2023: चुनौतियां व संभावनाएं
यह पूरा वर्ष विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनाव की पृष्ठभूमि के कारण राजनीतिक घमासान का वर्ष रहेगा।

2023: चुनौतियां व संभावनाएं

युगवार्ता    05-Jan-2023
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यह पूरा वर्ष विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनाव की पृष्ठभूमि के कारण राजनीतिक घमासान का वर्ष रहेगा। चुनाव के मद्देनजर भाजपा विरोधी कुछ नेताओं और पार्टियों की आक्रामक मोर्चाबंदी पूरे वर्ष देखने को मिलेगी। साथ ही जिस तरह चीन के मुद्दे पर कांग्रेस सहित संपूर्ण विपक्ष ने अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की उसकी प्रतिध्वनि इस वर्ष भी गुंजित होती रहेगी।

 
2023

अवधेश कुमार

र नया वर्ष पुराने वर्ष का ही विस्तार होता है । 2023 भी इसका अपवाद नहीं है। वर्ष 2022 के आरंभ और अंत तक घटी घटनाएं तथा अनेक घटनाओं की तैयार होती आधारभूमि से ही 2023 का ताना-बाना खड़ा होगा। इस वर्ष का सूर्योदय ऐसे समय हुआ जब भारत सहित पूरी दुनिया में कोरोना फिर से भय पैदा कर रहा है। पिछले तीन वर्षों में कोरोना ने पूरी दुनिया को हलकान किया है। इसका प्रकोप कैसा होगा, कितना होगा, होगा कि नहीं होगा यह भविष्य के गर्त में है लेकिन कोरोना 2023 में भी बड़ी चुनौती के रूप में हमारे सामने मंडरा रहा है। कोरोना केवल एक बीमारी नहीं है। यह अपने साथ आर्थिक- सामाजिक- सांस्कृतिक समस्याएं लेकर आता है।

पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश में एक ऐसा बड़ा वर्ग तैयार हो गया है जो वैसी हर परिस्थिति की ताक में रहता है जिसके आधार पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के साथ भाजपा, संघ आदि की छवि मटियामेट करने का अभियान चला सके। निश्चित रूप से आम लोग ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि फिर कोरोना की त्रासदी हमारे देश में न आए। दूसरी ओर ऐसे वर्ग भी होंगे जिनकी कामना होगी कि कोरोना से ऐसी स्थितियां पैदा हों जिनसे वे पिछली बार की तरह पूरी दुनिया में नरेंद्र मोदी सरकार को बदनाम कर पाए। पढ़ने सुनने में शायद अजीब लगे किंतु वर्तमान भारत का यह दुर्भाग्यपूर्ण सच है।
 
 इस वर्ष ज्ञानवापी और मथुरा श्री कृष्ण जन्मभूमि विवाद मामले में संभव है कोई फैसला भी आए। फैसला नहीं भी आए तो इसकी सुनवाई और न्यायालय की टिप्पणियों तथा इसमें वादी - प्रतिवादी पक्षों की गतिविधियों से माहौल पूरी तरह गर्म रहेगा।
 

ऐसा नहीं है कि कोरोना का प्रकोप नहीं हो तो फिर दूसरे प्रकार से इसकी कोशिश नहीं होगी। हमने इस वर्ष अग्निवीर योजना को लेकर देशभर में हुई हिंसा को देखा। इसी तरह वाराणसी ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वे के न्यायालयी आदेश के विरुद्ध हिंसा और और दंगे का दृश्य भी हमारे सामने रहा। 2023 में भी हमें इसके विस्तार के लिए तैयार रहना होगा। धीरे-धीरे यह साबित हो गया कि इनके पीछे ऐसे संगठनों की भूमिका है जो देश को हिंसा और अराजकता में झोंककर अपना कुत्सित उद्देश्य पूरा करने के लिए सक्रिय है। ये शक्तियां किसी न किसी बहाने देश में उपद्रव, हिंसा, आगजनी, सामाजिक - सांप्रदायिक तनाव आदि पैदा करने की कोशिश करते रहेंगे। वैसे भी 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले ऐसा माहौल बनाने की कोशिश होगी जिससे सरकार बदनाम हो और नरेंद्र मोदी को विफल प्रधानमंत्री और बड़े वर्ग के खलनायक के रूप में पेश किया जाए।

न्यायालय ने मथुरा के शाही ईदगाह मस्जिद में भी सर्वे का आदेश दे दिया है। इस वर्ष ज्ञानवापी और मथुरा श्री कृष्ण जन्मभूमि विवाद मामले में संभव है कोई फैसला भी आए। फैसला नहीं भी आए तो इसकी सुनवाई और न्यायालय की टिप्पणियों तथा इसमें वादी - प्रतिवादी पक्षों की गतिविधियों से माहौल पूरी तरह गर्म रहेगा। भारत विरोधी तथा देश के अंदर सक्रिय जेहादी आतंकवादी कट्टरपंथी शक्तियां इसका लाभ उठाकर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के लिए हर संभव कोशिश करेंगी।

