पंढरपुर वारी परंपरा से सामाजिक एकता और सामूहिक चेतना का संचार होता हैः डॉ जोशी

युगवार्ता    24-Jul-2026
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आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी के साथ अन्य लोग मौजूद।


नई दिल्ली, 24 जुलाई (हि.स.)। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा है कि अद्वितीय परंपरा पंढरपुर वारी सात शताब्दियों से सांस्कृतिक चरित्र, सामाजिक समरसता और सामूहिक चेतना को सुदृढ़ करती है।

डॉ जोशी ने यह बात दिल्ली स्थित आईजीएनसीए में आयोजित “पंढरपुर वारी – 700 वर्ष पुरानी परंपरा पर संवाद एवं प्रस्तुति” कार्यक्रम में कही। भारत की सात सौ वर्षों से अधिक पुरानी जीवंत सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक परंपराओं में से एक है। इसका उद्देश्य कई देशों के राजनयिकों एवं सांस्कृतिक प्रतिनिधियों को वारी के सांस्कृतिक, सामाजिक और सभ्यतागत महत्व से परिचित कराना था। यह श्रद्धा, समता, सामाजिक सद्भाव, अनुशासन और सेवा जैसे मूल्यों पर आधारित है।

उन्होंने कहा, भारत अनेक प्राचीन तीर्थयात्राओं और सांस्कृतिक परंपराओं का देश है। पंढरपुर वारी भी ऐसी ही भारतीय संस्कृति की एक अद्वितीय परंपरा है, जिसने सात शताब्दियों से भारतीय समाज के सांस्कृतिक चरित्र सामाजिक समरसता भक्ति और सामूहिक चेतना को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

भाजपा के विदेश मामलों के विभाग के प्रमुख विजय चौथाईवाले ने कहा कि विदेशी आक्रमणों और सामाजिक अस्थिरता के दौर में संत ज्ञानेश्वर, संत नामदेव, संत एकनाथ और संत तुकाराम जैसे संतों ने भक्ति आंदोलन के माध्यम से समाज में आत्मविश्वास, नैतिक शक्ति और आध्यात्मिक चेतना का संचार किया।

इस अवसर पर वैभव डांगे द्वारा लिखित पंढरपुर वारी पर आधारित मोनोग्राफ का लोकार्पण भी किया गया। उन्होंने वारी को केवल एक धार्मिक यात्रा न बताते हुए इसे सात सौ वर्षों से चली आ रही एक जीवंत सभ्यतागत परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया, जो समता, विनम्रता, सेवा, अनुशासन, सामूहिक सहभागिता और भक्ति के मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाती रही है।

पिछले नौ वर्षों से स्वयं वारी में सहभागी होने के अपने अनुभव साझा करते हुए डांगे ने कहा कि वारी व्यक्ति को केवल ईश्वर के निकट ही नहीं ले जाती बल्कि उसे अधिक संवेदनशील, सेवाभावी और मानवीय बनाती है।

इस आयोजन ने भारत और विभिन्न देशों के राजनयिक समुदाय के बीच सांस्कृतिक संवाद को और अधिक सुदृढ़ किया तथा भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की एक अनूठी परंपरा को वैश्विक समुदाय के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।

इस अवसर पर रूस, सूरीनाम, फिलीपींस, अंगोला, मॉरीशस, थाईलैंड, अमेरिका, मोल्दोवा, ऑस्ट्रेलिया, भूटान, इंडोनेशिया और ब्राजील के राजनयिक एवं सांस्कृतिक प्रतिनिधियों ने सहभागिता की।

उल्लेखनीय है कि पंढरपुरवारी महाराष्ट्र की सात सौ साल से अधिक पुरानी एक अद्वितीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पदयात्रा परंपरा है, जिसमें लाखों भक्त (वारकरी) आषाढ़ी एकादशी पर भगवान विट्ठल के दर्शन के लिए पैदल चलते हैं। इस यात्रा में संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम जैसे संतों की पादुकाओं को पालकियों में ले जाया जाता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी

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