
नई दिल्ली/न्यूयॉर्क, 30 अगस्त (हि.स.)। अमेरिका के न्यूयॉर्क के मैनहट्टन में 'एहेड फोरम' की ओर से आयोजित यूनिवर्सल ऑननेस सेलिब्रेशन के दौरान विश्वभर के धार्मिक नेताओं ने स्पष्ट रूप से कहा है कि धर्म का इस्तेमाल नफरत, अपमान, अमानवीय व्यवहार या हिंसा को उचित ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता। इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मोहन भागवत शामिल हुए थे।
धार्मिक नेताओं ने न्यूयॉर्क के मैनहट्टन में वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव, हिंसा और ध्रुवीकरण के बीच आयोजित 'एक विश्व: एक मानवता शिखर सम्मेलन' के आह्वान के साथ पारित प्रस्ताव में किसी भी समुदाय की गरिमा और सुरक्षा के लिए खड़े होने की प्रतिबद्धता जताई। उन्होंने कहा कि जहां आस्था उपचार और मेल-मिलाप का माध्यम रही है, वहीं इसका दुरुपयोग विभाजन और हिंसा को उचित ठहराने के लिए भी हुआ है।
इस दौरान पांच सूत्रीय जारी प्रस्ताव पत्र में से पहला संदेश समुदायों का आत्म-परीक्षण है, जिसमें सबसे पहले अपने ही समुदायों की शिक्षाओं और आचरण की समीक्षा करना। धर्म के नाम पर घृणा, अमानवीकरण और हिंसा को पूरी तरह अस्वीकार करना तथा भिन्न विचारों के प्रति सम्मान सिखाना शामिल है।
दूसरा- संकट में अन्य समुदायों का साथ देना। इसमें किसी भी समुदाय या व्यक्ति को निशाना बनाए जाने पर उसके पक्ष में खड़े होने की बात कही गई है। प्रस्ताव में कहा गया है कि किसी अन्य का दुःख केवल इसलिए उपेक्षित नहीं किया जा सकता कि वह अपना नहीं है।
तीसरा- संवाद और युवाओं की सहभागिता है जिसमें किसी त्रासदी की प्रतीक्षा किए बिना धार्मिक और सांस्कृतिक सीमाओं के पार समुदायों तथा विशेष रूप से युवाओं को एक साथ लाने की बात कही गई है। इसका उद्देश्य पूर्वाग्रहों को समाप्त कर मानवीय स्तर पर रिश्ते बनाना है।
चौथा- हम मिलकर सेवा कार्य करेंगे। प्रस्ताव में कहा गया है कि विस्थापितों, पीड़ितों, रोगियों और उपेक्षितों के लिए एकसाथ मिलकर कार्य करना होगा। श्रेय पाने की लालसा के बिना पहले से चल रहे सेवा कार्यों का समर्थन करना भी इसमें शामिल है।
पांचवा- हम भविष्य के प्रति अपना उत्तरदायित्व स्वीकार करेंगे।प्रस्ताव में युद्ध, शांति, गरीबी उन्मूलन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों के संदर्भ में नैतिक प्रभाव का उपयोग करना, जिससे तकनीक मानव-गरिमा, सत्य और स्वतंत्रता को सुदृढ़ करे का जिक्र है।
सम्मेलन में नेताओं ने रेखांकित किया कि कोई भी वैश्विक दस्तावेज तभी सार्थक होता है जब वह स्थानीय स्तर पर वास्तविक कार्यों में परिवर्तित हो। इसके लिए सभी प्रतिनिधियों से आह्वान किया गया कि वे ऐसे समूहों को एक मंच पर लाएं जो सामान्यतः संवाद नहीं करते। भिन्न आस्था और संस्कृति के लोगों के साथ मिलकर सेवा कार्य करें।
संदेश में कहा गया कि धार्मिक नेता अकेले सभी युद्धों या अन्यायों को समाप्त नहीं कर सकते। लेकिन वे शक्तिहीन भी नहीं हैं। साझा गरिमा और परस्पर जुड़े भविष्य के निर्माण के लिए प्रत्येक समुदाय को अपने स्तर पर साहसिक और उत्तरदायी कदम उठाने होंगे।
उल्लेखनीय है कि कार्यक्रम में अमेरिका के 39 राज्यों और 853 शहरों से आए 6,000 प्रतिनिधियों, विभिन्न विश्वविद्यालयों के 250 से अधिक छात्रों और 250 से अधिक संगठनों ने भाग लिया। कार्यक्रम में 30 देशों के 180 धार्मिक नेताओं ने भविष्य के प्रति जिम्मेदारी तय करने के लिए पांच सूत्रीय कार्ययोजना की घोषणा की।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी