

-जन्म शताब्दी समारोह में विहिप के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने याद किए सिंघल के जीवन के प्रसंग
देहरादून, 11 अक्टूबर (हि.स.)। विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के पूर्व अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल ने अपना संपूर्ण जीवन हिंदू समाज को संगठित करने, सामाजिक समरसता स्थापित करने और राष्ट्रहित के कार्यों के लिए समर्पित किया। राजनीतिक पदों से दूर रहने के बावजूद उनकी देश की राजनीतिक परिस्थितियों पर गहरी नजर थी। विभिन्न विचारधाराओं के नेताओं से संबंध बनाए रखना, मतभेदों के बावजूद संवाद कायम रखना और संत समाज को एकजुट करना उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएं थीं। रविवार को देहरादून में अशोक सिंघल के जन्म शताब्दी वर्ष के उद्घाटन समारोह में वक्ताओं ने उनके जीवन और योगदान को याद करते हुए यह बात कही।
विश्व हिंदू परिषद की ओर से पटेल नगर स्थित दून मेडिकल कॉलेज ऑडिटोरियम में आयोजित समारोह में विहिप के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। इस मौके पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित बड़ी संख्या में गणमान्य लोग उपस्थित रहे। समारोह में अशोक सिंघल के संगठनात्मक कौशल, राम जन्मभूमि आंदोलन में उनकी भूमिका, संतों के साथ उनके संबंधों और राष्ट्र एवं समाज के प्रति उनके योगदान पर चर्चा की गई।
चंपत राय ने अशोक सिंघल के जीवन से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका व्यक्तित्व केवल किसी एक आंदोलन या संगठन तक सीमित नहीं था। वे समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से लक्ष्य हासिल करने में विश्वास रखते थे। उनका जीवन संगठन, समर्पण और राष्ट्रहित को प्राथमिकता देने का उदाहरण रहा। वे अपने कार्यों का श्रेय स्वयं लेने के बजाय उन्हें समाज और ईश्वर की इच्छा से जोड़कर देखते थे।
उन्होंने कहा कि अशोक सिंघल का व्यवहार राजनीतिक और वैचारिक मतभेदों के बावजूद संबंधों को बनाए रखने की सीख देता है। वे व्यक्तिगत कटुता के पक्षधर नहीं थे। उनका मानना था कि मतभेद और क्रोध को स्थायी वैमनस्य में नहीं बदलना चाहिए। उनके अनुसार, क्रोध पानी पर खींची गई रेखा की तरह होना चाहिए, जो तुरंत मिट जाए। इसी दृष्टिकोण के कारण वे अलग-अलग विचारधाराओं के लोगों के साथ संवाद और समन्वय बनाए रखते थे।
समारोह में अशोक सिंघल की राजनीतिक समझ का भी उल्लेख किया गया। वक्ताओं के अनुसार, वे स्वयं राजनीतिक पदों से दूर रहे, लेकिन देश की राजनीतिक परिस्थितियों पर उनकी गहरी नजर थी। वर्ष 2013 में उन्होंने विभिन्न राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की संभावित चुनावी सफलता का आकलन किया था। उन्होंने नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव प्रचार का प्रमुख चेहरा बनाने पर भी जोर दिया था। वक्ताओं ने कहा कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के परिणाम उनके आकलन के काफी करीब रहे।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविंद्र पुरी महाराज ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहा कि अशोक सिंघल ने राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान संतों को एक मंच पर लाने और विभिन्न संप्रदायों के बीच समन्वय स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1989 के कुंभ में उनसे परिचय होने के बाद उन्हें लंबे समय तक उनके साथ काम करने और उनके नेतृत्व को करीब से देखने का अवसर मिला।
उन्होंने कहा कि अशोक सिंघल ने शिलापूजन और गांव-गांव तक पहुंचाए गए अभियानों के माध्यम से बड़ी संख्या में लोगों को राम जन्मभूमि आंदोलन से जोड़ने में योगदान दिया। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से जुड़े विभिन्न चरणों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। वे संतों के सम्मान और उनके बीच आपसी समन्वय को प्राथमिकता देते थे। किसी संत से मतभेद होने पर भी वे संवाद के जरिए समाधान निकालने का प्रयास करते थे।
रविंद्र पुरी महाराज ने गुजरात के जूनागढ़ क्षेत्र में साधुओं के आश्रमों और कुटियों से जुड़े प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि अशोक सिंघल ने संतों की समस्याओं को उठाया था। पंजाब में आतंकवाद के दौर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय सामाजिक एकता बनाए रखने के लिए संतों ने जोखिम उठाकर यात्राएं कीं। अशोक सिंघल ने भी विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच समन्वय स्थापित करने के प्रयास किए।
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हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार पांडेय