प्रदूषण से त्रस्त दिल्ली एनसीआर
दिल्ली और आस-पास के इलाके के लोग जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। सर्दी का मौसम शुरू होते ही दिल्ली और इससे सटे इलाकों की हवा जहरीली होना शुरू हो जाती है। प्रदूषण की बड़ी वजह किसानों के पराली जलाने को माना जाता है।

प्रदूषण से त्रस्त दिल्ली एनसीआर

युगवार्ता    17-Nov-2022
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दिल्ली और आस-पास के इलाके के लोग जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। सर्दी का मौसम शुरू होते ही दिल्ली और इससे सटे इलाकों की हवा जहरीली होना शुरू हो जाती है। प्रदूषण की बड़ी वजह किसानों के पराली जलाने को माना जाता है।

 
प्रदूषण से त्रस्त दिल्ली एनसीआर
 
 
विजय कुमार राय  
 

दिल्ली एनसीआर की हवा दिन प्रतिदिन और जहरीली होती जा रही है। पिछले दिनों दिल्ली एनसीआर की हवा का एक्यूआई बहुत ही खराब श्रेणी में देखा गया। यह जहरीली हवा स्वास्थ्य के लिए कई तरह के खतरे पैदा कर रही है। हर घर में कोई ना कोई सांस संबंधित किसी ना किसी बीमारी से जूझ रहा है, लोकल सर्किल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म कम्युनिटी के एक सर्वे में ये बात सामने आई है कि पिछले कुछ हफ्तों में दिल्ली-एनसीआर के 80 प्रतिशत परिवारों में कम से कम एक सदस्य वायु प्रदूषण से संबंधित बीमारियों से ग्रसित है।

इस कम्युनिटी के संस्थापक सचिन टापरिया ने कहा कि दिल्ली-एनसीआर में पांच में से चार परिवारों में कुछ सदस्य प्रदूषण संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। पिछले पांच दिनों में स्थिति और खराब हो गई है। उन्होंने कहा कि (पीएम 2.5) के संपर्क में आने से स्वास्थ्य पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है। सफर के आंकड़ों के मुताबिक इस प्रदूषण के कई कारण हैं, लेकिन पराली का योगदान ज्यादा बड़ा है। उन्होंने कहा कि प्रदूषण एक साइलेंट किलर की तरह हर किसी की जिंदगी में घुस रहा है। बच्चे और बुजुर्ग कोई भी इससे वंचित नहीं हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हाल ही में बताया कि प्रदूषण से सांस की बीमारी, दिल, लंग्स की बीमारियां बढ़ती जा रही हैं, यही नहीं कैंसर का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। बच्चों को निमोनिया भी हो रहा है। एम्स के पूर्व डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया ने चेतावनी देते हुए कहा कि बच्चों, बुजुर्गों और जिनके फेफड़े और दिल कमजोर हैं, उन्हें ऐसी जगहों पर नहीं जाना चाहिए जहां प्रदूषण हो। अगर आप जाना चाहते हैं, तो दिन में ऐसा करें जब धूप हो और मास्क पहनें।

दिल्ली में ठंड के महीनों में अक्सर प्रदूषण की समस्या बढ़ जाती है। इसके लिए किसानों के पराली जलाने, हवा की गति का कम होना, गाड़ियों के धुएँ से लेकर दिवाली में आतिशबाज़ी जैसे कारणों को ज़िम्मेदार बताया जाता रहा है। 

वैसे तो किसी भी देश की संपन्नता में वहां की औद्योगिक इकाइयों का मुख्य स्थान होता है किन्तु औद्योगिक इकाइयों की वजह से होने वाले अपेक्षित विकास और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण कर इनकी स्थापना की अनुमति दी जानी चाहिए। उद्योगों से वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण और जल प्रदूषण की समस्याएं उत्पन्न होती हैं। एक विकासशील देश होने के नाते भारत में भी बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई जिसकी वजह से आज देश को सभी प्रकार के प्रदूषण की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। सर्दी का मौसम शुरू होते ही दिल्ली और इससे सटे इलाकों की हवा में प्रदूषण बढ़ना शुरू हो जाता है। हालांकि इसे रोकने के लिए दिल्ली सरकार काफी हाथ-पांव मारती देखी जाती है, पर उसे सफलता मिलती नजर नहीं आती। अक्सर इस मौसम में प्रदूषण बढ़ने की बड़ी वजह किसानों के पराली जलाने, पटाखे फोड़ने और निर्माण कार्यों से उड़ने वाली गर्द को बताया जाता रहा है। मगर इस साल इन सभी पहलुओं पर सरकार पहले से सतर्कता बरत रही थी।

