धर्म जीवन का अनुशासन है, प्राण बचाने के लिए भी नहीं करे इसका त्याग : डॉ. मोहन भागवत

युगवार्ता    18-Sep-2026
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उज्जैन में युवा धर्म संसद 2026 को संबोधित करते हुए सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत


उज्जैन में युवा धर्म संसद 2026 को संबोधित करते हुए सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत


उज्जैन में युवा धर्म संसद 2026 का शुभारंभ करते हुए मोहन भागवत


उज्जैन में युवा धर्म संसद 2026 में शामिल हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत


- संघ प्रमुख ने उज्जैन में किया युवा धर्म संसद 2026 का उद्घाटन, युवाओं को समझाया धर्म का वास्तविक अर्थ

उज्जैन, 18 सितम्बर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि धर्म रिलिजन नहीं है, बल्कि जीवन का अनुशासन है। किसी इच्छा की पूर्ति, भय, लोभ या प्राण बचाने के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। सुख-दुख आते-जाते रहते हैं, लेकिन धर्म नित्य रहता है।

सरसंघचालक डॉ. भागवत शुक्रवार को मध्य प्रदेश के उज्जैन प्रवास के दौरान यहां देवास रोड स्थित गीता भवन में आयोजित तीन दिवसीय युवा धर्म संसद के दूसरे उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। इससे पहले उन्होंने दीप प्रज्ज्वलन और वंदे मातरम के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस दौरान सरसंघचालक ने युवाओं को धर्म का वास्तविक अर्थ समझाया और जीवन में इसके महत्व पर मार्गदर्शन दिया।

उन्होंने अपने उद्बोधन में रिलीजन और धर्म का अंतर बताते हुए स्पष्ट किया कि रिलीजन का अर्थ धर्म नहीं होता। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी शब्दकोश में धर्म के लिए कोई सटीक शब्द ही नहीं है। रिलीजन शब्द की उत्पत्ति रिलिजियो से हुई है, जो बांधने का संकेत देता है, जबकि धर्म किसी को बांधता नहीं, बल्कि मुक्त करता है।

उन्होंने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति इसके कर्मकांड को मिटाना चाहती है, इसलिए इसे रिलीजन का नाम देती है। स्वामी विवेकानंद के विचारों का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि भारत धर्मप्राण देश है। किसी भी नए विचार या जिज्ञासा का समाधान पाने के लिए पहले अपने मन को स्थिर और खाली करना होगा। जब तक पुरानी बातें दिमाग से नहीं हटेंगी, तब तक नया सीखना संभव नहीं है।

सरसंघचालक डॉ. भागवत ने कहा कि धर्म को लेकर भ्रम का एक कारण अपनी भाषा और धर्म के वास्तविक अर्थ को भूल जाना है। पश्चिमी देशों के लोगों ने भारत में धर्म के आचरण, उससे जुड़े कर्मकांड और अनुशासन को देखा। उसे अपने यहां के ‘रिलिजन’ के समान समझ लिया। बाद में हम भी धर्म को रिलिजन कहने लगे। जैसे कुश्ती सीखने के लिए अखाड़े में दंडबैठक लगाना जरूरी है, वैसे ही धर्म के कर्मकांड और अनुशासन उसके अभ्यास का हिस्सा हैं। कर्मकांड धर्म का एक अंग है, पूरा धर्म नहीं। रिलिजन धर्म नहीं है।

आपको मोक्ष की ओर ले जाएगा धर्म

उन्होंने कहा कि जीवन में आप जो भौतिक सुख, इच्छाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति चाहते हैं, वह धर्म के पालन से ही मिलती है। धर्म आपको मोक्ष की ओर ले जाएगा। किसी इच्छा को पूरा करने, डर या लालच के कारण या अपनी जान बचाने के लिए भी कभी धर्म का त्याग न करें।

उन्होंने कहा कि जब मैंने 'युवा धर्म संसद' के बारे में सुना तो मुझे खुशी हुई कि युवा धर्म के बारे में सोच रहे हैं। आजकल ऐसी बातें सुनने को कम ही मिलती हैं। जब भी धर्म की बात होती है तो लोग कहते हैं कि यह बुढ़ापे की चीज़ है। उन्होंने कहा कि गीता और रामायण को रिटायरमेंट के बाद पढ़ने वाली किताबें माना जाता है लेकिन असल में ऐसा नहीं है। धर्म तो जीवन की शुरुआत से लेकर अंत तक बना रहता है और सब कुछ उसी के अनुसार चलता है। आप इसमें यकीन करें या न करें, कुछ चीज़ें नियमों से चलती हैं। जब कोई व्यक्ति अहंकार में आकर काम करता है और सोचता है कि सब कुछ उसके कंट्रोल में है और उसकी मर्ज़ी से होना चाहिए, तो उसे गलतफहमी हो जाती है कि चीज़ें वैसी ही होंगी जैसा वह चाहता है। लेकिन असल में ऐसा नहीं होता।

धर्म ही देता है युवाओं को दिशा

सरसंघचालक ने कहा कि धर्म केवल बुजुर्गों के लिए नहीं है बल्कि यह युवाओं को सही दिशा दिखाने का माध्यम है। उन्होंने कहा कि महाभारत के अंत के पांच श्लोक पूरी महाभारत का सार हैं। जीवन में धर्म से ही काम, अर्थ और मोक्ष की प्राप्ति होती है। उन्होंने कहा कि धर्म पर रोते-रोते चलने के बजाय यदि इसे समझकर अपनाया जाए, तो जीवन सार्थक हो जाता है। किसी को पीड़ा न देना ही सबसे बड़ा धर्म है और पीड़ा देना महापाप है।

गौरतलब है कि, सेवाज्ञ संस्थानम् की ओर से सिद्धपीठ हनुमत निवास अयोध्या के पीठाधीश्वर एवं संरक्षक आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरणजी महाराज के मार्गदर्शन में 17 से 19 सितंबर तक उज्जैन में युवा धर्म संसद-2026 का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम में देशभर से करीब 1,700 युवा छात्र-छात्राएं तथा 300 से अधिक विद्वान, शिक्षक, शोधकर्ता और धर्माचार्य हिस्सा ले रहे हैं। प्रसिद्ध पटकथा लेखक और गीतकार मनोज मुंतशिर भी कार्यक्रम में शामिल हुए। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 19 सितंबर को समापन सत्र में शामिल होंगे।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

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