शिक्षा के भारतीयकरण की संभावनाएं : भारतीय शिक्षण मंडल

15 Mar 2023 18:07:50

शिक्षा के भारतीयकरण की संभावनाएं : भारतीय शिक्षण मंडल
 
भारतीय शिक्षण मंडल 1969 में अपने स्थापना के समय से लेकर ही शिक्षा के भारतीयकरण हेतु निरंतर प्रयास कर रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रगति के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा एवं युगानुकूल देशज दृष्टि को आधार बनाकर शिक्षा को भारतीय संदर्भों में पुन: प्रतिरूपित करने के अभियान को आधार प्रदान किया है जिससे शिक्षा के भारतीयकरण की संभावनाएं दिखाई पड़ने लगी है। जिसकी झलक राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के निर्माण में भारतीय शिक्षण मंडल की महती भूमिका रही है जिस हेतु 100 से अधिक राष्ट्रीय संगोष्ठी और सम्मेलनों का अयोजन मंडल के सहयोग से किया गया। साथ ही जो सुझाव भारतीय शिक्षण मंडल द्वारा देश भर में व्यापक विमर्श के पश्चात भेजे गए वह तकरीबन 60% प्रतिशत से अधिक राष्ट्रीय शिक्षा नीति का भाग बने। इससे यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से भारतीय शिक्षा व्यवस्था को मजबूत आधार प्रदान करने का जो संकल्प एवं रूपरेखा प्रदान की गई है उसमें भारतीय शिक्षण मंडल ने अपनी भूमिका को बखूबी अदा किया है।
 
इसके अतिरिक्त अपने ध्येय के अनुरूप शिक्षा में भारतीयता लाने के लिए अनुसंधान, प्रबोधन, प्रशिक्षण एवं प्रकाशन आदि विविध क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर कार्यों को प्रतिरूपित कर रहा है। प्रत्येक वर्ष राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं सम्मेलनों का आयोजन मंडल द्वारा निरंतर किया जा रहा है। 2016 में नागपूर में रिसर्च फॉर रीसर्जन्स विषय पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन किया गया जिसके परिणाम स्वरूप रिसर्च फॉर रीसर्जन्स फाउंडेशन की स्थापना नागपूर में की गई।
 
यह संगठन भारतीय शिक्षण मंडल के अंतर्गत मात्र 6 वर्षों में जिस तरह से शिक्षा को भारत केंद्रित बनाने के लिए अनुसंधान के माध्यम से व्यापक स्तर परिवर्तन लाने के प्रयास किया है वह सराहनीय हैं और शिक्षा के भारतीयकरण की संभावनाओं को ठोस आधार प्रदान करते हैं। यह फाउंडेशन अभी तक अनुसंधान के माध्यम से शिक्षा के भारतीयकरण हेतु 235 से अधिक शैक्षणिक संस्थानों के साथ शैक्षणिक सहयोग हेतु समझौता और 40 से अधिक आनंदशाला (कार्यशाला) आयोजन कर चुका है। साथ ही देशभर में संगोष्ठी, सम्मेलन एवं विभिन्न आयोजनों के माध्यम से विविध प्रयास कर रहा है।
 
भारतीय शिक्षण मंडल द्वारा ही प्राचीन समय से ही भारतीय शिक्षा व्यवस्था का आधार रहे पारंपरिक गुरुकुलों के संरक्षण हेतु 2018 में मध्यम प्रदेश के उज्जैन में अंतर्राष्ट्रीय विराट गुरुकुल सम्मेलन का आयोजन किया गया। साथ ही भारत में चलने वाले गुरकुलों का सर्वेक्षण कराया गया और ऐसे 10 हजार से अधिक गुरुकुलों की पहचान कर उनकों आधुनिक स्वरूप में विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसी प्रकार भारतीय शिक्षण मंडल के अंतर्गत सात प्रकोष्ठ एवं गतिविधियां चलती हैं जिनके माध्यम से निरंतर भारतीयकरण को लेकर विभिन्न गतिविधियों एवं कार्यक्रमों का आयोजन होते रहते हैं तथा इस क्षेत्र में विभिन्न प्रयास जारी हैं।
 
शिक्षा की भारतीयकरण की पहल को अगर भारतीय शिक्षण मंडल मजबूत आधार प्रदान करता हुआ दिख रहा है तो उसके प्रमुख कारण भी है कि वह युगानुकूल अर्थात समसामयिक परिप्रेक्ष्य में शिक्षा को भारतीय संदर्भ में विकसित करने की बात करता है। यहां उन दो महपुरुषों की देशज दृष्टि की चर्चा महत्वपूर्ण हो जाती है। पहले हैं नानाजी देशमुख, जिन्होंने राजनीति के क्षेत्र में शीर्ष पंक्ति में पहुंचने के बाद त्याग कर ग्रामीण विकास के क्षेत्र में नए आयाम गढ़े। समसामयिक समय के विकास हेतु उन्होंने चार सूत्र एवं रचनात्मक कार्य प्रदान किए हैं- शिक्षा, स्वावलंबन, स्वास्थ्य एवं सदाचार।
 