 
जब भी भारत जैसा कोई देश अपनी समस्त संभावनाओं को पहचान कर विश्व की पहली पंक्ति के देशों के समक्ष होने की कोशिश करता है तो उसे बाहरी एवं आंतरिक अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। भारत कई वर्षों से इसी दौर से गुजर रहा है।
 
 
नूपुर शर्मा द्वारा एक टीवी चैनल पर बहस में मोहम्मद पैगंबर साहब के संदर्भ में की गई टिप्पणियों को नबी की शान में गुस्ताखी कह कर सर तन से जुदा करने के लगते नारे तथा उसके आधार पर उदयपुर से अमरावती तक सिर तन से जुदा करने की घटनाओं पर विराम लग जाएगा ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। दोनों मामलों के आरोप पत्र में साफ किया गया है कि हत्यारे और उनको सहयोग करने वाले समूह कट्टरपंथी समूहों से जुड़े थे और उनका मानस बदला जा चुका था। उदयपुर के हत्यारे पाकिस्तान स्थित दावत-ए-इस्लामी संगठन से जुड़े थे तो अमरावती के तब्लीगी जमात से।

साफ है कि इस तरह की मानसिकता इन दो स्थानों पर गिरफ्तार हुए कुछ ही लोगों तक सीमित नहीं होगी। इसका विस्तार हुआ होगा और ज्यादा संख्या में मजहबी कट्टरपंथी हिंसक मॉड्यूल तैयार हुए होंगे। वे दूसरे बहाने कुछ बड़ी घटनाएं करने की कोशिश करेंगे। जम्मू कश्मीर में साल के अंत में हमने देखा कि किस तरह पाकिस्तान से प्रवेश कर गए चार आतंकवादी भारी हथियार लेकर बड़े हमले करने जा रहे थे। भूसे से भरे ट्रक में छिपे बैठे थे और 4 घंटे से ज्यादा मुठभेड़ के बाद उन पर काबू पाया जा सका। चूंकि सरकार जम्मू कश्मीर में चुनाव कराने की तैयारी कर रही है, इसलिए ये शक्तियां वहां ज्यादा आक्रामक होकर हिंसा का षड्यंत्र रचेंगी। यह अलग बात है कि अब जम्मू कश्मीर में पहले वाली स्थिति नहीं है। बावजूद चुनौतियां हमारे सामने बनी रहेंगी।

 
राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के जरिए देशभर के भाजपा संघ और मोदी विरोधी एनजीओ सहित अन्य समूहों ने आपस में एकता बनाने की कोशिश की है। संभव है सरकार के विरुद्ध कोई बड़ा आंदोलन और संघर्ष आरंभ करने की कोशिश हो।
 

जब भी भारत जैसा कोई देश अपनी समस्त संभावनाओं को पहचान कर विश्व की पहली पंक्ति के देशों के समक्ष होने की कोशिश करता है तो उसे बाहरी एवं आंतरिक अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। भारत कई वर्षों से इसी दौर से गुजर रहा है। जाहिर है, 2023 इससे बिल्कुल अलग नहीं हो सकता। चीन ने अरुणाचल प्रदेश के तवांग में सैनिक घुसपैठ करने की कोशिश ही इसलिए की ताकि भारत को दबाव में बनाए रखा जाए। जून, 2020 में गलवान में चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा में घुसपैठ करने का दुस्साहस किया था और उसके परिणामस्वरूप कोरोना के प्रकोप से जूझते हुए भी भारत को सीमा सुरक्षा की दृष्टि से हर वह कदम उठाना पड़ा था जो कोई देश आसन्न युद्ध को देखते हुए उठाता है। तवांग घुसपैठ के बाद भारत ने सुरक्षा की समीक्षा की। वायु सेना, नौसेना और थलसेना तीनों हर मिनट परिचालन की अवस्था में हैं। चीन की स्थिति को देखते हुए भारत चाहे न चाहे उसे भारी खर्च उठाते हुए ऐसी ही स्थिति में लंबे समय तक रहना पड़ेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि हम डंके की चोट पर सीमा तक सड़कें बना रहे हैं। यह चीन को चुनौती थी कि हम अपनी सीमा में आपके भौगोलिक विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को देखते हुए हर व्यवस्था करेंगे आपको भले वह नागवार गुजरे।

रूस यूक्रेन युद्ध के कारण विश्व में तेल के दाम और खाद्यान्नों की समस्या से भी भारत को जूझना ही पड़ेगा। 2022 के अंत तक दुनिया के प्रमुख देशों ने भारत एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ऐसा व्यक्तित्व मान लिया जो व्लादिमीर पुतिन से बात कर युद्ध रुकवाने में भूमिका निभा सकते हैं। नरेंद्र मोदी ने व्लादिमीर पुतिन से बातचीत में कहा भी कि यह युद्ध का समय नहीं है। बावजूद अभी तक इसकी कोई संभावना नहीं दिख रही है। भारत ने अपने व्यापक हितों का ध्यान रखते हुए इस युद्ध में कोई पक्ष बनने से अभी तक स्वयं को बचाए रखा है। इस कारण अमेरिका और यूरोप सहित नाटो के देश नाखुश भी हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इन देशों को सही जवाब दिया और कहा कि जब चीन हमारी सीमाओं पर अतिक्रमण कर रहा था, हम उसका सामना कर रहे थे तो आप सुझाव दे रहे थे कि उनके साथ व्यापार बढ़ाएं। 2023 में भारत की विदेश नीति इसी तरह प्रखर रहेगी जिनकी चुनौतियां भी होंगी। अगर भारत को प्रमुख देश सीख देंगे तो भारत उनका अपने अनुभवों के अनुसार खुला उत्तर देगा तथा व्यापक राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए ही कदम उठाएगा।

युद्ध किसी के हित में नहीं है। ब्लादिमीर पुतिन ने रूस को महाशक्ति बनाने की दृष्टि से अपना राष्ट्रीय लक्ष्य बनाया हुआ है और वे इस युद्ध के माध्यम से उसकी पूर्ति करना चाहते हैं। अभी तक यूक्रेन को हथियार डालने के लिए विवश करना संभव नहीं हुआ है क्योंकि अमेरिका और दूसरे नाटो देशों ने उसे हर संभव हथियार और धन मुहैया कराया। संयुक्त राष्ट्रसंघ तनाव को दूर करने में पहले की ही भांति लाचार साबित हुआ है। भारत की नीति 2022 में भी संयुक्त राष्ट्र को महत्व देने और उसके सानिध्य में तनाव को सुलझाने की रही। बावजूद इसमें सफलता नहीं मिली। चीन जिस तरह ताइवान की सैनिक घेरेबंदी कर रहा है वह भी भारत की चिंता का कारण है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ताइवान के विरुद्ध किसी तरह की कार्रवाई की तो भारत के लिए निरपेक्ष रहना कठिन होगा। निश्चित रूप से 2023 में भारत के विदेश और रक्षा मंत्रालय में मंथन के साथ संभावनाओं के अनुरूप तैयारियां भी होंगी। जी 20 का अध्यक्ष होने के कारण भारत मेजबानी की तैयारी में 2022 से ही लग गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी टीम ने जी-20 के लिए नया थीम दिया है और उसके अनुरूप प्रमुख देशों की बैठक में विश्व को दिशा देने की कोशिश होगी। भारत ही नहीं दुनिया की नजर जी-20 के सम्मेलन पर रहेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसमें वैश्विक और द्विपक्षीय समस्याओं से लेकर विश्व के समक्ष कायम आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सहित सुरक्षा चुनौतियों पर क्या बात रखते हैं और भारत का एजेंडा क्या होता है यह निश्चित रूप से मायने रखेगा।

वर्तमान भारत की प्रमुख चुनौती विदेश एवं रक्षा नीति पर भी राजनीतिक एकता का न होना है। 2024 लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा विरोधी कुछ नेताओं और पार्टियों के आक्रामक मोर्चाबंदी पूरे वर्ष देखने को मिलेगा। जिस तरह चीन के मुद्दे पर कांग्रेस सहित संपूर्ण विपक्ष ने अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की उसकी प्रतिध्वनि इस वर्ष भी गुंजित होती रहेगी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव जैसे दो बड़े नेता मोदी विरोधी राष्ट्रव्यापी गठबंधन और मोर्चाबंदी की राह पर निकल पड़े हैं। दूसरी ओर राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा उत्तर प्रदेश और पंजाब से जम्मू कश्मीर तक जाएगी। राजस्थान में प्रवेश करने के साथ भारत जोड़ो यात्रा पर भाजपा ने जो स्टैंड लिया है उसको आधार बनाएं तो कह सकते हैं कि जम्मू कश्मीर जाते-जाते भी विवाद बना रहेगा। जो सूचना है कांग्रेस पार्टी राहुल के नेतृत्व में इन छोटी-छोटी अन्य यात्राओं की भी तैयारियां कर रही है। इस यात्रा में सम्मिलित देशभर के भाजपा संघ और मोदी विरोधी एनजीओ सहित अन्य समूहों ने आपस में एकता बनाने की कोशिश की है। संभव है सरकार के विरुद्ध कोई बड़ा आंदोलन और संघर्ष आरंभ करने की कोशिश हो।

शाहीनबाग से लेकर कृषि कानून विरोधी आंदोलनों को आधार बनाएं तो यह केंद्र और प्रदेश की भाजपा सरकारों के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ सकती है। पूर्व के दो आंदोलनों के प्रति सरकार के उदार रुख से समस्याएं सुलझने की बजाय ज्यादा जटिल हुई हैं। यह तो नहीं कह सकते कि सरकार आंदोलन के प्रति अनुदार हो जाए किंतु अगर उसमें अवांछित शक्तियां और असामाजिक तत्वों का प्रवेश दिखाई दे तो पूर्व के अनुभवों का ध्यान रखते हुए कानून के तहत कार्रवाई करने की मानसिक तैयारी होनी चाहिए। ऐसा नहीं हुआ तो देश विरोधी तत्व इसका लाभ उठाकर चुनौतियां बढ़ा सकते हैं। कृषि कानून विरोधी आंदोलन का लाभ उठाकर विदेश में बैठी खालिस्तान समर्थक शक्तियों ने किस ढंग से भारत को बदनाम करने और पंजाब में नए सिरे से विरोध पैदा करने की कोशिश की यह सामने है। पंजाब में 2022 में पुलिस की सुरक्षा में खालिस्तान समर्थक जुलूस निकले, पूरे वर्ष हथियारों के जखीरे और आतंकवादी पकड़े गए हैं, कुछ विस्फोट भी हुए हैं। भारत के लिए इस मायने में पंजाब 2023 में एक बड़ी चुनौती के रूप में उपस्थित रहेगा।

2024 लोकसभा चुनाव की दृष्टि से भाजपा पंजाब में विस्तार कर रही है। पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह सहित कांग्रेस एवं अन्य दलों के नेता भाजपा में शामिल हो रहे हैं। निश्चित रूप से भाजपा इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाएगी। हालांकि आम आदमी पार्टी को गुजरात चुनाव में सफलता नहीं मिली लेकिन दिल्ली एमसीडी में विजय से उसका उत्साह बढ़ा है। गुजरात में भी उसने कांग्रेस के वोट में अच्छी सेंध लगाई है। निश्चित रूप से इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में कम से कम कर्नाटक में वह हाथ आजमाना चाहेगी। पंजाब से वह कांग्रेस को सत्ताच्युत कर चुकी है। तो कांग्रेस के लिए आम आदमी पार्टी 2023 में भी राजनीतिक चुनौती बनी रहेगी। सच कहें तो कांग्रेस के लिए भाजपा से ज्यादा स्वयं विपक्षी दल ही चुनौती बने हुए हैं। त्रिपुरा चुनाव में अगर तृणमूल कांग्रेस ने ताल ठोंका तो वहां भी कांग्रेस के लिए समस्याएं खड़ी होंगी।

भाजपा एवं कांग्रेस के लिए कर्नाटक, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश त्रिपुरा आदि के चुनाव काफी महत्वपूर्ण है। त्रिपुरा वाम मोर्चा विशेषकर माकपा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। 2024 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा इन राज्यों में हर हाल में विजय की कोशिश करेगी। यह पूरा वर्ष विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनावों की पृष्ठभूमि के कारण राजनीतिक घमासान का वर्ष रहेगा। इसमें सरकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती विकास की उचित और कठोर नीति को बनाए रखना होगा। चुनावों के कारण हमारे देश में सरकारें लोकप्रियतावादी नीतियों की ओर बढ़ती हैं और इससे वास्तविक विकास एवं अन्य आवश्यक कार्य हाशिये में चले जाते हैं। हिमाचल चुनाव में कांग्रेस ने पुरानी पेंशन बहाली का वादा किया था जिसका भाजपा ने अलोकप्रियता का जोखिम उठाते हुए भी विरोध किया। उम्मीद करनी चाहिए कि केंद्र और भाजपा की प्रदेश सरकारें तथा दूसरी पार्टियों की सरकारें इस तरह देश की अर्थव्यवस्था को जोखिम पहुंचाने वाले कदम नहीं उठाएगी। आखिर कोरोना से मर्माहत हमारी अर्थव्यवस्था हर पहलू से बेहतरी का संकेत देते हुए भी अभी तक संपूर्ण रूप से सामान्य नहीं हो पाई है जो 2023 के लिए भी एक बड़ी चुनौती है।