राजमाता विजया राजे सिंधिया पर सोने की तस्करी का आरोप

युगवार्ता    15-Jul-2026   
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इंदिरा गांधी ने राजमाता विजया राजे सिंधिया पर सोने की तस्‍करी का अरोप लगवाया था। वह बदले की कार्रवाई थी। प्रतिशोध की आग में जल रही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने व्यवहार से मनुष्‍यता की लाज नहीं रखी। राजमाता को बंदी पहले बनाया गया और आरोप बाद में गढ़े गए। लेकिन वे राजमाता को झुका नहीं सकीं।
राजमाता विजया राजे सिंधिया  
‘तुम तो जानती ही होगी कि तुम्हारी मां को राजनीतिक कारणों से नहीं, अपितु तस्करी के आरोप में बंदी बनाया गया है।’ इमरजेंसी के शुरुआती दिनों में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राजमाता विजया राजे सिंधिया के बारे में सरासर यह झूठी जानकारी उनकी बेटी उषा राजे सिंधिया को दी। वे नेपाल की राजधानी काठमांडू में रहती थी, क्योंकि उनकी शादी नेपाल के अंतिम महाराजा के पोते से हुई थी। उन्हें जब अपनी माता की गिरफ्तारी का पता चला तो वे दिल्‍ली आईं। बड़े धैर्य और निरंतर प्रयासों से वे इंदिरा गांधी से मिल सकीं। जैसे ही उन्होंने अपनी माता के बारे में बात शुरू की और उन्हें रिहा करने के लिए अनुरोध करने ही जा रही थीं कि इंदिरा गांधी तमतमा गईं। और जो कहा वह तथ्यों से मेल नहीं खाता। राजमाता को बंदी पहले बनाया गया और आरोप बाद में गढ़े गए।
राजमाता विजया राजे सिंधिया विपक्ष की एक स्तंभ थी। वे लोकसभा सदस्य भी थीं। जनसंघ के नेतृत्व में उनका स्थान पहली कतार में था। विपक्ष और आमतौर पर हर राजनीतिक कार्यकर्ता उन्हें माता स्वरूप मानता था। वे राजनीति में थीं, लेकिन स्वभाव उनका धार्मिक था। इमरजेंसी की रात 12 बजे उन्हें खबर मिल गई कि पुलिस गिरफ्तार करने आ रही है। वे निकल पड़ी। यह सोचकर कि गिरफ्तारी से कुछ समय के लिए बचना आवश्‍यक है। 25 जून, 1975 की उस रात वे दिल्ली के राजपुर रोड की अपनी कोठी में थीं। उनकी बेटी यशोधरा का जन्मोत्सव मनाया जा रहा था। उन्हें जब अपनी गिरफ्तारी के लिए पुलिस के पहुंचने की सूचना मिली तो उसे उन्होंने अपने तक सीमित रखा। अपनी सेविका को बताया कि यात्रा पर निकलना है। सामान ठीक करो। वे पूजा घर गईं। फिर सोचने लगी कि ‘हमारा देश कोई इदी अमीन का युगांडा तो है नहीं। यह भारत है-राम और कृष्‍ण का भारत, गौतम और गांधी का भारत, त्याग और तपस्या का भारत; जिसकी धमनियों में गंगा प्रवाहित है।’
इंदिरा गांधी ने राजमाता विजया राजे सिंधिया के साथ जो व्यवहार किया वह बदले की कार्रवाई थी। प्रतिशोध की आग में जल रही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने व्यवहार से मनुष्‍यता की लाज नहीं रखी। लेकिन वे राजमाता को झुका नहीं सकीं। वे अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए भूमिगत होने का विचार करने लगीं। राजमाता सफेद साड़ी में ही रहती थीं। उस लिबास में पहचाने जाने का खतरा था। अपनी बेटियों की कुछ साड़ियां छाटकर रखवाया। और अज्ञातवाश के लिए निकल पड़ी। एक सरकारी अफसर का घर सुरक्षित समझकर वहां वे गई। लेकिन उन्हें वह स्थान छोड़ना पड़ा। उनके वहां से निकलते ही पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने पहुंची। उनका अगला पड़ाव अपनी एक सहेली का घर था। राजमाता ने अपने संस्मरण में लिखा है, ‘आशा के घर पर ही मेरी और नानाजी की भेंट कराई गई। दो अज्ञातवासी राजनीतिज्ञों की मुलाकात अपने घर में कराते समय आशा तनिक भी नहीं धबराई। मेरी खातिर इस दंपति ने कितना बड़ा जोखिम उठाया था, यह सोचकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।’
भूमिगत राजनीति में जरूरी होता है, जल्दी-जल्दी अपने ठिकाने बदलना। यही उन दिनों राजमाता भी कर रही थीं। उनके लिए बड़े-बड़े लोग चिंतित भी थे और मदद के लिए खतरे भी मोल ले रहे थे। इसे उनके संस्मरण का यह अंश समझाता है, ‘मेरा अगला पड़ाव ब्रिगेडियर अमरजीत सिंह जी का घर था। वे सिख महोदय हाल ही में सेवानिवृत्त हुए थे। उससे पूर्व मेरी उनकी कभी मुलाकात नहीं हुई थी, न ही उन्हें यह पता था कि उनके यहां किसे लाया जा रहा था। मेजर जसवंत सिंह (भाजपा नेता) ने उन्हें केवल इतना बताया था कि जोधपुर के एक ऊंचे घराने की एक महिला को उसके शत्रुओं से उसे सुरक्षा की आवश्‍यकता है।’
वहीं उनकी तीनों पुत्रियों ने राजमाता से मुलाकात की। यह सिलसिला कुछ दिनों तक चलता रहा। उसी समय उन्हें काठमांडू से एक संदेश मिला कि ‘देश में निरंकुश तानाशाही और जंगल के कानून के अंतर्गत इंदिराजी ने तमाम विरोधियों का निष्‍ठुरतापूर्वक सफाया कर देने की ठान ली है। अतः उन परिस्थितियों में मेरा और मेरी बेटियों का भारत में रहना सुरक्षित नहीं। इसके बावजूद यदि मैं वहां रहती हूं तो हमारा भी वही हाल होगा, जो बोल्शेविक क्रांति के बाद रूसी सरदारों का हुआ था।...यह मत भूलिएगा कि इंदिरा जी आपको बख्श देंगी।’ इस संदेश में राजमाता की सुरक्षा के बारे में चिंता थी, क्योंकि इंदिरा गांधी बदले की आग में जल रही थी। इसलिए सुझाव था कि नेपाल आइए। अगर नेपाल में भी दिल्ली का दबाव बढ़ेगा तो विदेश में कहीं शरण लेने पर विचार कर सकते हैं।
राजमाता एक क्षण के लिए भी दुविधा में नहीं पड़ी। उन्होंने देखा, ‘यह संकट केवल हम पर नहीं है, देश की संपूर्ण जनता पर है।’ उन्होंने देश छोड़कर जाने के बारे में कभी सोचा नहीं। लेकिन उनकी तलाश में पुलिस और खुफिया एजेंसियां सक्रिय थी। वे बार-बार अपना ठिकाना बदल रही थी। पुलिस को भी यह पता लग गया था कि राजमाता दिल्ली में ही हैं। ऐसी परिस्थिति में राजमाता ने सुरक्षित जगह जाने का इरादा बनाया। उन्होंने अपने एक शुभचिंतक की कार मंगवाई। उस यात्रा में उनके साथ चार लोग थे। वे सोचती जा रही थीं कि ‘आखिर मैंने ऐसा क्या किया कि एक अपराधी की तरह लुक-छिप रही हूं। क्या लोकतांत्रिक मूल्यों और सिद्धांतों के प्रति प्रामाणिक रहना अपराध है?’ प्रश्‍न थे कि रूकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। राजमाता उन प्रश्‍नों का सामना कर रही थीं। प्रश्‍न उनके थे और उत्तर परिस्थितियों के थे।
मूल प्रश्‍न था कि भूमिगत रहने के लिए यह सब मैं क्यों कर रही हूं? उनकी यात्रा चल रही थी। जहां पहुंचना था वहां पहुंच गई। वह स्थान दिल्ली और ग्वालियर से दूर नेपाल की सीमा पर था। उनके संस्मरण में यह है कि ‘ठीक मध्यरात्रि को हम लोग अपने नियत मुकाम पर पहुंच गए। नेपाल की सीमा वहां से केवल 50 किलोमीटर दूर थी। उसे लांघने के बाद मुझे कोई पकड़ नहीं सकता था।’ राजमाता जहां पहुंची थीं, वह उनके एक मित्र का फार्महाउस था। वहां वे सात दिन रूकीं। उनका संस्मरण है, ‘मैं उस फार्महाउस के अपने कमरे में बैठी रहती, बाहर झांकती तक नहीं थी। फिर भी नौकरों को गंध लग गई कि मैं कौन हूं और वहां किसलिए आई थी। जैसा सोचा था, वह स्थान भी मेरे लिए सुरक्षित नहीं रह गया।’
‘चालीस-पचास कदम और चलना था; फिर पंछी मुक्त, पिंजरा खाली। पर मन धिक्कार रहा था, गौरवशाली इतिहास की रचना करने वाले सिंधिया की कुलवधू को यह शोभा नहीं देता। निज की सुरक्षा का भाव तिरोहित हो गया। निश्‍चय कर लिया कि मैं चोर की तरह नहीं भागूंगी। मैं ग्वालियर की महारानी रह चुकी थी और अब गणतंत्र भारत में उनकी जन प्रतिनिधि हूं।’
इसलिए नेपाल जाने की योजना पर विचार होने लगा। राजमाता विजया राजे सिंधिया का नेपाल से नाता गर्भनाल का था। वे 6 जुलाई, 1975 को अपने सहयोगियों के साथ नेपाल के लिए चल पड़ी। नेपाल की सीमा पर कार पहुंची। उनकी दुविधा प्रबल हो उठी। दुविधा थी, क्या करूं और क्या नहीं? नेपाल की सीमा चंद कदम दूर थी। राजमाता के संस्मरण में लिखा है, ‘चालीस-पचास कदम और चलना था; फिर पंछी मुक्त, पिंजरा खाली। पर मन धिक्कार रहा था, गौरवशाली इतिहास की रचना करने वाले सिंधिया की कुलवधू को यह शोभा नहीं देता। निज की सुरक्षा का भाव तिरोहित हो गया। निश्‍चय कर लिया कि मैं चोर की तरह नहीं भागूंगी। मैं ग्वालियर की महारानी रह चुकी थी और अब गणतंत्र भारत में उनकी जन प्रतिनिधि हूं।’
यह विचार जैसे ही कौंधा कि राजमाता ने ग्वालियर को याद किया। वहां की साधारण जनता की असाधारण वीरता उन्हें याद आई। राजमाता ने अपना निश्‍चय बदला। ग्वालियर लौटने का विचार पक्का किया। हालांकि वे इस बात से भलीभांति परिचित थीं कि इंदिरा गांधी प्रतिशोध की ज्वाला में जल रही हैं। इसलिए उनका व्यवहार उसी तरह का होगा जैसे बिल्ली चूहे की जान लेने के लिए खेलती है। राजमाता ने अपनी गिरफ्तारी देने का निर्णय कर लिया। वे लंबी यात्रा कर ग्वालियर पहुंची। उन्हें इमरजेंसी के कष्‍ट का भान था। लेकिन विपक्ष की भूमिका उनके लिए उस समय वैसी ही थी जैसे सच के रास्ते पर चलने का साहस। वह उनमें था। जो दुगना हो गया। फिर भी उनके मन में यह बात बार-बार आ रही थी कि ‘क्यों इंदिरा जी ने आसेतु हिमालय पुण्यभूमि भारत को बंदीगृह में बदल दिया? क्यों उसके पुत्र-पुत्रियों पर नानाविध कहर ढाए? महज प्रधानमंत्री के पद की खातिर, जो लोकतंत्र में किसी की बपौती नहीं होती।’
राजमाता जय विलास परिसर पहुंचीं। स्नान कर अपने कुल देवता का दर्शन किया। शाम आठ बज रहे थे। पुलिस को सूचना दी गई। इस सूचना पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी ने दिल्ली से आदेश प्राप्त किया। एक बड़ा अफसर पुलिस बल के साथ पहुंचा। पहले लोकसभा सदस्य सरदार आंग्रे ने गिरफ्तारी दी। उसके बाद राजमाता को गिरफ्तार किया गया। उन्हें रात दो बजे पुलिस की गाड़ी लेकर चल पड़ी। जय विलास महल में जब वे पहली बार आई थीं तो उस क्षण को उन्होंने याद किया। ‘मैं जब ग्वालियर पहली बार आई थी, स्थिति भिन्न थी। मैं वहां महारानी बनकर आई थी। तब मुंबई से एक विशेष रेलगाड़ी मुझे लेकर रवाना हुई थी। शाही वैभव मुझ पर न्योछावर था। लक्ष्मी मेरी चेरी थी। साक्षात कुबेर मेरी सेवा में उपस्थित रहते। जिस राजमहल ने राजाओं-महाराजाओं, वायसरायों और सामंतों का भव्य स्वागत किया था, उसी राजमहल से आज मुझे कैदी बनाया जा रहा था। मुझे कहां ले जाया जा रहा था, यह न ग्वालियरवासियों को मालूम था, न राजमहल की दीवारों को।
