अहीर रेजिमेंटः जरूरत या सियासत
सेना में अहीर रेजिमेंट की मांग वाकई समय की मांग है या वोट बटोरू सियासत। यह सवाल इसलिए क्योंकि आजमगढ़ से चुने गये नये नवेले भाजपा सांसद दिनेश लाल यादव निरहुआ ने अपनी ही सरकार के सामने यह मांग उठाई है। कहीं यह 2024 में यादव वोटरों को साधने की कवायद तो नहीं है।

अहीर रेजिमेंटः जरूरत या सियासत

युगवार्ता    06-Jan-2023
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सेना में अहीर रेजिमेंट की मांग वाकई समय की मांग है या वोट बटोरू सियासत। यह सवाल इसलिए क्योंकि आजमगढ़ से चुने गये नये नवेले भाजपा सांसद दिनेश लाल यादव निरहुआ ने अपनी ही सरकार के सामने यह मांग उठाई है। कहीं यह 2024 में यादव वोटरों को साधने की कवायद तो नहीं है।


रेजांग ला वॉर मेमोरियल

 बद्रीनाथ वर्मा

 
संसद के शीतकालीन सत्र में 15 दिसंबर को लोकसभा में शून्यकाल के दौरान एक नये-नवेले सांसद दिनेश लाल यादव निरहुआ ने अहीर रेजिमेंट की मांग कर एक नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि भारतीय सेना में जल्द से जल्द अहीर रेजिमेंट का गठन किया जाए। जिस दिन इस रेजिमेंट का गठन होगा, उस दिन चीन की रूह कांप जाएगी। क्योंकि 1962 में रेजांग ला चौकी पर अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए महज 123 अहीर जवानों ने 3 हजार चीनी सैनिकों को खदेड़ दिया था।

दरअसल, कुमाऊं रेजिमेंट में पहले हरियाणा के अहीर सैनिक हुआ करते थे। इसलिए उसे अहीर रेजिमेंट भी कहा जाता था। साल 1962 में रेजांग ला में भारतीय सेना और चीनी सेना के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में कुमाऊं रेजिमेंट की 13वीं बटालियन के सी कंपनी के जवान थे। कुल 123 वीर अहीरों ने 3 हजार चीनी सैनिकों को खदेड़ दिया। इसमें 114 भारतीय जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी याद में उसी जगह रेजांग ला वॉर मेमोरियल बनाया गया। जिसे अहीर धाम भी कहते हैं। उसी के बाद से अहीरों के लिए एक अलग इन्फेंट्री रेजिमेंट की मांग हो रही है। अहीर रेजिमेंट की मांग हरियाणा और राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में बड़े जोर-शोर से उठती रही है। हरियाणा में यादव रेवाड़ी, गुरुग्राम, भिवानी, महेंद्रगढ़ में अच्छी संख्या में हैं। इस पूरे क्षेत्र को अहीरवाल कहा जाता है। नार्थ-ईस्ट राजस्थान में भी यादवों की आबादी है। इन इलाकों में अहीर रेजिमेंट बनाने को लेकर धरना-प्रदर्शन चलता रहता है।

साल 1962 में रेजांग ला में कुमाऊं रेजिमेंट की 13वीं बटालियन के कुल 123 वीर अहीरों ने 3 हजार चीनी सैनिकों को खदेड़ दिया। इसमें 114 भारतीय जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी याद में उसी जगह रेजांग ला वॉर मेमोरियल बनाया गया। जिसे अहीर धाम भी कहते हैं।
 