इन्हीं रचनात्मक कार्यों के आधार पर देशज परिप्रेक्ष्य में युगानुकूल विकास की अवधारणा को अभ्यास एवं प्रयोग के माध्यम से समाज में सफल प्रतिरूपित कर उदाहरण पेश किया है। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में देश का प्रथम ग्रामीण विश्वविद्यालय ‘चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय’ की स्थापना एवं आधुनिक स्वरूप में विकसित गुरुकुल संकूल एवं विविध विद्यालयों तथा प्रयोगों के माध्यम से समसामयिक समय के अनुरूप देशज आधारित दृष्टि प्रदान की। जिन दो महपुरुषों की चर्चा कर रहे हैं उसमें दूसरे हैं धर्मपाल।
 
उन्होंने औपनिवेशिक ब्रिटिश सत्ता द्वारा भारतीय शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करने के साथ-साथ विश्वगुरु के रूप में भारत को स्थान दिलाने वाली शिक्षा व्यवस्था के आंकड़ों एवं तथ्यों को नष्ट कर गलत रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया। लेकिन धर्मपाल जी ने अमेरिका एवं ब्रिटिश द्वीपों में फैले भारतीय अभिलेखागारों की खोज की और विभिन्न तथ्यों को एकत्रित कर वास्तविक तथ्यों को प्रस्तुत किया तथा औपनिवेशिक ब्रिटिश सत्ता द्वारा किए गए षड्यंत्रों को उजागर करने का कार्य किया।
 
इस तरह इन दोनों महपुरुषों कि देशज दृष्टि के निष्कर्ष को साम्यता रख संक्षेप में प्रस्तुत करें तो इस निष्कर्ष में पहुंचते हैं कि युगानुरूप निरंतर अपनी व्यवस्था एवं दृष्टि में परिवर्तन करते रहना चाहिए। साथ ही समसामयिक संदर्भों में दोनों महापुरुष विदेशी को स्वदेशी के अनुरूप और स्वदेशी को युगानुकूल बनाने की बात करते हैं। इससे तात्पर्य है कि अपने पुरातन ज्ञान परंपरा एवं दृष्टि को समसामयिक रूप में परिवर्तित करना और अगर दुनियां के कुछ राष्ट्र टेक्नोलॉजी एवं ज्ञान के कुछ क्षेत्रों में आज हमसे आगे हो गए हैं तो उससे सिख लेते हुए उसे स्वदेशी के अनुरूप विकसित करना, क्योंकि आज हमें मुकबला इसी दुनिया एवं व्यवस्था से करना है।
 
भारत पूर्व में पूरी दुनिया को अपनी संस्कृति और ज्ञान परंपरा के आधार पर रास्ता दिखाने का कार्य करता था उसे पुन: करने के लिए विदेशी को स्वदेशी के अनुरूप और स्वदेशी को आज के समय के अनुरूप साम्यता रखकर प्रयास करने की आवशकता है। भारतीय शिक्षण मंडल इन दोनों महापुरुषों के विचारों को बखूबी समझते हुए शिक्षा में भारतीयता लाने का प्रयास कर रहा है; इसलिए भारतीय शिक्षण मंडल ने धर्मपाल साहित्य को 10 खंडों में प्रकाशित किया है और नानाजी देशमुख के विचारों को लेकर भी निरंतर कार्यकर रहा है।
 
शिक्षण मंडल के सहयोग से नानाजी देशमुख के जन्मदिवस के अवसर पर 11 अक्टूबर को भारतीय समाज कार्य दिवस 2018 से मनाया जाना प्रारंभ हुआ। इस तरह से भारतीय शिक्षण मंडल शिक्षा में भारतीयता लाने हेतु समसामयिक परिप्रेक्ष्य के अनुरूप प्रयास कर रहा है; इसी दृष्टि से रिसर्च फॉर रीसर्जन्स फाउंडेशन (RFRF) की स्थापना करता है और शोध के क्षेत्र में पेटेंट पर बहुत अधिक बल प्रदान करता है। साथ ही अनेक प्रयास समसामयिक समय के अनुरूप क्रियान्वित एवं प्रतिरूपित कर शिक्षा के भारतीयकरण की संभावना को मजबूत आधार प्रदान करने के रास्ते में अग्रसर दिख रहा है।
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