ख्वाहिशों का जंगल बड़ा वीरान नजर आता है

युगवार्ता    22-Aug-2023
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मृत्युंजय उपाध्याय नवल



01

ख्वाहिशों का जंगल बड़ा वीरान नजर आता है।

जिंदगी का सफर बियावान नजर आता है।

जिसे भी देखिए वो अपने आप में गुम है

इस शहर का हर शक्स परेशान नजर आता है।

खरीदता है खुशियां बेचकर अपनी सांसे

जिसे भी देखिए वो दुकान नजर आता है।

जिधर भी देखिए हर तरफ भीड़ दिखती है

वैसे भी कहां अब इंसान नजर आता है।

बिना वजह कोई मिलता नहीं किसी से 'नवल'

अपने ही घर में खुद मेहमान नजर आता है।

02

बड़े बेजार लगते हो परेशान हो क्या

मुझको यूं देखकर तुम हैरान हो क्या।

सुना है बनाते हो किस्मत लोगों की

बना कर मिटा देते हो भगवान हो क्या।

गुनाह मेरे, दलीलें तेरी, फैसला तेरा

खुद मुकर्रर करते हो दीवान हो क्या।

जब आ गए हैं तो इत्मीनान से बैठो

घर तुम्हारा है, तुम मेहमान हो क्या।

जो भी आता है उसे मुतमइन करते हो

हसरतों का नवलदुकान हो क्या।

03

दो घरों की आग में कुछ रोटियां सिकती रहीं।

सजते रहे बाजार उनमें बेटियां बिकती रहीं।

मुझको बस इतना बता कि क्या मेरी तकदीर थी

क्यों मां के ही कोख में यह बेटियां मरती रहीं।

जोश भी भरपूर था लेकिन कहीं मजबूर था

मेरी हर शिकस्त पर कुछ चुप्पियां हंसती रहीं।

नफरतों की जड़ों को तो वह हिला पाए नहीं

चाहतों को तोड़कर सिर्फ दूरियां बढ़ती रहीं।

सहरा का तन्हा चांद ने मुझसे कहा है नवल

रात भर मेरे नाम की वह चिट्ठियां लिखती रहीं।

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