महंगाई का अंत कब ?
आसमान छूती महंगाई से देश की अधिसंख्य जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। लेकिन न कहीं कोई प्रदर्शन है और न कोई चर्चा-परिचर्चा। क्योंकि खबरों का नैरिटिव है विकास के लिए नागरिकों के सुखों की कुर्बानी। इसलिए चर्चा श्रीलंका और पाकिस्तान के महंगाई की होती है भारत के महंगाई की नहीं।

महंगाई का अंत कब ?

युगवार्ता    24-May-2022
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inflation_1र में खाना बनाना महंगा, बाहर खाना खाना महंगा, चाय पीना महंगा, सफर करना महंगा क्या बताएं क्या-क्या महंगा है। यह कहना किसी एक-दो-तीन का नहीं बल्कि देश के अधिकतर लोगों का है। इसके देश में करीब 20 करोड़ की ऐसी आबादी हैं जिन्हें बामुश्किल दो जून की रोटी मिल पाती है। बाकि की अवश्यकताएं इनकी नियति में नहीं हैं। यूं तो कोरोना महामारी और यूक्रेन-रूस युद्ध का निकट भविष्य में अंत निश्चत है लेकिन महंगाई का तांडव कब समाप्त होगा किसी को नहीं मालूम।
आज महंगाई देश के सबसे अहम मुद्दों में से एक है। आवश्यक वस्तुओं, सब्जियों, खाद्य तेल, सीएनजी और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि ने आम लोगों का जन-जीवन प्रभावित किया है। यानी सब्जी की दुकान से लेकर पेट्रोल पंप तक हर तरफ महंगाई की मार है। हाल के दिनों में भारत में खुदरा महंगाई दर आसमान छू रही है। यदि इसी तरह महंगाई बढ़ती रही तो स्थिति जल्द ही स्थिति और भी बदतर हो जाएगी। केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार सभी महंगाई कम करने के बजाए केवल एक दूसरे पर आरोप लगाते हैं।

केंद्रीय भत्ता बढ़ाकर महंगाई से निजात वाला तरीका गरीबों से क्रूर मजाक के सिवा और कुछ नहीं है। विकास भी जरूरी है और गरीब जन का जीवन भी। इसलिए एक कल्याणकारी राष्ट्र के नाते सभी बिंदुओं पर तर्कसंगत निर्णय जरूरी है।

 
हालांकि 4 मई को आनन-फानन में बैठक कर रिजर्ब बैंक (आरबीआई) ने अचानक रेपो रेट बढ़ाने का ऐलान कर दिया। रेप रेट 0.40 फीसदी बढ़ाकर 4.40 फीसदी कर दिया गया। यह फैसला बेकाबू होती महंगाई के कारण लिया गया। रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि मार्च 2022 में खुदरा महंगाई दर तेजी से बढ़कर 7 फीसदी पहुंच गयी।
विशेषकर खाद्य सामग्री की महंगाई के कारण खुदरा महंगाई तेजी से बढ़ी है। उन्होंने कहा कि महंगाई बढ़ने का एक कारण जिओपॉलिटिकल टेंशन भी है। लेकिन गवर्नर शक्तिकांत दास ने जिओपॉलिटिकल शब्द को कसूरवार बता कर पल्ला झाड़ लिया।

देखते-देखते महज 2 साल में ही घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की कीमत लगभग दोगुना के करीब हो गई। जिस घर में दवा का पैसा न हो वो एक हजार रुपये के गैस सिलेंजर कहां से भरवाएगा। आखिर गृहणियों को धुएं से निजात इसी महंगे सिलेंडर से मिलेगी क्या? आखिर ऐसे में गांव की गरीब जनता फिर से सिलेंडर के सपनों का गलाघोंट कर लकड़ी से खाना बनाने के लिए मजबूर होगी।

