अंग्रेजी बोलने वाले को विद्वान और अपनी भाषा में बोलने वाले को कमतर समझने की मानसिकता बदलें : डाॅ. कुलदीप अग्निहोत्री

युगवार्ता    13-Sep-2026
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भारतीय भाषा समागम में बतौर मुख्य अतिथि केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश के पूर्व कुलपति डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री


-भाषा समागम-2026 में बोले- भारतीय ज्ञान परंपरा के पुल को जोड़ने का केंद्र बनेगा काशी-हिन्दुस्थान समाचार का भारतीय ज्ञान परंपरा को अपनी विरासत से जोड़ना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना महत्वपूर्ण कदम

वाराणसी, 13 सितंबर (हि.स.)। केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश के पूर्व कुलपति डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने कहा कि भारत के पुरातन ज्ञान और आधुनिक ज्ञान के बीच एक दीवार खड़ी हो गई है। आज सबसे बड़ी चुनौती इस दीवार को तोड़कर दोनों ज्ञान धाराओं को जोड़ने की है। हमें छह हजार या दस हजार वर्ष पीछे जाकर बैठना नहीं है, बल्कि अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा को वर्तमान विज्ञान और शिक्षा से जोड़ना है। इससे सनातन ज्ञान का प्रवाह आगे बढ़ेगा और देश को उसका नया लाभ मिलेगा।

महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के गांधी अध्ययन पीठ सभागार में हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर हिन्दुस्थान समाचार की ओर से रविवार को आयोजित ‘भारतीय ज्ञान परंपरा, क्षेत्रीय भाषाएं और समृद्ध भारत’ विषयक भारतीय भाषा समागम-2026 को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए डॉ. अग्निहोत्री ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल दर्शन, आत्मा और परमात्मा तक सीमित कर देना उसके व्यापक स्वरूप को छोटा करना है। भारत ने गणित, रसायन विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान और खगोल विज्ञान सहित अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण ज्ञान अर्जित किया था। आवश्यकता इस बात की है कि उस ज्ञान को खोजा जाए, समझा जाए और आधुनिक संदर्भ में उसका मूल्यांकन किया जाए।

उन्होंने कहा कि काशी अब केवल आस्था और अध्यात्म की नगरी नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक ज्ञान के बीच टूटे पुल को जोड़ने का केंद्र बन सकती है। पुरातन ज्ञान को वर्तमान ज्ञान से जोड़कर नई पीढ़ी तक पहुंचाने का बड़ा प्रयोग काशी से शुरू होना चाहिए। यही वह भूमि है, जहां से भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्जागरण की नई धारा पूरे देश में प्रवाहित हो सकती है।

भाषा बनेगी ज्ञान के पुल की महत्वपूर्ण कड़ी

डॉ. अग्निहोत्री ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा की बड़ी संख्या में पांडुलिपियां संस्कृत में हैं, जबकि आधुनिक विषयों के विशेषज्ञों का संस्कृत से पर्याप्त परिचय नहीं है। भौतिकी (फिजिक्स) के प्रोफेसर को संस्कृत का ज्ञान नहीं और संस्कृत के विद्वान को फिजिक्स की विशेषज्ञता नहीं है। ऐसे में प्राचीन ज्ञान की विरासत तक पहुंचने के लिए दोनों के बीच संवाद का पुल बनाना होगा।

उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को वर्तमान शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने के लिए भाषा और विषय विशेषज्ञों को साथ लाना होगा। विश्वविद्यालयों में भारतीय ज्ञान परंपरा को पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात हो रही है, लेकिन केवल पाठ्यक्रम तैयार कर देने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा। हर विषय में यह तलाशना होगा कि उस क्षेत्र में भारत की क्या उपलब्धियां रही हैं।

डॉ. अग्निहोत्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि रसायन विज्ञान (केमिस्ट्री) के प्रोफेसर को भारतीय रसायन परंपरा समझनी है तो उसे संबंधित प्राचीन ग्रंथों तक पहुंचना होगा। इसके लिए संस्कृत और विज्ञान के विशेषज्ञों को साथ बैठकर काम करना होगा।

काशी में ज्ञान के क्षेत्र में नए प्रयोग की जरूरत

पूर्व कुलपति ने कहा कि काशी को ज्ञान के क्षेत्र में नए प्रयोग करने होंगे। महामना मदन मोहन मालवीय ने अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के दौर में काशी में शिक्षा का बड़ा प्रयोग किया था। महात्मा गांधी ने गुजरात में विद्यापीठ की स्थापना की, जबकि स्वामी श्रद्धानंद ने गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय और लाला लाजपत राय ने लाहौर में नेशनल कॉलेज की स्थापना की। उस दौर में भारतीय शिक्षा और ज्ञान परंपरा को बचाने के लिए ऐसे प्रयोग किए गए थे।

उन्होंने कहा कि आज फिर उसी तरह के प्रयोगों की आवश्यकता है। काशी में कॉरिडोर तो बन गया, लेकिन ज्ञान के क्षेत्र में भी ऐसा कॉरिडोर बनना चाहिए, जो पुरातन ज्ञान को वर्तमान से जोड़े। हिन्दुस्थान समाचार इस दिशा में काम कर रहा है। काशी के प्रबुद्ध लोगों और जनप्रतिनिधियों को मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए, जिसमें भारतीय ज्ञान परंपरा का टूटा हुआ पुल फिर से जोड़ा जा सके।

भाषा नहीं, उसमें कही गई बात महत्वपूर्ण

भारतीय भाषाओं के संदर्भ में डॉ. अग्निहोत्री ने कहा कि भाषा से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उसमें क्या कहा जा रहा है। काशी ने हमेशा भाषा से ज्यादा कही गई बात को महत्व दिया है। गोस्वामी तुलसीदास ने जनभाषा में रामचरितमानस की रचना की और समाज ने उसे स्वीकार किया, क्योंकि उसमें निहित विचार महत्वपूर्ण थे।

अंग्रेजी को लेकर बनी मानसिकता में बदलाव की जरूरत बताते हुए उन्होंने कहा कि अंग्रेजी बोलने वाले को विद्वान और अपनी भाषा में बोलने वाले को कमतर समझने की सोच बदलनी होगी। भारत की सभी भाषाएं राष्ट्रीय महत्व की हैं। असमिया, पंजाबी, बंगला, तमिल, तेलुगु, मराठी, गुजराती और हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाएं देश की ज्ञान और सांस्कृतिक परंपरा की वाहक हैं।

हिन्दुस्थान समाचार ने शुरू किया भारतीय भाषा दिवस

डॉ. अग्निहोत्री ने बताया कि भारतीय भाषा दिवस मनाने की भावना बहुभाषी समाचार एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार से जुड़ी है। जब हिंदी को राष्ट्रभाषा कहे जाने पर असमिया सहित अन्य भारतीय भाषाओं के स्थान को लेकर सवाल उठे, तब यह विचार सामने आया कि भारत की सभी भाषाएं राष्ट्रीय महत्व की भाषाएं हैं। इसी भावना के साथ हिन्दुस्थान समाचार ने भारतीय भाषा दिवस मनाने की शुरुआत की।

राष्ट्र भाव की सुरक्षा भी जरूरी

डॉ. अग्निहोत्री ने कहा कि भारत के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्र भाव को लेकर है। राज्य को देखा जा सकता है, लेकिन राष्ट्र को नहीं। राष्ट्र हृदय में होता है। राज्य बनते-बिगड़ते रहते हैं, लेकिन राष्ट्र भाव कायम रहे तो देश जीवित रहता है। उन्होंने कहा कि आज चुनौतियां बदल गई हैं और उनके तरीके भी बदल गए हैं। ऐसे में राष्ट्र भाव की सुरक्षा के लिए योजनाओं और दृष्टिकोण को भी नए सिरे से देखना होगा। भारतीय ज्ञान परंपरा को अपनी विरासत से जोड़ना और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

डॉ. अग्निहोत्री ने विश्वास जताया कि काशी भारतीय ज्ञान परंपरा के टूटे हुए पुल को जोड़ने का काम करेगी और यहां से ज्ञान की नई धारा पूरे देश तक पहुंचेगी।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

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