मूवी रिव्यू: दर्द, संवेदनाओं और उम्मीद की मार्मिक कहानी है 'ओमलो'

युगवार्ता    04-Jul-2026
Total Views |
ओमलो - फोटो सोर्स एक्स


फिल्म: 'ओमलो'

कलाकार: शंभो महाजन, सोनू रणदीप चौधरी, सोनाली शर्मिष्ठा

देवा शर्मा, महेश जिलोवा, वंदना गुप्ता

निर्देशक: सोनू रणदीप चौधरी

निर्माता: नेहा पांडे, रोहित मखीजा, मनीष गोपलानी

सोनू रणदीप चौधरी

रेटिंग: ⭐⭐⭐½ (3.5/5)

आज के दौर में जहां ज्यादातर फिल्में बड़े सितारों और व्यावसायिक मनोरंजन पर केंद्रित होती हैं, वहीं 'ओमलो' समाज के एक ऐसे सच को सामने लाती है, जिस पर अक्सर खुलकर बात नहीं होती। घरेलू हिंसा, पितृसत्तात्मक सोच, आर्थिक तंगी और पीढ़ियों से चले आ रहे मानसिक आघात जैसे गंभीर विषयों को निर्देशक सोनू रणदीप चौधरी ने बेहद सादगी और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। फिल्म सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं कहती, बल्कि राजस्थान की संस्कृति, परंपराओं और ग्रामीण जीवन की आत्मा को भी खूबसूरती से पर्दे पर उतारती है।

कहानी

फिल्म की कहानी राजस्थान के एक छोटे से रेगिस्तानी गांव में रहने वाले मासूम बच्चे ओमलो और उसके परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है। उसकी मां सावित्री रोज मजदूरी कर परिवार का पेट पालती है, जबकि घर की आर्थिक तंगी, शराबी पति का अत्याचार और समाज की रूढ़िवादी सोच उसकी जिंदगी को लगातार मुश्किल बनाती रहती है। इसी संघर्ष के बीच ओमलो अपनी मासूम आंखों से घर में होने वाली हिंसा, दर्द और रिश्तों के टूटते-बिखरते रूप को देखता है। कहानी धीरे-धीरे यह दिखाती है कि बचपन में मिले जख्म किस तरह आने वाली पीढ़ियों के जीवन को प्रभावित करते हैं। बिना बड़े नाटकीय मोड़ों के फिल्म छोटे-छोटे घटनाक्रमों के जरिए गहरी बात कह जाती है।

अभिनय

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके कलाकारों का सहज अभिनय है। शंभो महाजन ने ओमलो के किरदार में मासूमियत और दर्द को बेहद प्रभावशाली ढंग से निभाया है। बिना ज्यादा संवादों के भी उनका अभिनय दिल को छू जाता है।

सोनाली शर्मिष्ठा सावित्री के किरदार में पूरी तरह रच-बस जाती हैं। एक संघर्षशील मां की बेबसी, दर्द और मजबूती को उन्होंने बेहद स्वाभाविक तरीके से पर्दे पर उतारा है। सोनू रणदीप चौधरी शराबी और गैरजिम्मेदार पति के किरदार में प्रभाव छोड़ते हैं। देवा शर्मा, महेश जिलोवा और वंदना गुप्ता भी अपने-अपने किरदारों के साथ न्याय करते हैं।

निर्देशन

निर्देशक सोनू रणदीप चौधरी ने फिल्म को बिना अनावश्यक मेलोड्रामा के पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत किया है। राजस्थान की भाषा, संस्कृति, लोकजीवन और सामाजिक माहौल को उन्होंने बेहद वास्तविक तरीके से फिल्माया है। फिल्म की गति थोड़ी धीमी जरूर है, लेकिन यही ठहराव इसकी भावनात्मक गहराई को मजबूत बनाता है। सिनेमैटोग्राफी में बीकानेर और श्री डूंगरगढ़ की लोकेशन बेहद खूबसूरती से उभरकर सामने आती हैं, जबकि संगीत और बैकग्राउंड स्कोर कहानी के भावनात्मक प्रभाव को और बढ़ा देते हैं।

फाइनल वर्डिक्ट

'ओमलो' मनोरंजन से ज्यादा एक भावनात्मक और सामाजिक अनुभव है। यह फिल्म किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस सोच की कहानी कहती है जो पीढ़ियों से समाज में चली आ रही है। मजबूत अभिनय, संवेदनशील निर्देशन और राजस्थान की संस्कृति की खूबसूरत झलक इसे एक सार्थक फिल्म बनाती है। अगर आप ऐसी फिल्में पसंद करते हैं जो सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि समाज का आईना भी दिखाती हैं, तो 'ओमलो' जरूर देखी जानी चाहिए।---------------

हिन्दुस्थान समाचार / लोकेश चंद्र दुबे

Tags