झीरम हत्याकांड मामले में एनआईए की विशेष अदालत में अंतिम सुनवाई पूरी, 31 अगस्त को आएगा फैसला

युगवार्ता    12-Aug-2026
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झीरम हत्याकांड के बाद घटनास्थल पर पहुंची पुलिस ,फाइल फोटो


रायपुर, 12 अगस्त (हि.स.)। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित झीरम घाटी नक्सली हमले के मामले में बस्तर जिले के जगदलपुर स्थित जिला एवं सत्र न्यायालय के परिसर में एनआईए की विशेष अदालत में बुधवार को अंतिम सुनवाई पूरी हो गई। अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है और इस ऐतिहासिक मामले पर 31 अगस्त को अंतिम फैसला सुनाया जाएगा।

झीरम कांड मामले की सुनवाई में अंतिम बहस तीन दिनों तक चली। सोमवार को अभियोजन पक्ष ने अदालत के समक्ष अपनी अंतिम दलील रखी, जबकि मंगलवार को बचाव पक्ष ने अंतिम जिरह की। बुधवार को एनआईएकी विशेष अदालत ने एक बार फिर बचाव पक्ष को सुना, जिसके बाद अभियोजन पक्ष के तरफ से दलीलें प्रस्तुत की गई।

उल्लेखनीय है कि झीरम कांड मामले की कानूनी सुनवाई पिछले 13 वर्षों से अधिक समय से चल रही थी।अदालत में कुल 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए हैं। शुरुआत में 11 आरोपितों पर ट्रायल शुरू हुआ था, जिनमें से एक आरोपित की मौत हो चुकी है और अब 10 आरोपितों पर फैसला आना है। इस मामले में एनआईए की जांच रिपोर्ट में 27 लोगों की मौत और 35 लोगों के घायल होने की बात कही गई। मामले में 150 से 200 अन्य माओवादियों को भी आरोपित बनाया गया।

सुनवाई के दौरान कांग्रेस लीगल सेल के महासचिव अवधेश झा ने मीडिया के सामने आकर अंतिम बहस और अदालती प्रक्रिया की तारीखों से जुड़ी जानकारी दी हैं । इसके अलावा, सरकारी वकील व अभियोजन पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे शासकीय अधिवक्ता दिनेश पाणिग्रही ने भी मामले के ट्रायल, 101 गवाहों के बयानों और अंतिम बहस के चरणों को लेकर मीडिया के साथ जानकारी साझा की ।अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि यह केवल एक सामान्य नक्सली हमला नहीं था, बल्कि कांग्रेस की 'परिवर्तन यात्रा' और उसके शीर्ष नेताओं को निशाना बनाने के लिए रची गई एक गहरी आपराधिक साजिश थी।नक्सलियों ने पहले से ही झीरम घाटी के पहाड़ी रास्ते और जंगलों में रणनीतिक घेराबंदी कर रखी थी, जो सुनियोजित योजना को साबित करता है।हमले में जीवित बचे सुरक्षाकर्मियों, काफिले में शामिल अन्य कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और स्थानीय ग्रामीणों सहित कुल 101 गवाहों के बयान दर्ज कराए गए हैं।

अभियोजन ने दलील दी कि चश्मदीदों के बयानों से घटनाक्रम और मौके पर मौजूद कुछ प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) संगठन के सक्रिय सदस्यों की संलिप्तता पूरी तरह स्पष्ट होती है।घटना स्थल से बरामद किए गए हथियार, विस्फोटकों के अवशेष, नक्सलियों के आंतरिक दस्तावेज और घटना के बाद लूटे गए हथियारों की बरामदगी रिपोर्ट को मजबूत साक्ष्य के रूप में पेश किया गया। अभियोजन ने अदालत को बताया कि फॉरेंसिक और बैलिस्टिक जांच की रिपोर्टें यह साबित करती हैं कि हमलावरों ने अत्याधुनिक हथियारों से काफिले पर अंधाधुंध फायरिंग की थी।आरोपितों के खिलाफ देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने, यूएपीए , हत्या और आपराधिक साजिश जैसी सख्त कानूनी धाराओं के तहत आरोप सिद्ध करने पर जोर दिया गया। अभियोजन ने कहा कि यह हमला राज्य की संप्रभुता और लोकतांत्रिक ताने-बाने पर सीधा प्रहार था।

बचाव पक्ष के वकीलों ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि उनके मुवक्किलों को केवल संदेह के आधार पर पकड़ा गया है। उन्होंने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष के पास उनके मुवक्किलों को सीधे तौर पर घटना स्थल पर गोलीबारी करने या साजिश रचने से जोड़ने के लिए पर्याप्त प्रत्यक्ष डिजिटल या फॉरेंसिक सबूत नहीं हैं और 13 साल के लंबे समय में कई कड़ियां कमजोर हुई हैं।

ज्ञात हो कि 25 मई साल 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन रैली झीरम घाटी से होकर गुजर रही थी। इस दौरान पहले से झीरम घाटी में घात लगाए नक्सलियों ने कांग्रेस की रैली पर हमला कर दिया था। नक्सलियों के हमले में कांग्रेस का पूरा शीर्ष नेतृत्व खत्म हो गया था। तत्कालीन पीसीसी अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, विद्याचरण शुक्ल, बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा सहित अन्य बड़े कांग्रेसी नेताओं को नक्सलियों ने मौत के घाट उतारा था। इनके अलावा सुरक्षाबल के जवान और आम नागरिक भी मारे गए थे।

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हिन्दुस्थान समाचार / केशव केदारनाथ शर्मा

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