
नई दिल्ली, 24 सितंबर (हि.स.)। दिल्ली के उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने गुरुवार को कहा कि नदियां हमारे जनमानस की आत्मा, संस्कृति और जीवन-धारा को भी वहन करती हैं।
उपराज्यपाल तरनजीत संधू आज दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में आयोजित 24 से 26 सितंबर तक 7वें ‘नदी उत्सव’ को संबोधित कर रहे थे। इस वर्ष के उत्सव की मुख्य थीम ‘यमुना नदी’ पर केंद्रित है। तीन दिवसीय इस उत्सव का उद्देश्य नदियों के महत्व, उनके संरक्षण और सांस्कृतिक सरोकारों को जन-जन तक पहुंचाना है।
मुख्य अतिथि के रूप में उन्होंने कहा, हमारी सभ्यतागत समझ में, नदी एक पवित्र और जीवनदायिनी शक्ति है जो समुदायों, कृषि और पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) का भरण-पोषण करती है। लेकिन अब यमुना शहरीकरण, प्रदूषण तथा शहर और उसके प्राकृतिक पर्यावरण के बीच बदलते संबंधों के चलते भारी दबाव का सामना कर रही है। यदि हम इस नदी को अपनी सांस्कृतिक विरासत का अंग मानते हैं, तो इसका संरक्षण करना भी हमारी धरोहर और भावी पीढ़ियों के प्रति हमारा दायित्व है।
संधू ने कहा कि नदी का स्वास्थ्य केवल जल शोधन से संभव नहीं है। इसके लिए कचरे और अनुपचारित सीवेज को नदी में गिरने से रोकना तथा आसपास के शहरी व प्राकृतिक तंत्र का वैज्ञानिक प्रबंधन करना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि दिल्ली जल बोर्ड और 'नमामि गंगे' जैसी पहलों को सफल बनाने के लिए सरकारी एजेंसियों, विशेषज्ञों और आम नागरिकों का एकजुट होना आवश्यक है, ताकि इस ऐतिहासिक धरोहर को भावी पीढ़ियों के लिए पुनर्जीवित किया जा सके।
उपराज्यपाल ने कहा कि तीन दिवसीय नदी उत्सव जागरूकता को प्रगाढ़ करेंगे, सहभागिता को बढ़ावा देंगे और यमुना के अनवरत पुनरुद्धार के लिए नए विचारों को जन्म देंगे।
स्वामी अवधेशानंद गिरि ने कहा कि हम यमुना नदी के उत्सव के साथ-साथ एक और संकल्प ले रहे हैं कि हम यमुना को इस तरह से बनाना चाहेंगे कि वहां स्नान हो सके और आचमन हो सके। इस नदी उत्सव का मुख्य संकल्प यही होना चाहिए कि यमुना को दिल्ली में भी वैसा ही निर्मल बनाया जाए, जैसी वह हिमालय और विकासनगर में बहती है। उन्होंने कहा कि नदियां दो प्रकार से जन्म लेती हैं, एक ग्लेशियर (हिमरैणु) से और दूसरी वृक्षों की जड़ों से। ऐसे में वनों और वनस्पतियों का संरक्षण नदियों के सातत्य और प्रवाह के लिए अनिवार्य है। उन्होंने मांग की कि सरकार स्तर पर एक सशक्त टास्क फोर्स का गठन हो और समाज मिलकर अपनी नदियों, सरोवरों और जल-परंपरा को बचाने के लिए आगे आए।
कथक नृत्यांगना पद्म शोवना नारायण ने कहा कि नदी केवल एक भौगोलिक जलधारा नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों को जोड़ने वाली स्मृति, संस्कृति और संस्कार की अविरल चेतना है। समाज के दोहरे रवैये पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि आज नदियों के प्रति हमारा दृष्टिकोण आत्मचिंतन की मांग करता है। एक ओर हम नदियों को पूजते हैं, तो दूसरी ओर उन्हें निरंतर प्रदूषित भी करते जा रहे हैं। जब तक इस विरोधाभास को स्वीकार कर जनचेतना में बदलाव नहीं लाया जाएगा, तब तक नदियों का वास्तविक संरक्षण संभव नहीं है।
उत्सव के पहले दिन शाम 06:30 बजे - 07:30 बजे विष्णुप्रिया गोस्वामी और उनकी टीम ने ओडिसी नृत्य और हवेली संगीत का एक अनूठा संगम प्रदर्शित किया।
तीन दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम में युवाओं के लिए वाद-विवाद, स्केचिंग और कार्टून मेकिंग जैसी कई रचनात्मक प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी। इसके अलावा कई सत्र आयोजित किए जाएंगे और साथ ही डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म फेस्टिवल में अलग-अलग भाषाओं फिल्में दिखाई जाएंगी। इसका मुख्य विषय ‘रिवर एज़ एन आर्काइविस्ट’ रखा गया है। इसमें जाने-माने फ़िल्मकारों के साथ आईजीएनसीए द्वारा ब्रह्मपुत्र, सिंधु, नर्मदा और यमुना पर निर्मित वृत्तचित्र प्रदर्शित किए जाएंगे। युवाओं और महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए नदियों पर मौलिक काव्य लेखन प्रतियोगिता होंगी। प्रदर्शनियां प्रदर्शित की जाएंगी। नदियों का प्रवाह तलाशने और उनके संरक्षण में जुटे देश के विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं को परिचर्चा के लिए एक मंच पर लाया जाएगा। इसमें देशभर के करीब 50 विशेषज्ञ शामिल होंगे। इस वर्ष युवा पीढ़ी को जोड़ने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
इस मौके पर कार्यक्रम में हिन्दुस्थान समाचार के समूह संपादक एवं आईजीएनसीए के अध्यक्ष राम बहादुर राय, आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, प्रो. अभय मिश्र, प्रो के. अनिल कुमार सहित बड़ी संख्या में पर्यावरण प्रेमी और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी