विपक्ष को अदालत जाना चाहिए, सीजीआई के कार्यालय को राजनीतिक विवाद में नहीं घसीटना चाहिए: एआईबीए

युगवार्ता    01-Jul-2026
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आदीश सी अग्रवाल


नई दिल्ली, 01 जुलाई (हि.स.)। ऑल इंडिया बार एसोसिएशन ने चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के संबंध में 23 विपक्षी दलों और एक निर्दलीय सांसद द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश को दिए गए संयुक्त ज्ञापन को संवैधानिक दृष्टि से अनुचित और संस्थागत दृष्टि से असंगत बताया है।

एसोसिएशन ने कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश, भारत निर्वाचन आयोग के प्रशासनिक प्रमुख नहीं हैं। निर्वाचन आयोग के विरुद्ध किसी भी शिकायत को भारत के मुख्य न्यायाधीश को राजनीतिक ज्ञापन भेजकर नहीं, बल्कि सक्षम न्यायालय के समक्ष उचित याचिका दायर करके उठाया जाना चाहिए।

बुधवार को

ऑल इंडिया बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ आदीश सी. अग्रवाल ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर निर्वाचन आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया से संबंधित राजनीतिक विवाद में मुख्य न्यायाधीश के पवित्र पद को शामिल करने के प्रयास पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।

-- सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके आदीश सी. अग्रवाल ने कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश को संबोधित कोई ज्ञापन न्यायिक कार्यवाही का विकल्प नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि न्यायालय मामलों का निर्णय अभिवचनों, साक्ष्यों, कानून और प्रतिद्वंद्वी सुनवाई के आधार पर करते हैं, न कि राजनीतिक अभ्यावेदनों या सामूहिक ज्ञापनों के आधार पर।

उन्होंने कहा कि भारत निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत एक स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण है। यदि कोई राजनीतिक दल या व्यक्ति निर्वाचन आयोग की किसी कार्रवाई से वास्तव में आहत है, तो उचित उपाय यह है कि वह न्यायिक पक्ष में सक्षम न्यायालय का दरवाजा खटखटाए और विधिसम्मत अभिवचनों, दस्तावेजों तथा शपथपत्रों के साथ उचित याचिका दायर करे।

डॉ आदीश अग्रवाल ने आगे कहा कि यदि विपक्षी दल वास्तव में यह मानते हैं कि विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया में कोई अवैधता, मनमानी या संवैधानिक त्रुटि है, तो वे उचित कानूनी कार्यवाही शुरू करने के लिए स्वतंत्र हैं। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों के पास न तो आर्थिक संसाधनों की कमी है और न ही वरिष्ठ वकीलों तथा कानूनी सलाहकारों की।

उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों द्वारा न्यायिक उपाय अपनाने के स्थान पर राजनीतिक ज्ञापन भेजने का निर्णय उनके आरोपों की सद्भावना और कानूनी मजबूती पर गंभीर संदेह पैदा करता है। उनके अनुसार, ऐसा प्रतीत होता है कि विपक्षी दल जानते हैं कि उनके दावे न्यायिक जांच में टिक नहीं पाएंगे।

डॉ आदीश अग्रवाल ने भारत के मुख्य न्यायाधीश के पवित्र कार्यालय को राजनीतिक विवाद में घसीटने के किसी भी प्रयास पर कड़ी आपत्ति व्यक्त की। उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग से संबंधित किसी मामले में, उचित न्यायिक याचिका दायर किए बिना, व्यक्तिगत रूप से मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने का प्रयास संवैधानिक न्यायनिर्णयन और राजनीतिक दबाव के बीच की सीमा को धुंधला करता है। उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका की तरह, एक संवैधानिक संस्था है और पक्षपात, हेराफेरी या दुरुपयोग के किसी भी आरोप को जिम्मेदारी से लगाया जाना चाहिए तथा विधिसम्मत कार्यवाही के माध्यम से सिद्ध किया जाना चाहिए।

डॉ. अग्रवाल ने कहा कि इस संयुक्त ज्ञापन को किसी भी प्रशासनिक या न्यायिक कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने सावधान किया कि न्यायिक प्रक्रिया के बाहर ऐसे ज्ञापन पर विचार करना एक दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण स्थापित कर सकता है और राजनीतिक दलों को स्थापित कानूनी उपायों को दरकिनार करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / विजयालक्ष्मी

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