
- हरित और टिकाऊ विकास के लिए मिलकर काम करने पर जोर
नई दिल्ली, 12 अगस्त (हि.स.)। संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर बुधवार को नई दिल्ली स्थित जर्मन दूतावास में भारत-जर्मनी हरित एवं सतत विकास साझेदारी (जीएसडीपी) की 11वीं संवाद श्रृंखला आयोजित की गई। ‘सतत विकास के लिए युवा आवाजें’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में युवा नेतृत्वकर्ताओं, नवोन्मेषकों, नीति विशेषज्ञों और विकास क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने हरित, समावेशी और जलवायु अनुकूल भविष्य के निर्माण में युवाओं की भूमिका पर चर्चा की।
कार्यक्रम में सतत विकास लक्ष्य-5 (लैंगिक समानता), लक्ष्य-7 (सस्ती एवं स्वच्छ ऊर्जा), लक्ष्य-11 (टिकाऊ शहर एवं समुदाय) और लक्ष्य-13 (जलवायु कार्रवाई) पर विशेष रूप से चर्चा हुई।
जर्मन दूतावास के मिशन उपप्रमुख जॉर्ज इंजविलर ने कहा कि आज की सबसे बड़ी चुनौतियों का समाधान कोई एक देश या संस्था अकेले नहीं कर सकती। इसके लिए सरकारों, कारोबार, वैज्ञानिकों, उद्यमियों और नागरिक समाज के बीच साझेदारी जरूरी है। उन्होंने कहा कि युवा केवल कल के नेतृत्वकर्ता नहीं हैं, बल्कि आज ही भविष्य को आकार दे रहे हैं। वह नवाचार कर रहे हैं, नए समाधान विकसित कर रहे हैं और सतत विकास, जलवायु न्याय तथा समावेशन को लेकर नए सवाल उठा रहे हैं।
इंजविलर ने भारत-जर्मनी हरित एवं सतत विकास साझेदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने वर्ष 2022 में इस साझेदारी की शुरुआत की थी। इसके तहत सतत ऊर्जा परिवर्तन, हरित शहरी परिवहन, जलवायु अनुकूल शहरीकरण, कृषि-पारिस्थितिकी और जैव विविधता जैसे क्षेत्रों में सहयोग किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जर्मनी ने वर्ष 2030 तक इस साझेदारी के लिए करीब 10 अरब यूरो की प्रारंभिक वित्तीय प्रतिबद्धता की है।
उन्होंने कहा कि साझेदारी तभी सार्थक होती है, जब उसका असर जमीन पर दिखाई दे और लोगों के जीवन में सुधार आए। जर्मन वित्तीय सहयोग के तहत नवीकरणीय ऊर्जा, टिकाऊ परिवहन और जलवायु अनुकूल बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं में निवेश किया जा रहा है। उन्होंने बेंगलुरु मेट्रो की येलो लाइन का उदाहरण देते हुए कहा कि जर्मन सहयोग से शहरी परिवहन को स्वच्छ, सुरक्षित और महिलाओं के अनुकूल बनाने में मदद मिल रही है। भारत में सौर ऊर्जा के विस्तार में भी जर्मन सहयोग से स्वच्छ बिजली उत्पादन और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने में मदद मिली है।
उन्होंने जर्मन अंतरराष्ट्रीय सहयोग संस्था के भारत में काम का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्था बुनियादी ढांचे के साथ संस्थाओं और लोगों की क्षमता बढ़ाने पर भी काम कर रही है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली के साथ राष्ट्रीय अनुकूलन योजना, नीति आयोग के साथ सतत विकास लक्ष्यों और संयुक्त राष्ट्र महिला संस्था के साथ महिलाओं एवं लड़कियों के कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग किया जा रहा है।
इंजविलर ने कहा कि सतत विकास का आकलन केवल बिजली उत्पादन, मेट्रो रेल की लंबाई या निवेश की राशि से नहीं किया जा सकता। इसका वास्तविक पैमाना लोगों के जीवन में आया सुधार और उनके लिए पैदा हुए अवसर हैं। उन्होंने युवाओं से कहा कि वे नए उद्यम स्थापित कर रहे हैं, शोध कर रहे हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित समाधान विकसित कर रहे हैं और स्थानीय समुदायों के साथ काम कर रहे हैं। ऐसे में उन्हें केवल भविष्य की नेतृत्वकर्ता पीढ़ी कहना पर्याप्त नहीं होगा।
उन्होंने भारत और जर्मनी के युवाओं के बीच बढ़ते संपर्क को भी महत्वपूर्ण बताया। इंजविलर के अनुसार, जर्मनी के विश्वविद्यालयों में 60 हजार से अधिक भारतीय विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं और उनकी संख्या हर वर्ष करीब 10 से 15 प्रतिशत बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के युवा भविष्य में भारत-जर्मनी संबंधों को और मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण संवादात्मक ‘फिश बाउल चर्चा’ रही। इसमें दर्शकों को भी चर्चा में सक्रिय रूप से भाग लेने का अवसर मिला। आर्थिक सहयोग एवं विकास प्रभाग की अधिकारी जैस्मिन कौर के संचालन में हुई चर्चा में रैम्पमायसिटी के संस्थापक प्रतीक खंडेलवाल, जर्मन अंतरराष्ट्रीय सहयोग संस्था की ऊर्जा सलाहकार डॉ. प्रियंशी चौहान, विकसित भारत कार्यक्रम के वरिष्ठ फेलो रोनक जोगेश्वर और संयुक्त राष्ट्र महिला संस्था की कार्यक्रम विश्लेषक पल्लवी अग्रवाल ने भाग लिया।