निर्माण कार्यों से उड़ने वाली गर्द पर अंकुश लगाने के लिए पूरी दिल्ली में जांच दल गठित कर दिए गए थे। किसानों को पराली न जलानी पड़े, इसके लिए दिल्ली सरकार ने विशेष रूप से तैयार जैव रसायन का मुफ्त वितरण शुरू किया था, जिससे पराली आसानी से खेतों में ही गल-पच जाती है। पटाखों पर अदालत की तरफ से रोक है। यों भी दिवाली से पहले इतने पटाखे नहीं फोड़े जाते कि उनसे निकलने वाला धुआं सारे वातावरण को दमघोटूबना दे। मगर इतने एहतियात के बावजूद स्थिति यह है कि दिल्ली में प्रदूषण का स्तर खतरे के बिंदु तक पहुंच गया। आंकड़ों में दिल्ली में प्रदूषण का स्तर देश के प्रमुख शाहरों में सबसे ऊपर था। आने वाले दिनों में इस स्तर में और बढ़ोतरी की संभावना जताई गई है।

जब मौसम सर्द होने लगता है, तो हवा पृथ्वी की सतह के आसपास सिमटने लगती है, फिर उसमें घुले प्रदूषक वातावरण को दमघोंटू बना देते हैं। पिछले कुछ सालों में तो ऐसा अनुभव रहा कि बच्चों के स्कूल बंद करने पड़े। लोगों को सुबह टहलने निकलने से परहेज करने की सलाह दी गई। दमकल की गाड़ियों से पेड़ों पर पानी की बौछार कर प्रदूषक तत्त्वों को कम करने का प्रयास किया गया। बहुत सारे लोगों ने अपने घरों में वायु प्रदूषण अवशोषक संयंत्र भी रख लिए।

आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण दुपहिया वाहनों की वजह से फैलता है। दिल्ली की सड़कों पर दुपहिया वाहनों की संख्या निरंतर बढ़ रही है, इसलिए इनसे निकलने वाला धुआं चुनौती बना हुआ है। 

ऐसी स्थिति से निपटने के लिए दिल्ली सरकार ने एक जगह वायु प्रदूषण सोखने वाला विशाल संयंत्र भी लगाया है, जिसके नतीजे उत्साहजनक हैं। ऐसे संयंत्र अन्य स्थानों पर भी लगाने की उसकी योजना है। मगर अब यह साफ हो गया है कि तमाम उपायों के बावजूद अगर वायु प्रदूषण पर काबू पाना चुनौती बना हुआ है, तो इसकी वजहें दूसरी हैं। वायु प्रदूषण का बड़ा कारण वाहनों से निकलने वाला धुआं है। इसे कम करने के भी कई उपाय सरकार आजमा चुकी है, पर उस पर काबू नहीं पाया जा पा रहा।

हालांकि वाहनों में पहले से ही ऐसे यंत्र लगाये जाने लगे हैं, जो धुएं को पानी में बदल देते हैं, उसे हवा में घुलने नहीं देते। बसों में सीएनजी इस्तेमाल होने लगी है। अब बैट्री चालित टैक्सियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। मगर दुपहिया वाहनों से निकलने वाले धुएं पर काबू पाना कठिन बना हुआ है। आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण दुपहिया वाहनों की वजह से फैलता है। दिल्ली की सड़कों पर दुपहिया वाहनों की संख्या निरंतर बढ़ रही है, इसलिए इनसे निकलने वाला धुआं चुनौती बना हुआ है। फिर चोरी-छिपे बहुत सारे धुआं उगलने वाले छोटे और मंझोले उद्योग-धंधे भी दिल्ली के अंदर चल रहे हैं। इस दिशा में जब तक कोई व्यावहारिक उपाय नहीं निकाला जाएगा, तब तक इस समस्या पर काबू पाना कठिन बना रहेगा।