी, मेघालय से पूर्व राज्यसभा सदस्य डब्ल्यू. आर. खारलुखी, लेखक नबाम रेबिया और सह-लेखक संदीप कुमार सहित अनेक गणमान्य जन उपस्थित थे।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुशील कुमार

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