उल्लेखनीय है कि जब अंग्रेज भारत आए थे तो अपने लिए पूरी फौज इंग्लैंड से नहीं लाए थे। वे कुछ अफसरों और जवानों के साथ ही यहां आए। फिर उन्होंने भारत में अपने अनुभवों के आधार पर सेना का निर्माण किया। वे पहले व्यापार के लिए आए थे, मगर उसके बाद उन्होंने यहां सेना बनाने का फैसला किया। फिर यहीं के लोगों को सेना में भर्ती किया। यानी जब थल सेना में रेजिमेंट बनाई गई थीं, तब भारत पर अंग्रेजों का शासन था। उस वक्त अंग्रेजों ने अपनी जरूरत आदि के आधार पर अलग अलग ग्रुपों में सेना में भर्ती की थी। ये भर्तियां जाति के आधार पर, क्षेत्र के आधार पर या फिर कम्युनिटी के आधार पर की गई हैं और ये रेजिमेंट भी इन आधार पर ही बनी। थलसेना में भी ये रेजिमेंट मुख्यतया इंफ्रेंट्री में देखने को मिलती हैं। यानी पैदल सेना। जो सबसे आगे लड़ाई लड़ते हैं।

जाति के आधार पर जो रेजिमेंट बनीं उनमें राजपूत, जाट, डोगरा, राजपूताना, महार आदि शामिल है। वहीं, क्षेत्र के आधार पर बनने वाली रेजिमेंट बिहार, कुमाउं, लद्दाख, मद्रास, असम आदि शामिल हैं। इनके अलावा कम्युनिटी के आधार पर गोरखा या मराठा जैसी रेजिमेंट बनाई गई। भारतीय सेना की इन्फ़ेंट्री में सिख, गढ़वाल, कुमाऊं, जाट, महार, गोरखा, राजपूत समेत 31 रेजिमेंट हैं। रेजिमेंट का अपना एक इतिहास रहा है, भारतीय सेना में मद्रास रेजिमेंट 200 साल से भी अधिक पुरानी है और कुमाऊं रेजिमेंट ने तो दोनों विश्व युद्धों में भाग लिया था। ब्रिटिश इंडियन आर्मी में सिख, पंजाब, गढ़वाल जैसी रेजिमेंट के अलावा बलोच और फ्रंटियर फ़ोर्स रेजिमेंट भी थीं बंटवारे के बाद बलोच और फ्रंटियर रेजिमेंट पाकिस्तान में चली गईं और पंजाब रेजिमेंट पाकिस्तान में भी है और भारत में भी है।

दरअसल, अंग्रेजों ने भारतीय समाज में व्याप्त जाति व्यवस्था की खामियों को और अधिक गहरा कर अपने राज को निष्कंटक बनाने के लिए जाति वाला रेजिमेंट बनाया था। अंग्रेजों का दावा था कि उन्होंने उन जातियों या क्षेत्र का चयन किया, जहां से लोग बहुत पहले से लड़ाई में हिस्सा लेते आ रहे हैं। ले‌किन, अंग्रेजों ने कम लड़ाकों को भी सेना में लिया। उन्होंने सेना में भर्ती की दो कैटेगरी बना रखी थी। मार्शल और नॉन मार्शल मार्शल। मार्शल वे लोग माने गए जो पुश्तैनी बहादुर और लड़ाके थे जबकि नॉन मार्शल में वे लोग माने गए जो लड़ाकू नहीं थे। अहीर मार्शल कैटेगरी में भर्ती हुए थे। यानी इन्हें पुश्तैनी लड़ाका माना गया था।

 

कब और कैसे बने रेजिमेंट

जब अंग्रेज भारत आए थे तो अपनी फौज लेकर नहीं आये थे बल्कि कुछ अफसरों व जवानों को ही लाए। फिर उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर यहीं के लोगों को भर्ती कर सेना का गठन किया। ये भर्तियां जाति के आधार पर, क्षेत्र के आधार पर या फिर कम्युनिटी के आधार पर की गई और रेजिमेंट भी इन्हीं आधार पर बने। पहला रेजिमेंट मद्रास रेजिमेंट था। इसके बाद दो तरह के रेजिमेंट्स बने, पहले क्षेत्र के नाम पर। जैसे- पंजाब रेजिमेंट-1761, मराठा लाइट इन्फेंट्री-1768 और दूसरी धर्म या जाति के नाम पर। जैसे गोरखा राइफल्स-1815, सिख रेजिमेंट-1846 और डोगरा रेजिमेंट-1877 में। भारत की आजादी तक कुल 31 रेजिमेंट बन गए थे।

आजादी के बाद जाति या क्षेत्र के नाम पर रेजिमेंट्स बनने तो बंद हो गये। लेकिन पुरानी रेजिमेंट को बंद भी नहीं किया गया। अब भी उन रेजिमेंट में नई भर्तियां होती हैं। हालांकि किसी विशेष जाति के लोग ही एक जाति के रेजिमेंट में जाएं ऐसा नहीं है। ये मिश्रित रेजिमेंट्स होती हैं, जैसे कि राजपूताना राइफल्स में राजपूत के अलावा जाट भी हो सकते हैं और यादव भी। राजपूत रेजिमेंट में राजपूत के अलावा गुर्जर और मुस्लिम भी भर्ती हो सकते हैं।

अब चूंकि आजादी के बाद से अब तक कोई जाति आधारित रेजिमेंट नहीं बनाई गई। ऐसे में दिनेश लाल यादव द्वारा अहीर रेजिमेंट की मांग करना यादवों को लुभाने की कवायद माना जा रहा है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि उनकी मांग ऐसे समय में आई है, जब देश में लोकसभा चुनाव के लिए बिसात बिछाई जा रही है। जाहिर है राजनीतिक पंडित फिलहाल इसे राजनैतिक बयान से ज्यादा कुछ भी नहीं मान रहे हैं। दरअसल, यूपी की सियासत में यादव वोट बैंक मजबूती से समाजवादी पार्टी के साथ जुड़ा हुआ है। समाजवादी पार्टी की असली पूंजी है यादव और मुस्लिम समीकरण का गठजोड़ है। यह दोनों मिलकर लगभग 29 प्रतिशत का एक बड़ा वोट बैंक बनाते हैं। 2011 की जनगणना में धार्मिक आंकड़े तो जारी हुए, लेकिन जातिगत आंकड़ें नहीं जारी किए गए। हालांकि अनुमानित तौर पर प्रदेश में यादवों की संख्या लगभग 10 प्रतिशत है। इसी वजह से भाजपा इस वोट बैंक को अपने पाले में लाने की हर संभव कोशिश कर रही है। अभी तक यादव वोटरों का बड़ा हिस्सा सपा के साथ खड़ा नजर आता है।

 
भारतीय सेना में जल्द से जल्द अहीर रेजिमेंट का गठन किया जाए। जिस दिन इस रेजिमेंट का गठन होगा, उस दिन चीन की रूह कांप जाएगी। -दिनेश लाल यादव निरहुआ 

यूपी में यादव वोटरों के बाद कुर्मी दूसरी सबसे बड़ी ओबीसी जाति है। 2022 के विधानसभा चुनाव में कुर्मी वोटरों का पार्टी को जमकर सपोर्ट मिला। यूपी की करीब तीन दर्जन विधानसभा सीटें और 8 से 10 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जिन पर कुर्मी वोटर हार-जीत का फैसला करते हैं। सोशल इंजीनियरिंग से गैर यादव वोट बैंक में बीजेपी पहले ही सेंध लगा चुकी है। अब यादव वोटरों को अट्रैक्ट करने के लिए अपनी ही सरकार में अहीर रेजिमेंट का मुद्दा उठाकर बीजेपी ने एक ऐसा तीर चला है जो अगर निशाने पर लग गया तो 2024 में एक बार फिर 2014 वाला प्रदर्शन देखने को मिल सकता है। भाजपा यादवों को अपने पाले में लाने की कोशिश के तहत यह संदेश देना चाहती है कि अहीर रेजिमेंट के सपने को वही पूरा कर सकती है। गौरतलब है कि दिनेश लाल यादव निरहुआ इसी साल यूपी की आजमगढ़ लोकसभा से पहली बार चुनाव जीते हैं। उन्होंने संसद में पहुंचते ही बात की सेना की, चीन की, 1962 की और यादव समाज के लिए अलग से रेजिमेंट बनाने की। लेकिन यादवों की पार्टी कही जाने वाली समाजवादी पार्टी कह रही है कि लालच में मत आना। ये 2024 के लिए फेंका गया पासा है।