राजमाता जेल जा रही थीं। वे अतीत में खो गई। उन्हें सिंधिया का ढाई सौ साल का इतिहास याद आया। रास्ते वही थे, जहां से वे सामान्य दिनों में गुजरती थीं तो ग्वालियर वासी अपने पलक-पांवड़े बिछाकर उनका अभिनंदन करते थे। लोगों में भावना वही थी। लेकिन इमरजेंसी के भय ने उन्हें लाचार बना दिया था। राजमाता ने याद किया है, ‘एक पहर की यात्रा के बाद मुझे दतिया की पहाड़ी दिखने लगी।’ उस पहाड़ी पर राजमाता के गुरु का निवास था। उन्होंने विचार बनाया कि ‘क्यों न अपने गुरु महाराज के दर्शन करती चलूं। मैंने अपनी बात पुलिस अधिकारी को बताई। पहले तो उसने आनाकानी की, परंतु बाद में सहमत हो गया।’ राजमाता अत्यंत धार्मिक महिला थी। एक समय था, उन्होंने गुरु की खोज में बहुत तीर्थ यात्राएं की। दतिया स्थित पीतांबरा देवी आश्रम के संत उन्हें गुरुरूप में प्राप्त हुए। वह स्थान ग्वालियर के निकट था। इमरजेंसी से बहुत पहले वहां उनका आना-जाना था। उनके संस्मरण में यह वाक्य है, ‘कारावास के मार्ग में गुरु के दर्शन से मुझे सुकून मिल रहा था।’
उन्हें पुलिस पंचमढ़ी ले गई। मध्य प्रदेश का यह रमणीक स्थान है। वहां के बॉयसन लॉज में उनका बंदी जीवन प्रारंभ हुआ। ‘यहां मुझे ऐसे रखा गया मानो मैं चंबल के खूंखार डाकुओं में से एक हूं।’ वहां की कैद में जो पुलिस का कड़ा बंदोबस्त था, उसका वर्णन राजमाता के संस्मरण में बहुत सजीव है। उसे पढ़ते हुए इमरजेंसी के दिनों की क्रूरता समझ में आती है। हद तो तब हो गई जब राजमाता वहां पास के मंदिर में जाना चाहती थीं। पुलिस अधिकारी से इजाजत मांगी और अनुरोध किया कि एहतियातन चाहें तो पुलिस साथ में भेज दें। अधिकारी का टका सा जवाब था, ‘बंदियों को बाहर जाने की इजाजत नहीं होती।’राजमाता ने मन ही मन संकल्प किया कि जब भी वे कैद से मुक्त होंगी, मंदिर दर्शन के लिए आउंगी। उन्हें इसके लिए दो साल की प्रतीक्षा करनी पड़ी।
‘तिहाड़ जेल में आए मुझे एक महीना बीत चुका था। इस एक महीने में मुझसे मिलने की इजाजत किसी को नहीं दी गई। यहां तक कि पंचमढ़ी से मुझे कहां ले जाया गया है, इसकी जानकारी मेरी पुत्रियों तक को नहीं थी। उधर मेरी पुत्रियां मेरे बारे में सोच-सोचकर परेशान थीं, इधर मुझे यह चिंता खाए जा रही थी कि आखिर उनके दिन कैसे कट रहे होंगे! न कुछ सूझता, न सुहाता।’
पंचमढ़ी की जेल से राजमाता ने एक पत्र लिखा। उसमें अनुरोध था कि उन्हें कहीं अन्यत्र भेजा जाए। वे जानतीं थीं कि कष्‍टप्रद कारावास को स्वयं निमंत्रित कर रही हैं। उन्हें पंचमढ़ी से तिहाड़ जेल लाया गया। वे 2265 नंबर की कैदी बनाई गई। 1975 में 3 सितंबर की तारीख थी। इमरजेंसी के बाद 1 नवंबर, 1978 को लंदन में राजमाता विजया राजे सिंधिया ने एक टेलीविजन कार्यक्रम में तिहाड़ की यातनाभरी यादों को साझा किया। ‘इंदिरा गांधी ने जेलों में अपने राजनीतिक विरोधियों के साथ जो सलूक किया, वह ‘कमीनेपन का प्रतिशोधात्मक कार्य’ था। आखिरकार लोकतंत्र में विपक्ष का होना बहुत सामान्य-सी बात होती है।’ राजमाता के संस्मरण में तिहाड़ जेल को सटीक संज्ञा मिली है, ‘तिहाड़ कारागृह नहीं है, यह धरती का नरक-कुंड है। और इस नरक-कुंड में वे लोग धकेल दिए गए थे, जिनके तपोबल से इंदिरा जी का सिंहासन डोलने लगा था। जेल की पुरानी कचहरीवाला एक कमरा गायत्री देवी को दिया गया था। उससे लगकर एक बरामदा था। उसके उस पारवाले कमरे में मुझे रखा गया।’
तिहाड़ जेल में जहां उन्हें कैदी बनाकर रखा गया, उसका वर्णन इन शब्दों में है, ‘हम दोनों को एक ही शौचालय उपयोग में लाना पड़ता था। वहां नल नहीं था; जमीन में एक सुराख भर था, जिसमें जेल का भंगी दिन में दो बार आकर एक-दो बाल्‍टी पानी डाल देता। शौचालय के नाम पर बस इतनी ही व्यवस्था थी। फिर भी हम उन महिलाओं की तुलना में अपने को सौभाग्यशाली समझ रही थीं, जिनकी कोठरियों में शौचालय नहीं थे। महिला वार्ड के निकट कुछ शौचालय अवश्‍य बने थे; किंतु उसका उपयोग कोई करता नहीं था। अधिकांश महिला कैदी और बच्चे खुले में ही शौच करते थे।’ ‘दंडित महिलाओं के वार्ड से लगकर ही पुरुषों का वार्ड शुरू होता था। मेरी काल कोठरी संकरी गली जैसी थी। खिड़की छत से सटकर थी, इससे बाहर का दृश्‍य देखना कतई संभव नहीं था। शौचालय की हद पर लकड़ी का एक फट्टा डाल दिया गया था। फर्नीचर के नाम पर दो कुर्सियां और एक खटिया, बस। छत से लटक रहे बिजली के बल्ब इतने कम वाट के थे कि उससे फैलने वाला प्रकाश मोमबत्ती के प्रकाश जैसा लगता। कुल मिलाकर मेरे उस नए साम्राज्य में मुझे इतना कुछ ही नसीब था।’
‘तिहाड़ जेल में आए मुझे एक महीना बीत चुका था। इस एक महीने में मुझसे मिलने की इजाजत किसी को नहीं दी गई। यहां तक कि पंचमढ़ी से मुझे कहां ले जाया गया है, इसकी जानकारी मेरी पुत्रियों तक को नहीं थी। उधर मेरी पुत्रियां मेरे बारे में सोच-सोचकर परेशान थीं, इधर मुझे यह चिंता खाए जा रही थी कि आखिर उनके दिन कैसे कट रहे होंगे! न कुछ सूझता, न सुहाता।’ राजमाता ने अपने संस्मरण में यह राज खोला है कि कैसे उषा राजे काठमांडू से दिल्ली आई। फिर यशोधरा, वसुंधरा और उषा राजे ने मिलकर ‘मेरी रिहाई के प्रयत्न शुरू कर दिए।’ इन तीनों के प्रयत्न का परिणाम निकला। वसुंधरा राजे से इंदिरा गांधी के परिवार का एक सदस्य बातों-बातों में कह गया, ‘तुम्हारी मां तिहाड़ में कैद है।’

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रामबहादुर राय

रामबहादुर राय (समूह संपादक)
विश्वसनीयता और प्रामाणिकता रामबहादुर राय की पत्रकारिता की जान है। वे जनसत्ता के उन चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं, जिनकी रपट ने अखबार की धमक बढ़ाई। 1983-86 तथा 1991-2004 के दौरान जनसत्ता से संपादक, समाचार सेवा के रूप में संबद्ध रहे हैं। वहीं 1986-91 तक दैनिक नवभारत टाइम्स से विशेष संवाददाता के रूप में जुड़े रहे हैं। 2006-10 तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ के संपादक रहे। उसके बाद 2014-17 तक यथावत पत्रिका के संपादक रहे। इन दिनों हिन्दुस्थान समाचार समूह के समूह संपादक हैं।