डॉ. प्रियंशी चौहान ने महिलाओं के लिए स्वच्छ ऊर्जा तक पहुंच बढ़ाने में वित्तीय चुनौतियों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि भारत में कृषि कार्यबल का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा महिलाएं हैं, लेकिन केवल करीब 15 प्रतिशत महिलाओं के नाम पर संपत्ति है। ऐसे में सौर तकनीक के लिए ऋण लेने वाली महिलाओं के सामने जमानत और जरूरी दस्तावेजों की समस्या आती है। उन्होंने कहा कि वित्तीय संस्थाओं के साथ मिलकर ऐसे ऋण उत्पाद तैयार करने और जोखिम कम करने के उपायों पर काम किया जा रहा है।
रौनक जोगेश्वर ने अपने जीवन के संघर्षों का उल्लेख करते हुए बताया कि 10 वर्ष की उम्र में परिवार की आर्थिक स्थिति के कारण उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा और उन्होंने साइकिल मरम्मत की दुकान पर काम किया। आगे चलकर उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और बच्चों को नवाचार एवं रोबोटिक्स सिखाने का काम शुरू किया। बाद में वे नीति आयोग के अटल नवाचार मिशन के शुरुआती सदस्यों में शामिल हुए। उन्होंने देशभर में हजारों नवाचार प्रयोगशालाओं की स्थापना और लाखों विद्यार्थियों को नवाचार से जोड़ने के अनुभव साझा किए।
पल्लवी अग्रवाल ने महिलाओं की आर्थिक भागीदारी के साथ निर्णय लेने की क्षमता को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को केवल रोजगार और आय के अवसर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उन्हें अपनी आय पर निर्णय लेने का अधिकार मिले। उन्होंने कहा कि हरित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ते समय लैंगिक समानता को अलग विषय के रूप में नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
रैम्पमायसिटी के संस्थापक प्रतीक खंडेलवाल ने दिव्यांगजनों के लिए सुगम सार्वजनिक परिवहन और सार्वजनिक स्थानों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2014 में एक दुर्घटना के बाद उन्हें रीढ़ की हड्डी में चोट लगी और व्हीलचेयर उनके जीवन का हिस्सा बन गई। इसके बाद उन्होंने सार्वजनिक स्थानों और परिवहन व्यवस्था को दिव्यांगजनों के लिए अधिक सुगम बनाने की दिशा में काम शुरू किया। उन्होंने बताया कि उनकी संस्था ने चार वर्षों से कम समय में 10 शहरों में एक हजार से अधिक स्थानों को दिव्यांगजनों के लिए सुगम बनाया है।
उन्होंने फुटपाथों पर उचित ढलान की कमी, रास्तों में लगे अवरोधकों, फुटपाथ पर खंभों और अन्य संरचनाओं तथा पैदल यात्रियों के लिए कम समय वाले संकेतों को प्रमुख समस्याएं बताया। उन्होंने मेट्रो स्टेशनों पर दिव्यांगजनों के लिए आरक्षित पार्किंग, प्रवेश के लिए ढलान, कम ऊंचाई वाले टिकट काउंटर, सुगम शौचालय और प्लेटफॉर्म से मेट्रो के बीच उचित दूरी जैसी सुविधाएं सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई।
जर्मन दूतावास के आर्थिक सहयोग एवं विकास प्रभाग की उपप्रमुख पामेला बैजल ने कार्यक्रम में युवाओं की भागीदारी को प्रेरणादायक बताया। उन्होंने कहा कि सतत विकास लक्ष्य केवल अंतरराष्ट्रीय दस्तावेजों में लिखे लक्ष्य नहीं हैं, बल्कि इनका संबंध लोगों के जीवन, सम्मानजनक रोजगार, लैंगिक समानता, सुरक्षित और समावेशी सार्वजनिक परिवहन तथा सभी के लिए अवसरों से है। उन्होंने कहा कि युवा इस विकास प्रक्रिया के केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि इसके सह-निर्माता, नवाचारकर्ता और सक्रिय भागीदार हैं।
कार्यक्रम के दौरान भारत के विभिन्न हिस्सों से युवा नवोन्मेषकों द्वारा विकसित समाधानों की प्रदर्शनी भी लगाई गई। इसमें जलवायु कार्रवाई, स्वच्छ ऊर्जा, टिकाऊ शहरों, समावेशी सार्वजनिक परिवहन और लैंगिक समानता से जुड़े नवाचारों को प्रदर्शित किया गया। कार्यक्रम के समापन पर वक्ताओं और प्रतिभागियों के योगदान के लिए आभार व्यक्त किया गया और भारत-जर्मनी सहयोग में युवाओं की आवाज को आगे भी शामिल करने पर जोर दिया गया।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर