(लीड) पीएम आवास में 6.32 लाख पात्र परिवार वंचित, जल जीवन मिशन की 72 प्रतिशत योजनाएं अधूरी : कैग

युगवार्ता    11-Aug-2026
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प्रधान महालेखाकार प्रेस वार्ता करते हुए


रांची, 11 अगस्त (हि.स.)। झारखंड में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और वित्तीय प्रबंधन को लेकर भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में गंभीर खामियां सामने आई हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (पीएमएवाई-जी) के लिए उपलब्ध राशि का राज्य सरकार पांच वर्षों में महज 70 प्रतिशत ही खर्च कर सकी। लाभुकों की सूची तैयार करने में हुई देरी के कारण 6.32 लाख पात्र परिवार योजना से बाहर रह गए। वहीं, जल जीवन मिशन के तहत स्वीकृत 98,067 योजनाओं में से दिसंबर 2024 तक सिर्फ 27,294 योजनाएं पूरी हो सकीं। यानी 72 प्रतिशत योजनाएं अधूरी रहीं।

ये तथ्य मंगलवार को प्रधान महालेखाकार इंदु अग्रवाल की ओर से डोरंडा स्थित कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में सामने आए। विधानसभा के मानसून सत्र में पेश सीएजी की रिपोर्ट में भी इन बिंदुओं का उल्लेख किया गया है।

पीएम आवास योजना में 2.90 लाख अपात्र लाभुक

सीएजी ने पीएमएवाई-जी की स्थिति का आकलन करने के लिए बोकारो, दुमका, गिरिडीह, पलामू, रामगढ़ और सिमडेगा छह जिलों का नमूना ऑडिट किया। इन जिलों के 12 प्रखंडों और 60 ग्राम पंचायतों में योजना से संबंधित दस्तावेजों की जांच की गयी।

रिपोर्ट के अनुसार, सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना-2011 के आंकड़ों के आधार पर राज्य में 19.28 लाख परिवार बेघर, कच्चे या जर्जर मकानों में रह रहे थे। इनमें से योजना के निर्धारित मानकों के आधार पर 14.88 लाख परिवार पात्र नहीं पाए गए।

ऑडिट में यह भी पाया गया कि 2.90 लाख ऐसे लोगों को पीएम आवास योजना की सूची में शामिल कर लिया गया, जिन्हें योजना का लाभ नहीं मिलना चाहिए था। बाद में ग्रामसभा ने ऐसे लोगों को सूची से हटा दिया।

नमूना जांच के लिए चुनी गयी 60 ग्राम पंचायतों में किसी के पास स्थायी प्रतीक्षा सूची तैयार करने से संबंधित दस्तावेज नहीं मिले। वर्ष 2016 से नवंबर 2022 के बीच 22.34 लाख पात्र परिवारों की सूची तैयार की गयी थी, लेकिन उसमें भी कई तरह की त्रुटियां पायी गयीं।

सूची में देरी से 6.32 लाख परिवार बाहर

सीएजी के अनुसार, लाभुकों की सूची को अंतिम रूप देने में करीब दो वर्ष की देरी हुई। इसके कारण केंद्र सरकार ने 22.34 लाख के बजाय सिर्फ 16.02 लाख आवास ही आवंटित किए। इस तरह 6.32 लाख परिवार यानी करीब 28 प्रतिशत पात्र परिवार योजना में शामिल नहीं हो सके।

हालांकि, राज्य सरकार ने वर्ष 2016-24 के दौरान केंद्र से आवंटित 16.02 लाख आवासों में से 15.92 लाख के निर्माण की स्वीकृति दी। इनमें से जनवरी 2025 तक 15.62 लाख आवासों का निर्माण पूरा हो चुका था। इस आधार पर स्वीकृत आवासों के निर्माण की उपलब्धि करीब 98 प्रतिशत रही। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन आवासों को एक वर्ष में पूरा किया जाना था, उनमें से कई को पूरा करने में अधिकतम तीन वर्ष तक का समय लगा।

उपलब्ध राशि का 70 प्रतिशत ही खर्च

रिपोर्ट के अनुसार, पीएमएवाई-जी के लिए राज्य में कुल 20,199.98 करोड़ रुपये उपलब्ध थे। इनमें से राज्य सरकार सिर्फ 14,113.07 करोड़ रुपये खर्च कर सकी। इस तरह उपलब्ध राशि का करीब 70 प्रतिशत ही इस्तेमाल हुआ।

वर्ष 2019-24 के दौरान केंद्रांश को सिंगल नोडल अकाउंट (एसएनए) में स्थानांतरित करने में भी देरी हुई। निर्धारित समयसीमा के मुकाबले राशि स्थानांतरित करने में अधिकतम 92 दिनों तक की देरी हुई। इसके कारण राज्य सरकार पर ब्याज के रूप में 22.39 करोड़ रुपये की देनदारी बनी।

1.60 लाख करोड़ के खर्च का उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित

सीएजी की वित्तीय रिपोर्ट में राज्य सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर भी गंभीर टिप्पणी की गयी है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य गठन से लेकर 31 मार्च 2025 तक 1.60 लाख करोड़ रुपये के खर्च का उपयोगिता प्रमाणपत्र सरकार ने उपलब्ध नहीं कराया है। नियमों के अनुसार, किसी वित्तीय वर्ष में जारी राशि के उपयोग का प्रमाणपत्र अगले वित्तीय वर्ष में दिया जाना चाहिए। इतनी बड़ी राशि के उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित रहने पर सीएजी ने खर्च की राशि के संभावित दुरुपयोग को लेकर आशंका जतायी है।

जल जीवन मिशन की 72 प्रतिशत योजनाएं अधूरी

जल जीवन मिशन संबंधी सीएजी की रिपोर्ट में भी झारखंड में योजना के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में पांच वर्षों के दौरान स्वीकृत 98,067 योजनाओं में से दिसंबर 2024 तक केवल 27,294 योजनाएं पूरी हो सकीं। यानी करीब 28 प्रतिशत योजनाएं ही पूरी हुईं, जबकि 72 प्रतिशत योजनाएं अधूरी पायी गयीं। इनमें कई योजनाएं दो वर्ष से अधिक समय से लंबित थीं।

योजना की स्थिति का आकलन करने के लिए सीएजी ने धनबाद, पूर्वी सिंहभूम, हजारीबाग, खूंटी, कोडरमा और पश्चिमी सिंहभूम जिलों का ऑडिट किया। इन जिलों के पेयजल एवं स्वच्छता प्रमंडलों के रिकॉर्ड की जांच के अलावा 12 प्रखंडों और 26 गांवों की योजनाओं का भी ऑडिट किया गया।

राज्य सरकार ने पांच वर्षों में जल जीवन मिशन के तहत 98,067 योजनाओं को मंजूरी दी थी। इनकी कुल अनुमानित लागत 24,360.91 करोड़ रुपये थी। वर्ष 2019-24 के दौरान केंद्र और राज्यांश के रूप में योजना के लिए कुल 11,690.09 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए गए। इसमें बैंक से ब्याज के रूप में प्राप्त 53.04 करोड़ रुपये और अन्य स्रोतों से प्राप्त 76.87 करोड़ रुपये भी शामिल थे। सरकार ने उपलब्ध राशि में से 11,468.63 करोड़ रुपये खर्च किए।

55 प्रतिशत ग्रामीण घरों तक पहुंचा नल का पानी

जल जीवन मिशन अगस्त 2019 में शुरू हुआ था। उस समय राज्य में 52,27,214 ग्रामीण घर थे और इनमें से करीब सात प्रतिशत घरों में नल से पेयजल की सुविधा उपलब्ध थी। बाद में ग्रामीण घरों की संख्या बढ़ने के बाद कुल 67.25 लाख ग्रामीण घरों को नल से पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया।

मार्च 2025 तक करीब 34.31 लाख घरों को नल से पेयजल सुविधा से जोड़ा जा सका। इस तरह निर्धारित लक्ष्य के मुकाबले करीब 55 प्रतिशत घरों तक ही योजना पहुंच सकी।

सीएजी ने योजना के लाभुकों के बीच सर्वेक्षण भी कराया। इसमें अलग-अलग क्षेत्रों में सिर्फ 19 से 40 प्रतिशत लाभुकों ने ही जल जीवन मिशन से संतुष्ट होने की बात कही। यानी आधे से अधिक लाभुक योजना की सेवाओं से संतुष्ट नहीं पाए गए।

रिपोर्ट में कहा गया है कि योजना के नियमों के तहत जनगणना में दर्ज सभी राजस्व ग्रामों को जल जीवन मिशन में शामिल किया जाना था। इसके बावजूद राज्य सरकार ने 3,339 राजस्व ग्रामों को योजना में शामिल नहीं किया।

ठेकेदार को 85 के बजाय 100 प्रतिशत भुगतान

ऑडिट के दौरान ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाने का मामला भी सामने आया। रिपोर्ट में 27.13 करोड़ रुपये के अनुचित लाभ का उल्लेख किया गया है। चाईबासा पेयजल एवं स्वच्छता प्रमंडल की जगन्नाथपुर जलापूर्ति योजना इसका एक उदाहरण है। अप्रैल 2023 में शुरू हुई इस योजना की लागत 118.60 करोड़ रुपये थी और इसे जुलाई 2025 तक पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित था।

योजना के नियमों के अनुसार डीआई पाइप की आपूर्ति और उसे बिछाने के बाद ठेकेदार को 85 प्रतिशत राशि का भुगतान किया जाना था। हालांकि, इस मामले में ठेकेदार को 100 प्रतिशत भुगतान कर दिया गया। सीएजी ने इसे नियमों के विपरीत भुगतान मानते हुए ठेकेदार को अनुचित लाभ पहुंचने का मामला माना है।

सीएजी की रिपोर्ट में सामने आए इन तथ्यों से राज्य में योजनाओं की योजना बनाने, लाभुकों के चयन, वित्तीय प्रबंधन, क्रियान्वयन और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / विकाश कुमार पांडे

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