गोल मार्केट: कल,आज और कल
दिल्ली के भू-दृश्य में उसका इतिहास पत्थरों से बनी ऐतिहासिक सल्तनतकालीन एवं मुगलकालीन इमारतों के रूप में अंकित है। उसके किलों, मस्जिदों और मकबरों में मध्यकालीन संसार सजीव हो उठता है। दूसरी ओर लुटियन की दिल्ली की राजकीय नगर-योजना और निर्माण कला को देखकर ब्रिटिश काल की याद आती है। यहां के शासकों की सत्ता के प्रतीक माने जाने वाले स्मारकों कुतुब मीनार, लाल किला, हुमायूं का मकबरा, वायसराय का आवास, सेक्रेटेरिएट और काउंसिल हाउस के अलावा शहर के घटनापूर्ण इतिहास की झलक अनगिनत अन्य स्थानों पर भी मिलती है। उन्हीं स्था

गोल मार्केट: कल,आज और कल

युगवार्ता    20-Jan-2023
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दिल्ली का दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस से सटे गोल मार्केट का इतिहास बहुत पुराना है। जब दिल्ली को राजधानी घोषित किया गया था, तब दिल्ली को डिजाइन करने वाले सर एडविन लुटियन ने सन् 1921 में गोल मार्केट का निर्माण करवाया था। नई दिल्ली नगरपालिका परिषद ने इसे 'नई दिल्ली म्यूजियम' बनाने का प्रस्ताव दिया है लेकिन व्यापारियों के विरोध की वजह से यहां काम रुका हुआ है।

 
Golmarket

विजय कुमार राय

दिल्ली के भू-दृश्य में उसका इतिहास पत्थरों से बनी ऐतिहासिक सल्तनतकालीन एवं मुगलकालीन इमारतों के रूप में अंकित है। उसके किलों, मस्जिदों और मकबरों में मध्यकालीन संसार सजीव हो उठता है। दूसरी ओर लुटियन की दिल्ली की राजकीय नगर-योजना और निर्माण कला को देखकर ब्रिटिश काल की याद आती है। यहां के शासकों की सत्ता के प्रतीक माने जाने वाले स्मारकों कुतुब मीनार, लाल किला, हुमायूं का मकबरा, वायसराय का आवास, सेक्रेटेरिएट और काउंसिल हाउस के अलावा शहर के घटनापूर्ण इतिहास की झलक अनगिनत अन्य स्थानों पर भी मिलती है।

उन्हीं स्थानों में से एक स्थान हैं दिल्ली में स्थित गोल मार्केट। कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान कनॉट प्लेस रेनोवेशन प्लान के साथ-साथ गोल मार्केट को भी म्यूज़ियम में बदलने की योजना थी। साल 2003 में इस ऐतिहासिक मार्केट को रेनोवेट कर म्यूजियम बनाने का प्लान मदन थपलियाल ने तैयार किया लेकिन दुकानदारों ने एनडीएमसी के इस फैसले के विरोध में कोर्ट में याचिका दायर कर दी, जिसके बाद मामला लटक गया था। लेकिन अब दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस से सटे हुए गोल मार्केट की तस्वीर जल्द ही बदल जाएगी। एनडीएमसी का कहना है कि दिल्ली के गोल मार्केट को आने वाले दिनों में दिल्ली संग्रहालय के नाम से जाना जाएगा। जल्दी ही यहां एक म्यूजियम के निर्माण का काम शुरू होने वाला हैं। एनडीएमसी का कहना है कि कोशिश होगी कि बेज़ान पड़े गोल मार्केट को तय वक़्त में नई रंगत के साथ तैयार किया जा सके।

एनडीएमसी के एक अधिकारी का कहना है कि 'नई दिल्ली म्यूज़ियम' के नाम से गोल मार्केट दिल्ली वालों को ही नहीं बल्कि देश-विदेश से आने वाले सैलानियों को भी अपनी तरफ आकर्षित करेगा। 'नई दिल्ली म्यूज़ियम' में दिल्ली के 100 साल के इतिहास को जानने का मौका मिलेगा। म्यूज़ियम में ऐतिहासिक तस्वीरें, आज़ादी से पहले और बाद की महत्वपूर्ण जानकारियां, अलग-अलग रियासतों के नवाबों के गिफ्ट, लुटियंस जोन का डिज़ाइन और देश के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन किया जाएगा।

नई दिल्ली इलाके के सौंदर्यीकरण में गोल मार्केट का अब तक खंडहर बने रहना सबसे बड़ी चुनौती है। लिहाज़ा अगर तय वक़्त में एनडीएमसी अपनी योजना पूरी कर लेती है तो फिर स्मार्ट सिटी की फेहरिस्त में एनडीएमसी पहले पायदान पर पहुंच सकता है।
दिल्ली ही नहीं देश का इतिहास बताने के लिए 'नई दिल्ली म्यूज़ियम' में तब्दील हो रहे गोल मार्केट का इतिहास भी दिलचस्प है। जानकार बताते हैं कि अंग्रेज़ों ने जब दिल्ली को अपनी राजधानी के रूप में चुना, उसके बाद दिल्ली में लुटियंस जोन के अंतर्गत गोल मार्केट को डिज़ाइन किया गया था। ब्रिटिश नौकरशाहों और भारतीय सरकारी कर्मचारियों के लिए गोल मार्केट में मंडी बनाई, जिसमें सब्जी, अंडे और मछली की बिक्री होती थी। बाद में इस मार्केट में 20-22 दुकानें खोली गईं। पहली मंजिल पर एक इंस्टिट्यूट भी था। अब एक बार फिर इस ऐतिहासिक स्थल को म्यूजियम के रूप में तैयार करने की योजना पर अमल किया जा रहा है।

आजादी से पहले पाकिस्तान के लाहौर से आए हुए राज कुमार भाटिया की गोल मार्केट में सैलून की दुकान हुआ करती थी। लेकिन अब वह दुकान भगत सिंह मार्केट में शिप्ट कर दी गई है। राज कुमार भाटिया बताते हैं कि पहले यह कब्रिस्तान हुआ करता था। धीरे-धीरे इसे मार्केट का रूप दिया गया। यहां पर कुछ प्राइवेट दुकानें और कुछ सरकारी दुकानें हुआ करती थी जिसे लोगों को सरकारी रेट पर दिया गया था। यह मार्केट अंग्रेजों के समय बनाई हुई मार्केट है। राजकुमार भाटिया आगे बताते हैं कि पहले से अब बहुत कुछ बदल गया है। पहले बजारों में ज्यादा रौनक नहीं थी लेकिन आज के वर्तमान परिदृश्य में यहां चहल पहल ज्यादा हो गई है। एनडीएमसी द्वारा गोल मार्केट में दिल्ली संग्रहालय बनाए जाने वाले सवाल पर राज कुमार भाटिया ने कहा कि बात तो बहुत होती है जब बन जाए तब देखा जाएगा।

गोल मार्केट में पप्पी मछली और चिकन शॉप के मालिक मोहम्मद उसमान बताते हैं कि उनकी दुकान बहुत पुरानी है और यह उनका पुश्तैनी काम हैं। जब अंग्रेज दिल्ली आए हुए थे तब से इनकी दुकान यहीं पर हैं। उनका कहना है अगर एनडीएमसी यहां संग्रहालय बनाएगी तो हम लोग कहां जाएंगे। इसके लिए सरकार और एनडीएमसी को सोचना चाहिए। रॉयल कलेक्शन के नाम से गोल मार्केट में रेडिमेड कपड़े की दुकान चलाने वाले सुमित बताते हैं कि गोल मार्केट के सभी भवन हेरिटेज बिल्डिंग हैं। सरकार को इसकी मरम्मत कर इसे दुकान ही बनाना चाहिए।

वहीं 81 साल के राज किशोर बंसल बताते हैं कि इनकी दुकान सन् 1923 से गोल मार्केट में है। उनके पिता लालाश्री प्रभु दयाल बंसल जो जिला रोहतक वाले के नाम से जाने जाते थे। वह बताते हैं कि हमारी दुकान का आवंटन सन् 1937 से है। दस साल तक हम लोगों ने ब्रिटिश गवर्नमेंट में दुकाने चलाई। उस समय अग्रेजों द्वारा यहां चार पेड़ भी लगाए गए थे। लेकिन सड़क के विकास के लिए तीन पेड़ों को काट दिया गया। आज भी एक पेड़ उस समय का है। उस समय 1923 में हमारे पिता जी रोहतक का घी बेचा करते थे। जिसका दाम हुआ करता था एक रुपये शेर। उस समय 40 रुपये की साईकिल बिका करती थी। तब से यहां पर हमारी दुकाने हैं। अब एनडीएमसी वाले आते हैं। नाप जोख करते हैं। कहते हैं यहां संग्रहालय बनाया जाएगा। मेरा मानना है संग्रहालय होना भी चाहिए। लेकिन गोल मार्केट में क्यों। यदि यहां संग्रहालय बना दिया जाएगा तो हम लोग कहां जाएंगे। हमारी मांग है कि अगर यहां संग्रहालय बनाया जाएगा तो इतनी ही बड़ी दुकान हमें गोल मार्केट में दिया जाय। कहीं और देंगे तो हमारा व्यवसाय तो खत्म हो जाएगा। हम लोग रोड पर आ जाएंगे। इसकी चिंता कौन करेगा।

दिल्ली नगरपालिका परिषद के उपाध्यक्ष सतीश गुप्ता के अनुसार काफी समय से लंबित गोल मार्केट भवन को संग्रहालय में बदलने की परियोजना को दोबारा शुरू कर दिया गया है। इसके लिए टीम गठित कर क्षेत्र के आसपास का निरीक्षण भी हो चुका है। इस पूरे प्रोजेक्ट के लिए आर्थिक स्वीकृति भी है। बाकी आगे की प्रक्रिया इस वर्ष अप्रैल माह से शुरू हो जाएंगी। विडंबना ही है कि एनडीएमसी के स्मार्ट सिटी प्लान के अंर्तगत नई दिल्ली इलाके के सौंदर्यीकरण में गोल मार्केट का अब तक खंडहर बने रहना सबसे बड़ी चुनौती है लिहाज़ा अगर तय वक़्त में एनडीएमसी अपनी योजना पूरी कर लेती है तो फिर स्मार्ट सिटी की फेहरिस्त में एनडीएमसी पहले पायदान पर पहुंच सकता है।