मैंने वर्षों तक योगासन का अभ्यास किया और कभी हार नहीं मानी : रितु मंडल

युगवार्ता    07-Jun-2026
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योगासन खिलाड़ी रितु मंडल


- विश्व योगासन चैंपियनशिप में दो स्वर्ण जीतकर ओलंपिक सपनों को दी नई उड़ान

अहमदाबाद, 07 जून (हि.स.)। गुजरात के अहमदाबाद में पहली विश्व योगासन चैंपियनशिप में दो स्वर्ण पदक जीतने वाली 20 साल की योगासन खिलाड़ी रितु मंडल ने अपनी सफलता का श्रेय कड़ी मेहनत और परिवार के समर्थन को दिया। उन्होंने कहा कि मैंने वर्षों तक योगासन का अभ्यास किया और कभी हार नहीं मानी। उनके कठिन सफर में परिवार ने हमेशा साथ दिया, जिस कारण उन्होंने यह सफलता हासिल की।

पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के एक छोटे से गांव की रहने वाली रितु मंडल के लिए इस उपलब्धि ने उन्हें और उनके परिवार को उनके बड़े सपने भारत का प्रतिनिधित्व करने और एक दिन ओलंपिक पदक जीतने के और करीब पहुंचा दिया है। रितु के लिए ये पदक वर्षों की मेहनत, त्याग और दृढ़ संकल्प का परिणाम है।

रितु ने साई (स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) मीडिया से बातचीत में कहा कि मेरे पिता एक राजमिस्त्री हैं। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद मेरे परिवार ने हमेशा मेरे सपनों का समर्थन किया। मैंने वर्षों तक योगासन का अभ्यास और प्रशिक्षण किया, जबकि मेरी उम्र के कई लोग अन्य कामों में व्यस्त थे। चुनौतियां बहुत थीं, लेकिन मैंने कभी हार नहीं मानी क्योंकि मुझे अपने लक्ष्य पर विश्वास था।

उनके बड़े भाई गौतम ने उनकी सफलता में विशेष भूमिका निभाई है। गौतम स्वयं एक योगासन खिलाड़ी रह चुके हैं और राज्य स्तर तक प्रतियोगिताओं में भाग ले चुके हैं, लेकिन आर्थिक परिस्थितियों के कारण उन्हें खेल छोड़ना पड़ा। हाल ही में फिजियोथेरेपी की पढ़ाई पूरी करने के बाद वो अपना अधिकांश समय रितु के प्रशिक्षण और मार्गदर्शन में लगाते हैं।

रितु बताती हैं कि उनके भाई का योगासन के प्रति जुनून आज भी उतना ही मजबूत है और उनका सबसे बड़ा सपना रितु को इस खेल की सर्वोच्च ऊंचाइयों तक पहुंचते देखना है। उन्होंने कहा, “मेरे भाई योगासन को लेकर बेहद जुनूनी हैं और मुझे इस खेल में सबसे ऊंचे मुकाम पर देखना चाहते हैं। शायद इसलिए क्योंकि वे खुद भी योगासन खिलाड़ी थे, लेकिन परिस्थितियों के कारण आगे नहीं बढ़ सके। उन्हें मुझमें क्षमता दिखाई देती है और वे लगातार मुझे बेहतर बनने के लिए प्रेरित करते हैं। अच्छे प्रदर्शन के बाद भी वे कहते हैं, ‘बहुत अच्छा, लेकिन अभी और सुधार की जरूरत है। तुम्हें अभी लंबा सफर तय करना है।’ मैं उनकी इस बात की बहुत सराहना करती हूं। वे मेरे लिए सबसे अच्छा चाहते हैं और मुझे लगातार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं।”

विश्व मंच पर अपनी पहचान बनाने से पहले रितु राष्ट्रीय स्तर पर भी सफलता हासिल कर चुकी थीं। उन्होंने खेलो इंडिया यूथ गेम्स और खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स में कांस्य पदक जीते थे। इन उपलब्धियों ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उतरने का आत्मविश्वास दिया।

अहमदाबाद में उन्होंने दुनिया भर के सर्वश्रेष्ठ योगासन खिलाड़ियों के बीच संतुलन, लचीलापन, शक्ति और सटीकता का शानदार प्रदर्शन किया। उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन ने उन्हें दो स्वर्ण पदक दिलाए और वे विश्व योगासन चैंपियनशिप में दो स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गईं।

यह उपलब्धि इसलिए भी विशेष है, क्योंकि यह चैंपियनशिप का पहला संस्करण था। जैसे-जैसे योगासन को विश्व स्तर पर पहचान मिल रही है, रितु जैसे खिलाड़ी इस खेल में भारत की अग्रणी भूमिका को मजबूत कर रहे हैं।

अपनी सफलता के बावजूद रितु मानती हैं कि उनकी यात्रा अभी शुरू ही हुई है। उन्होंने कहा, “मैं अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहती हूं। मेरा सपना है कि योगासन को एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों और अंततः ओलंपिक में शामिल किया जाए। भारत के लिए ओलंपिक पदक जीतना मेरा सबसे बड़ा लक्ष्य है।”

रितु ने गलगोटिया यूनिवर्सिटी का भी आभार व्यक्त किया, जो उन्हें हर महीने 13,000 की छात्रवृत्ति प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि खिलाड़ियों के लिए आर्थिक सहायता बहुत महत्वपूर्ण होती है। यह छात्रवृत्ति मुझे अपने परिवार पर अतिरिक्त बोझ डाले बिना खेल जारी रखने में मदद करती है और मुझे अपने भविष्य पर ध्यान केंद्रित करने का आत्मविश्वास देती है। ---------------

हिन्दुस्थान समाचार / वीरेन्द्र सिंह

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