
कोलकाता, 01 अक्टूबर (हि. स.)। पश्चिम बंगाल सरकार ने जनवरी 2027 से लागू होने वाले संशोधित स्कूली पाठ्यक्रम में बड़े पैमाने पर बदलाव करने का निर्णय लिया है। इस पाठ्यक्रम पुनर्गठन के तहत स्कूली किताबों में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन, उनके योगदान और विरासत को प्रमुखता से शामिल किया जाएगा। वहीं, राज्य के इतिहास और योजनाओं से जुड़े कुछ चर्चित अध्यायों, जैसे 'सिंगूर भूमि आंदोलन' और 'कन्याश्री योजना' को पाठ्यक्रम से हटा दिया जाएगा। राज्य शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन ने स्पष्ट किया है कि पाठ्यक्रम समिति इस पूरी प्रक्रिया की देखरेख कर रही है और उनके पास अंतिम मसौदा आने के बाद इसे मंजूरी दी जाएगी।
उच्च-स्तरीय सिलेबस-कम-करिकुलम कमेटी के अध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) देबाशीष चटर्जी ने बताया कि 1951 में भारतीय जनसंघ (वर्तमान भाजपा की पूर्ववर्ती संस्था) की स्थापना करने वाले प्रमुख बंगाली नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के संदर्भों को सभी कक्षाओं की पाठ्यपुस्तकों की शुरुआत में शामिल किया जाएगा। उन्होंने बताया, सभी किताबों की शुरुआत में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर एक लेख होगा ताकि छात्र उनके बारे में जान सकें। यह हर कक्षा की किताबों में अनिवार्य रूप से होगा। इस पहल से पहले राज्य के उच्च शिक्षा विभाग ने सभी राज्य-सहायता प्राप्त स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को निर्देश जारी किया था कि वे अपने शैक्षणिक कार्यक्रमों में डॉ. मुखर्जी के योगदान को शामिल करें और युवा पीढ़ी को उनसे परिचित कराने के लिए आउटरीच कार्यक्रमों का आयोजन करें।
पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा वाम मोर्चा सरकार के टाटा मोटर्स प्रोजेक्ट के खिलाफ चलाए गए 'सिंगूर भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन' का अध्याय कक्षा आठ की इतिहास की किताब से हटाया जा रहा है। यह अध्याय 2017 में पिछली तृणमूल कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान जोड़ा गया था। इसके साथ ही, किशोरियों के जीवन और शिक्षा को बेहतर बनाने के उद्देश्य से 2013 में शुरू की गई 'कन्याश्री योजना' का पाठ भी अब छठी से आठवीं कक्षा तक की स्वास्थ्य और स्वच्छता की किताबों से हटा दिया जाएगा। प्रोफेसर चटर्जी ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि कक्षा आठ की किताबों में जोड़ा गया सिंगूर का अध्याय हटा दिया जाएगा; इसी तरह कन्याश्री का अध्याय भी हटेगा।
प्रस्तावित बदलाव केवल कुछ अध्यायों तक सीमित नहीं हैं; बल्कि बंगाली भाषा और साहित्य में भी संशोधन किया जा रहा है। प्रोफेसर चटर्जी के अनुसार, रोजमर्रा की बंगाली में कम इस्तेमाल होने वाले कई शब्दों को हटाया या बदला जाएगा। उदाहरण के तौर पर, उन्होंने बताया कि पानी के लिए पानी शब्द को जोल से और अम्मा व अब्बा जैसे शब्दों में बदलाव किया जाएगा। माध्यमिक स्तर के साहित्य में भी बदलाव करते हुए रवींद्रनाथ टैगोर की कविता 'अफ्रीका' को उनकी रचना 'शिवाजी उत्सव' से बदला जाएगा। चटर्जी ने इसका कारण बताते हुए कहा, जब हम 'विकसित भारत' की बात कर रहे हैं, तो हमें अपने मूल्यों और संस्कृतियों को कायम रखने की जरूरत है, इसलिए यह कविता महत्वपूर्ण है। इसी तर्ज पर, सचिंद्रनाथ सेनगुप्ता के नाटक 'सिराजुद्दौला' की जगह द्विजेंद्रलाल राय का 'मेबार पतन' (मेवाड़ पतन) पढ़ाया जाएगा।
पाठ्यक्रम समिति ने साम्यवाद (कम्युनिज्म) और मुगल काल से जुड़े अनुभागों में भी कटौती करने का प्रस्ताव रखा है। इसके बजाय भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी ऐतिहासिक शख्सियतों पर अधिक जोर दिया जाएगा। समिति के अध्यक्ष का तर्क है, सालों से हमें यह रटने के लिए कहा गया है कि ताजमहल किसने बनवाया और उनके पूर्वजों और पोते-पोतियों के नाम क्या थे, लेकिन जिन लोगों ने इस देश की आजादी के लिए अपनी जान दी है, उनके बारे में कोई नहीं जानता क्योंकि इतिहास की किताबों में उनका जिक्र ही नहीं है। इसलिए अब वह सब पाठ्यक्रम में शामिल होगा। समिति के अनुसार, कई बंगाली और अंग्रेजी भाषा के अध्यायों को पहले ही राज्य सरकार के पास अंतिम मंजूरी के लिए भेजा जा चुका है और शेष हिस्सों को जल्द ही प्रस्तुत किए जाने की उम्मीद है।
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हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर