सीएसआईआर ने किया बायो-बिटुमेन तकनीक का मंत्रालय को हस्तांतरण

07 Jan 2026 17:22:53
सीएसआईआर के बायो-बिटुमेन तकनीक का मंत्रालय को हस्तांतरण कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और  जितेंद्र सिंह


नई दिल्ली, 07 जनवरी (हि.स.)। केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई) और सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (आईआईपी) द्वारा विकसित लिग्नोसेल्यूलोसिक बायोमास से बायो-बिटुमेन की पर्यावरण-अनुकूल तकनीक को आज यहां सीएसआईआर के वैज्ञानिकों और उद्योगपतियों ने केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी को औपचारिक हस्तांतरित कर दिया।

इस अवसर पर गडकरी ने कहा कि भारत आज दुनिया का पहला देश बन गया है जिसने बायो-बिटुमेन का वाणिज्यिक उत्पादन शुरू किया है। खेती के कचरे को एक कीमती राष्ट्रीय संसाधन में बदलना विकसित भारत 2047 के विज़न की दिशा में बड़ा कदम है। यदि 15 प्रतिशत मिश्रण किया जाए तो भारत लगभग 4,500 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचा सकता है और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता घटा सकता है। यह तकनीक किसानों को सशक्त बनाएगी, ग्रामीण रोजगार पैदा करेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगी। कार्यक्रम में केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह और सीएसआईआर की महानिदेशक डॉ. एन. कलाइसेल्वी मौजूद रहीं।

गडकरी ने कहा कि बायो-बिटुमेन केवल एक सामग्री नहीं बल्कि सोच में बदलाव है। यह तकनीक आत्मनिर्भर भारत और सतत विकास की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। इस प्रक्रिया से बायो-तेल, बायो-गैस और बायो-चारकोल तीन उपयोगी उत्पाद तैयार होते हैं। बायो-तेल को बिटुमेन के साथ मिलाकर बायो-बिटुमेन बनाया जाता है, बायो-गैस का उपयोग संयंत्र संचालन में होता है और बायो-चारकोल को खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे ‘शून्य अपशिष्ट’ होता है।

डॉ. कलाइसेल्वी ने कहा कि यह परियोजना विज्ञान का समग्र दृष्टिकोण, सरकार का समग्र दृष्टिकोण और समाज का समग्र दृष्टिकोण का उदाहरण है, जो मिलकर राष्ट्र का समग्र दृष्टिकोण बनाता है। इस परियोजना में सीएसआईआर की कई प्रयोगशालाएं, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और अन्य संस्थान शामिल हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हर शहर और गांव को योगदान देना होगा और यह परियोजना उसी सोच का उत्कृष्ट उदाहरण है।

मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सीएसआईआर की प्रयोगशालाओं की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले दस वर्षों में उन्हें स्वतंत्रता दी गई है और अब उनकी कहानियां देशभर में सामने आ रही हैं। वैज्ञानिकों ने समाज में जागरूकता पैदा करने के लिए घरों से प्रयुक्त तेल खरीदने का विचार दिया है, जिसे सरकार 20 रुपये प्रति किलो के हिसाब से खरीदेगी। इससे महिलाओं को भी सशक्त बनाने में मदद मिलेगी।

उल्लेखनीय है कि इस तकनीक से कृषि अवशेषों, विशेषकर धान की पराली, को पायरोलिसिस प्रक्रिया के माध्यम से बायो-बिटुमेन में बदला जाता है। यह पारंपरिक पेट्रोलियम-आधारित बिटुमेन का टिकाऊ विकल्प है। इस नवाचार से सड़क निर्माण में पर्यावरण-अनुकूल तरीकों को अपनाया जा सकेगा और पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण की समस्या का समाधान मिलेगा। साथ ही यह कृषि अपशिष्ट को मूल्यवान संसाधन में बदलकर सर्कुलर अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर

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