
इंदौर, 25 अगस्त (हि.स.)। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने इंदौर शहर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से हुई 36 मौत की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है। इसकी प्रति वकीलों को भी नही मिलेगी। अदालत ने कहा कि रिपोर्ट सिर्फ वे वकील देख सकेंगे, जिनका वकालतनामा मामले में पेश है।
भागीरथपुरा दूषित पानी कांड को लेकर मंगलवार को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में सुनवाई हुई। पीड़ितों की ओर से दायर जनहित याचिका में एडवोकेट रितेश इनानी ने न्यायालय से 600 से ज्यादा पेज की जांच रिपोर्ट अध्ययन के लिए उपलब्ध कराने की मांग की। अदालत ने कहा कि रिपोर्ट को सार्वजनिक रूप से सर्कुलेट नहीं किया जा सकता। रिपोर्ट उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार को सौंप दी गई है। संबंधित वकील रजिस्ट्रार के पास जाकर रिपोर्ट का अध्ययन कर सकते हैं। सुनवाई के दौरान भागीरथपुरा त्रासदी के साथ इंदौर में अब भी सामने आ रहे दूषित पानी के मामलों का मुद्दा भी उठा।
याचिकाकर्ता के वकील रितेश इनानी ने अदालत को बताया कि शहर में अब भी दूषित पानी सप्लाई किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि शहर में दूषित पानी के सैंपल की रिपोर्ट को लेकर खबरें प्रकाशित हुई हैं। इस पर अदालत ने नगर निगम से पूछा कि इस मामले में अब तक क्या संज्ञान लिया है और शहर के कई हिस्सों में स्वच्छ पानी क्यों नहीं पहुंच रहा है। निगम की ओर से जवाब के लिए समय मांगा गया, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
गौरतलब है कि इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में 26 दिसंबर 2025 से 25 फरवरी 2026 के बीच दूषित पानी से 36 लोगों की मौत हुई थी, जबकि सैकड़ों लोग बीमार पड़ गए थे। यह मामला केवल इंदौर या मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं रहा था, बल्कि इस घटना ने पूरे देश का ध्यान खींचा था। मामला इतना गंभीर था कि इस पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी हुए और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठे। इस मामले में करीब 8 महीने से चल रही जांच का अहम पड़ाव आ गया, जब मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के निर्देश पर गठित एक सदस्यीय जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट तैयार की। आयोग ने गत 20 अगस्त को करीब 600 पन्नों की रिपोर्ट उच्च न्यायालय में सीलबंद लिफाफे में जमा की थी।
27 जनवरी 2026 को सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में गठित आयोग ने घटना के कई पहलुओं की पड़ताल की। जांच के दौरान संबंधित विभागों से दस्तावेज जुटाए गए और प्रभावित लोगों के बयान भी लिए गए। आयोग ने जांच के दौरान इंदौर नगर निगम, इंदौर विकास प्राधिकरण, जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग सहित संबंधित विभागों से दस्तावेज जुटाए। प्रभावित क्षेत्र के लोगों से भी लिखित बयान आमंत्रित किए गए। अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका के साथ घटना के दौरान किए गए राहत और स्वास्थ्य संबंधी इंतजामों की भी पड़ताल की गई। मामला संवेदनशील होने के कारण जांच की प्रक्रिया को गोपनीय रखा गया।
जांच का दायरा केवल पाइप लाइन या दूषित पानी के स्रोत तक सीमित नहीं था। आयोग ने यह भी देखा कि संबंधित विभागों के अधिकारियों ने अपने दायित्व का पालन किया था या नहीं। तत्कालीन निगम कमिश्नर दिलीप यादव और तत्कालीन अपर आयुक्त टोहित सिसोनिया की भूमिका भी जांच के दायरे में रही। इनके अलावा कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव, स्थानीय पार्षद कमल वाघेला सहित अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की भी पड़ताल की गई।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर