
लेह (लद्दाख), 21 जनवरी (हि.स.)। लद्दाख की बेटी स्करमा त्सुल्टिम आज अंतरराष्ट्रीय स्पीड स्केटिंग में अपनी पहचान बना चुकी हैं, लेकिन उनकी यह यात्रा किसी बड़े सपने या योजना से शुरू नहीं हुई थी। साल 2018 की सर्दियों में, जब उन्होंने पहली बार आइस स्केटिंग के जूते पहने, तब वह महज एक स्कूली छात्रा थीं और 15 दिवसीय विंटर स्पोर्ट्स प्रशिक्षण शिविर में अन्य बच्चों की तरह हिस्सा ले रही थीं। स्केटिंग उन्हें न डरावनी लगी, न भारी—बल्कि स्वाभाविक लगी। यहीं से एक विचार ने जन्म लिया, जिसे आगे चलकर खेलो इंडिया विंटर गेम्स ने नई दिशा दी।
हर सर्दी में स्केटिंग और मौसम खत्म होते ही सामान्य जीवन का सिलसिला 2021 तक चला। लद्दाख में सर्दियों के दौरान स्कूल बंद रहते हैं और जमी हुई गुपुख झीलें बच्चों के खेल के मैदान बन जाती हैं। स्करमा भी अपने भाई के साथ वहीं अभ्यास कर रही थीं, तभी कोच अब्बास नोरडाक की नजर उन पर पड़ी। प्रतिभा पहचानते हुए उन्होंने स्करमा को चुना और यहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई।
नियमित विंटर कैंप और कड़ी ट्रेनिंग के बाद, एक साल के भीतर ही स्करमा ने गुरुग्राम के आई-स्केट में आयोजित 17वीं राष्ट्रीय स्पीड स्केटिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लिया। हालांकि उनका पहला राष्ट्रीय अनुभव अच्छा नहीं रहा। यह उनका आर्टिफिशियल आइस पर पहला मुकाबला था और प्रतिस्पर्धा का स्तर उन्हें विचलित कर गया।
इसके बावजूद प्रशिक्षण जारी रहा। गर्मियों में मसल ट्रेनिंग, रोलर स्केटिंग और फिटनेस पर काम होता रहा। उनके पिता कई बार 20 से 40 किलोमीटर दूर तक उन्हें रोलर स्केटिंग अभ्यास के लिए ले जाते, जबकि उनकी मां उन्हें जमीन से जुड़े रहने और केवल पदकों के लिए नहीं, बल्कि खेल के आनंद के लिए खेलने की सीख देती रहीं। 18वीं राष्ट्रीय चैंपियनशिप में भी उन्होंने भाग लिया, लेकिन खास सफलता नहीं मिली।
खेलो इंडिया बना टर्निंग पॉइंट
साल 2023 में गुलमर्ग में आयोजित तीसरे खेलो इंडिया विंटर गेम्स ने स्करमा के करियर को नई उड़ान दी। पहली बार लद्दाख के सात खिलाड़ी इस प्रतियोगिता में उतरे। स्करमा ने जूनियर गर्ल्स (15–19 वर्ष) 1000 मीटर शॉर्ट ट्रैक स्पीड स्केटिंग में रजत पदक जीता। यह पदक सिर्फ एक उपलब्धि नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की नींव था।
यहीं से उन्हें भारतीय स्पीड स्केटिंग टीम में चुना गया और उन्होंने सिंगापुर में आयोजित साउथ ईस्ट एशियन चैंपियनशिप 2023 में भारत का प्रतिनिधित्व किया, जिसके लिए फिलीपींस में प्रशिक्षण हुआ। यह उनका पहला अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट था और वह टीम में लद्दाख की अकेली खिलाड़ी थीं। भाषा की बाधा और झिझक के कारण शुरुआत आसान नहीं रही। जापान, इंडोनेशिया, चाइनीज ताइपे और चीन के खिलाड़ियों की प्रोफेशनल तैयारी देखकर वह घबरा गईं। 1000 मीटर में वह 11वें स्थान पर रहीं, लेकिन यही मंच उनके अंतरराष्ट्रीय सफर की शुरुआत बना।
इसके बाद एक दौर ऐसा भी आया, जब पढ़ाई और खेल के बीच संतुलन बिगड़ने लगा और उन्होंने खुद से सवाल किया कि क्या यह खेल उनके लिए है। लेकिन जब वह घर लौटीं, तो एयरपोर्ट पर परिवार, दोस्त, गांव के लोग और गोबा (ग्राम प्रधान) उनका स्वागत करने पहुंचे। उन्हें पदकों के लिए नहीं, बल्कि भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए सम्मान मिला। क्षेत्रीय पार्षद और थिकसे मठ के प्रमुख गेशे-ला द्वारा मिले स्नेह ने उन्हें भावुक कर दिया। यही सामुदायिक समर्थन उनके लिए आगे बढ़ने की वजह बना।
लगातार सफलता की ओर कदम
लद्दाख में आयोजित चौथे खेलो इंडिया विंटर गेम्स में स्करमा ने शानदार प्रदर्शन किया। महिला टीम रिले में स्वर्ण (लद्दाख का पहला स्वर्ण), लॉन्ग ट्रैक 500 मीटर में रजत, मिक्स्ड रिले में रजत और लॉन्ग ट्रैक में कांस्य पदक जीता। पांचवें संस्करण में उन्होंने 1000 मीटर शॉर्ट ट्रैक में अपना पहला व्यक्तिगत स्वर्ण पदक हासिल किया।
उनके कोच अब्बास नोरडाक उस समय चीन के हार्बिन में भारतीय टीम के साथ थे। जीत की खबर सुनकर उन्होंने बस इतना कहा, “मैं खुश हूं।” उसी साल टीम यूटी लद्दाख ने पहली बार पदक तालिका में शीर्ष स्थान हासिल किया। बाद में स्करमा ने 2024 में जकार्ता में एशियन ओपन शॉर्ट ट्रैक स्पीड स्केटिंग ट्रॉफी में भी हिस्सा लिया।
स्करमा अपने कोच को ही अपनी सबसे बड़ी प्रेरणा मानती हैं। बिना फीस के वर्षों से लद्दाख के खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने वाले कोच अब्बास कई बार खुद खर्च उठाते रहे हैं। आर्थिक सीमाएं आज भी चुनौती हैं, लेकिन खेलो इंडिया जैसे मंचों ने स्करमा को पहचान, अनुभव और आत्मविश्वास दिया।
आगे की राह और ओलंपिक का सपना
अब छठे खेलो इंडिया विंटर गेम्स में स्करमा त्सुल्टिम 500 मीटर और 1000 मीटर शॉर्ट ट्रैक के साथ रिले मुकाबलों में भी उतरेंगी। उनकी यात्रा किसी महत्वाकांक्षा से नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास, सही मार्गदर्शन और समाज के सहयोग से बनी है।
ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करने का सपना आज भी उनके साथ है—वही सपना, जो सात साल पहले पहली बार स्केटिंग जूते पहनते समय उनके मन में कहीं अंकुरित हुआ था। अपने नाम के अर्थ की तरह, जो लद्दाखी में ‘सितारा’ है, स्करमा त्सुल्टिम आज खेलो इंडिया से आगे बढ़कर एक दिन ओलंपिक मंच पर चमकने की उम्मीद जगाती हैं—न सिर्फ अपने परिवार और कोच के लिए, बल्कि पूरे लद्दाख के लिए।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुनील दुबे