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इसी तरह पिछले कुछ वर्षों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि के पीछे प्राथमिक कारण केंद्र सरकार के उत्पाद शुल्क और राज्य सरकार के वैट का धीरे-धीरे बढ़ना है। क्योंकि पेट्रोल और डीजल पर केंद्र द्वारा उत्पाद शुल्क और राज्यों द्वारा वैट शुल्क अधिक लेने से पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं। हालांकि, डीजल और पेट्रोल पर टैक्स हर राज्य में अलग-अलग होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि राज्य अलग-अलग बिक्री कर या वैट राशि लगाते हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल को अधिक कीमत को आधार बनाकर जिस तरह रोना रोया जा है इसमें सच्चाई आंशिक है। क्योंकि ऐसा पहली बार नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहली बार क्रूड ऑयल की कीमते 100 डॉलर के ऊपर हैं। गौरतलब है कि अभी भी ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 110 डॉलर के आसपास है जबकि साल 2008 में क्रूड ऑयल के दाम 147 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। लेकिन तब पेट्रोल के दाम 50 रुपये लीटर था। वहीं अब पेट्रोल के दाम 104 रुपये से लेकर 120 रुपये (मुंबई) तक है।

बात करें पेट्रोल-डीजल पर केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी और राज्य सरकार के वैट की तो इसमें अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। बजट 2008 के अनुसार एक लीटर पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 14.35 रुपये और डीजल पर 4.65 रुपये थी। जबकि 2014 में पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 9.48 रुपए और डीजल पर 3.56 रुपए थी। वहीं आज पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी क्रमश: 27.90 रुपये और 21.28 रुपये है। इससे स्पष्ट है कि विगत 6 वर्षों के दौरान केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 250 फीसदी तक वृद्धि की है।

राजनीति में हर पार्टी दोष दूसरे पक्ष पर लगाना पसंद करती है। इस समय, दोनों पक्षों को केवल एक-दूसरे पर उंगली उठाने के बजाय कुछ करने की जरूरत है। केंद्र पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क में कटौती कर आम जनता को भारी राहत दे सकती है। इसी तरह राज्य सरकारें भी सहयोग कर वैट घटाकर पेट्रोल-डीजल के दामों को 75 रुपये से नीचे कर सकती है।

केवल यह ढोंग दिखा कर कि महंगाई का कारण वैश्विक है यह देश की जनता को छलने से अधिक कुछ नहीं है। ये बहुत कठिन समय हैं। इसका समाधान केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को मिलकर करना होगा। यह महंगाई रूपी वैश्विक तूफान है। जिससे निजात के लिए घरेलू स्तर से लेकर वैश्विक स्तर पर सबको प्रयास करना चाहिए। तभी महंगाई से निजात मिलेगी।

महंगाई के इस दौर में अच्छा है कि देश में मुफ्त भोजन राशन जारी है अन्यथा करोडों लोग भूखे मर जाते। लेकिन मामला केलव भोजन तक सीमित नहीं है। बच्चे को पढ़ाने से लेकर वृद्धों के देखभाल की जिम्मेदारी एक परिवार पर होती है। वैश्विक भुखमरी सूचकांक 2021 में भारत को 116 देशों की सूची में 101वां स्थान प्राप्त हुआ है। जो एक गंभीर स्थिति को प्रदर्शित करता है। केंद्र और राज्य सरकार के लाख प्रयास के बावजूद गांव के एक बड़े गरीब तबके की बेरोजगारी, बाल कुपोषण, महंगी शिक्षा, आधारभूत सुविधाओं का अभाव ऐसे तथ्य हैं, जिनपर ध्यान रखकर नीतियां बनानी चाहिए। जब देश के 9-10 अमीरों के पास 50 फीसदी आबादी के बराबर संपत्ति हो तो महंगाई का प्रभाव गरीब और मध्य वर्ग पर कितना क्रूर होगा इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। केंद्रीय भत्ता बढ़ाकर महंगाई से निजात वाला तरीका गरीबों से भद्दा मजाक के सिवा आर कुछ नहीं है। विकास भी जरूरी है और गरीब जन का जीवन भी। इसलिए एक कल्याणकारी राष्ट्र के नाते सभी बिंदुओं पर तर्कसंगत निर्णय जरूरी है। जिससे महंगाई से निजात भी मिले और देश का विकास भी हो।