
नई दिल्ली, 01 अक्टूबर (हि.स.)। आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने गुरुवार को कहा कि किसी सभ्यतागत अध्ययन को पूर्वाग्रहमुक्त और साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण से देखना चाहिए।
डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने आज दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में सिंधु-सरस्वती सभ्यता के विविध आयामों, साक्ष्यों और सांस्कृतिक निरंतरता पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय गोलमेज सम्मेलन के आयोजन पर यह बात कही। ' साक्ष्य, अंतःक्रियाएं और सभ्यतागत निरंतरता' विषय पर आयोजित इस सम्मेलन का संयोजन आईजीएनसीए के भारत विद्या प्रयोजना प्रभाग, सिंधु सरस्वती प्रकोष्ठ तथा राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्रण मिशन ने दिल्ली विश्वविद्यालय के शहीद भगत सिंह महाविद्यालय (सांध्य) के सहयोग से किया। सम्मेलन में पुरातत्त्व, इतिहास, भाषाविज्ञान, अभिलेख-विज्ञान और भू-विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों ने पुरातात्त्विक साक्ष्यों को भारतीय ज्ञान परंपरा और वैज्ञानिक विधियों के समन्वय से समझने पर जोर दिया।
डॉ जोशी ने कहा, किसी भी प्राचीन सभ्यता को आधुनिक राष्ट्र-राज्य की राजनीतिक सीमाओं के संकीर्ण चश्मे से नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा कि वैयाकरण पाणिनि का उदाहरण देते हुए रेखांकित किया कि उनका जन्मस्थान शलातुर आज भले ही पाकिस्तान में स्थित हो, लेकिन उनके काल में ऐसी राजनीतिक सीमाएं नहीं थीं। पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ किसी भौगोलिक दायरे तक सीमित न होकर संपूर्ण भारतीय बौद्धिक जगत का प्रतिनिधित्व करती है।
असम विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर आर्कियोलॉजी एंड म्यूज़ियोलॉजी के निदेशक प्रो. आलोक त्रिपाठी ने ‘सिंधु सभ्यता’, ‘ग्रेट बाथ’ और ‘प्रीस्ट किंग’ जैसी पश्चिमी शब्दावलियों और अवधारणाओं की पुनःसमीक्षा की मांग की और पुरातात्त्विक प्रमाणों को भारतीय साहित्य तथा सांस्कृतिक संदर्भों के साथ जोड़ने पर जोर दिया।
भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अपर महानिदेशक डॉ. संजय कुमार मंजुल ने स्पष्ट किया कि हड़प्पा सभ्यता अचानक समाप्त नहीं हुई थी, बल्कि समय के साथ इसका रूपांतरण हुआ। उन्होंने पुरातात्त्विक साक्ष्यों और नदियों के मार्ग परिवर्तन के आधार पर परिपक्व हड़प्पा और उत्तर-हड़प्पा चरणों के बीच निरंतरता और समकालिकता को समझने की आवश्यकता जताई।
वहीं, डेक्कन कॉलेज पुणे के पूर्व कुलपति प्रो. वसंत शिंदे ने कहा कि उत्खनन से मिली वस्तुओं को अलग-थलग देखने के बजाय तत्कालीन दैनिक जीवन, शिल्प, तकनीक और व्यापार के समग्र परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए।
पुरातत्त्वविद् डॉ. करुणा शंकर शुक्ल ने प्रख्यात पुरातत्त्ववेत्ता प्रो. बी.बी. लाल के कथन ‘पुरातत्त्व और परंपरा को साथ-साथ चलना चाहिए’ का स्मरण कराते हुए सिंधु लिपि, प्राचीन ब्राह्मी और वैदिक साहित्य के संभावित संबंधों पर विचार रखे।
प्रो. नागराज पातुरी ने बताया कि आज भी गांवों और कस्बों में मौजूद मनका निर्माण व पारंपरिक रंगाई जैसी जीवित शिल्प शैलियां प्राचीन भौतिक संस्कृति को डिकोड करने में अहम भूमिका निभाती हैं।
अभिलेख विशेषज्ञ डॉ. पुनीत गुप्ता ने अपने प्रस्तावित ‘बीएपी मॉडल’ की चर्चा करते हुए कहा कि हड़प्पा लिपि के संकेतों को समझने के लिए सांख्यिकीय और आधुनिक कंप्यूटेशनल तकनीकों का सहारा लेना समय की मांग है।
सम्मेलन में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के महानिदेशक प्रो. यदुबीर सिंह रावत ने विद्वानों के इस संवाद को समयानुकूल बताया। कार्यक्रम का मार्गदर्शन प्रो. ए.बी. शुक्ल, प्रो. अरुण कुमार अत्रि तथा संचालन डॉ. निधि मिश्रा ने किया।
इस मौके पर सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी