राजनीतिक दबाव से मुक्‍त होकर काम करे पुलिस
राजनीतिक नेतृत्‍व द्वारा पुलिस का दुरुपयोग कोई नई बात नहीं है। पहले अंग्रेजों ने अपना वर्चस्‍व स्‍थापित करने, निगरानी रखने और जबरदस्‍ती करने के लिए पुलिस तैनात की थी, जो भारतीय पुलिस की स्‍थायी विशेषता बनी हुई है। आज राज्‍य सरकारें पुलिस प्रशासन का दुरूपयोग करती हैं।

राजनीतिक दबाव से मुक्‍त होकर काम करे पुलिस

युगवार्ता    01-Apr-2022
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राजनीतिक नेतृत्‍व द्वारा पुलिस का दुरुपयोग कोई नई बात नहीं है। पहले अंग्रेजों ने अपना वर्चस्‍व स्‍थापित करने, निगरानी रखने और जबरदस्‍ती करने के लिए पुलिस तैनात की थी, जो भारतीय पुलिस की स्‍थायी विशेषता बनी हुई है। आज राज्‍य सरकारें पुलिस प्रशासन का दुरूपयोग करती हैं। पुलिस का काम न्‍याय व्‍यवस्‍था कायम करना, लोकतांत्रिक मूल्‍यों को बनाए रखना और मजबूत करना है। उन्‍हें किसी भी तरह की सत्‍तावादी प्रवृत्ति को पनपने नहीं देना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्‍त होकर काम करना चाहिए। तानाशाही शासन से हमारी समृद्ध सांस्‍कृतिक विविधता को कायम नहीं रखा जा सकता है। हमारी सांस्‍कृतिक विविधता कायम रखने के लिए लोकतांत्रिक शासन जरूरी है। हालिया उदाहरण बंगाल का है। वहां जिस तरह पॉलिटिकल लीडरशीप के इशारे पर बंगाल पुलिस नाच रही है, उस तरह बंगाल पुलिस को नाचने की जरूरत नहीं है। बंगाल पुलिस का काम तृणमूल की राजनीति को संरक्षण देना नहीं है। बल्कि उसका काम नागरिक को संरक्षण देना है। कानून व्‍यवस्‍था का यही अर्थ होता है। बंगाल में इसी पर खतरा है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्‍य न्‍यायाधीश सीबीआई के 19 वें डीपी कोहली स्‍मृति व्‍याख्‍यानमाला में बंगाल का नाम लिये बिना जब यह बोल रहे थे तो निश्चित ही उनके जेहन में बंगाल की घटना रही होगी। प्रधान न्‍यायाधीश "लोकतंत्र: जांच एजेंसियों की भूमिका और उत्‍तरदायित्‍व" विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि समय के साथ हर प्रतिष्ठित संस्‍थान की तरह सीबीआई भी सार्वजनिक जांच के दायरे में आ गई है। कुछ मामलों में इसकी निष्क्रियता ने इसकी विश्‍वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। आज इसके साख पर सवाल उठ रहे हैं। यब बात हर पुलिस प्रशासन पर भी अक्षरश: लागू होती है। इसलिए सामाजिक वैधता और जनता के विश्‍वास को फिर से हासिल करना समय की मांग है। इसके लिए सबसे जरूरी और पहला कदम है राजनीतिक कार्यकारिणी के साथ गठजोड़ को तोड़ना। क्‍योंकि पुलिस या सीबीआई की निष्‍ठा संविधान और कानून के शासन के प्रति होनी चाहिए, न कि किसी व्‍यक्ति के प्रति। राजनीतिक कार्यपालिका समय के साथ बदल जाएगी, लेकिन आप एक संस्‍था के रूप में स्‍थायी हैं, इसलिए आपको अभेद्द और स्‍वतंत्र रहना चाहिए।
हाल के दिनों में खासकर बंगाल में राज्‍य और केंद्रीय एजेंसियों के बीच तकरार की खबरें सामने आईं। यह चिंताजनक है। इस बाबत प्रधान न्‍यायाधीश का कहना है कि राज्‍य और केंद्रीय एजेंसियों के बीच सामंजस्‍यपूण संबंध होने चाहिए। क्‍योंकि सभी संगठनों का लक्ष्‍य न्‍याय सुरक्षित करना है। कई बार यह देखने में आता है कि एक घटना की कई जांच एजेंसियों द्वारा जांच करने से सबूत कमजोर पड़ जाते हैं। इसकी वजह से निर्दोर्षों को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ता है। इसलिए एक स्‍वतंत्र अंब्रेला इंस्‍टीट्यूशन के निर्माण की आवश्‍यकता है ताकि सभी जांच एजेंसियों को एक छत के नीचे लाया जा सके। और किसी भी घटना की सूचना मिलने के बाद यह संगठन ही तय करेगा कि इसकी जांच कौन सी विशेष शाखा करेगी। यही वजह है कि उत्‍तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह पुलिस आयोग के लिए आवाज उठाते रहे हैं। कहने की आवश्‍यकता नहीं कि जब पुलिस प्रशासन राजनीतिक दबाव से मुक्‍त होकर काम करेगा तो लोगों को जल्‍दी न्‍याय मिलेगा।