वित्त मंत्रालय ने आईडीबीआई में सरकार की हिस्सेदारी से संबंधित विधायी घटनाक्रमों पर दिया स्पष्टीकरण

17 Oct 2026 14:22:53
आईडीबीआई बैंक के लोगो का प्रतीकात्मक चित्र


नई दिल्ली, 17 अक्टूबर (हि.स.)। केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक आईडीबीआई बैंक में सरकार की हिस्सेदारी से जुड़े जुड़े कानूनी और विधायी घटनाक्रमों पर स्पष्टीकरण जारी किया है।

वित्त मंत्रालय ने शनिवार को मीडिया रिपोर्टों में आई उन टिप्पणियों और विचारों के जवाब में स्पष्टीकरण जारी किया है, जिनमें 2003 में आईडीबीआई बैंक में सरकार की हिस्सेदारी से संबंधित विधायी घटनाक्रमों पर सवाल उठाए गए थे।

मंत्रालय ने अपने स्पष्टीकरण में कहा कि आईडीबीआई (निरसन) अधिनियम-2003 का विधायी इतिहास, दिल्ली उच्च न्यायालय के एक फैसले और लगातार आम बजट भाषण से आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक विनिवेश की दिशा में सरकार की नीति के क्रमिक विकास का पता चलता है। वर्ष 2003 में आईडीबीआई (निरसन) अधिनियम को लेकर हुई संसदीय चर्चा के दौरान सरकार की हिस्सेदारी में कमी को सीमित करने के लिए संशोधन का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन इसे खारिज कर दिया गया था। यह संशोधन अंततः लागू कानून का हिस्सा नहीं बना।

मंत्रालय का यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है, जब आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने आईडीबीआई बैंक लिमिटेड के रणनीतिक पुनर्गठन को मंजूरी दी है। साथ ही बैंक की 60.72 फीसदी हिस्सेदारी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की एक सहायक कंपनी को 52,878.08 करोड़ रुपये में बेचने का फैसला किया गया है। इस सौदे में केंद्र सरकार की 30.48 फीसदी हिस्सेदारी और भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की 30.24 फीसदी हिस्सेदारी शामिल है।

मंत्रालय ने दोहराया कि आईडीबीआई बैंक में अपनी शेयरधारिता को कम करने या बेचने का उसके पास कानूनी अधिकार है और इसके लिए उसने 2018 के दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो उसे बैंक में अपनी हिस्सेदारी कम करने से रोकता हो।

वित्त मंत्रालय ने जारी स्पष्टीकरण में कहा कि आईडीबीआई (निरसन) अधिनियम-2003 पर संसदीय चर्चा के दौरान भारत सरकार ने अपनी हिस्सेदारी के दोहन को प्रतिबंधित करने के उद्देश्य से एक संशोधन प्रस्तावित किया गया था, लेकिन इसे अस्वीकार कर दिया गया और यह अधिनियमित कानून का हिस्सा नहीं बना।

मंत्रालय ने ऑल इंडिया आईडीबीआई ऑफिसर्स एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के 17 दिसंबर 2018 के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें सरकार की शेयरधारिता में कमी को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया गया था।

वित्त मंत्रालय के मुताबिक अदालत ने फैसला सुनाया कि संसदीय बहसों के दौरान दिए गए बयान संसद द्वारा अंततः पारित कानून को रद्द नहीं कर सकते। आईडीबीआई बैंक में सरकार की हिस्सेदारी कम करने या बेचने से रोकने के लिए वचनबद्धता के सिद्धांत का सहारा नहीं लिया जा सकता।

वित्त मंत्रालय ने अपने स्पष्टीकरण में लगातार पेश किए गए केंद्रीय बजट भाषणों का भी हवाला दिया है। मंत्रालय ने कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले और अलग-अलग वर्षों के बजट भाषणों से आईडीबीआई बैंक के रणनीतिक विनिवेश को लेकर सरकार की नीति में आए बदलाव स्पष्ट होते हैं। वित्त वर्ष 2016-17 के बजट भाषण में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि आईडीबीआई बैंक में बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। सरकार इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाएगी और बैंक में अपनी हिस्सेदारी को 50 फीसदी से नीचे लाने के विकल्प पर विचार करेगी।

वित्त वर्ष 2021-22 का केंद्रीय बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रणनीतिक विनिवेश की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात कही थी। उन्होंने कहा था, ''कोविड-19 के बावजूद हमने रणनीतिक विनिवेश की दिशा में काम जारी रखा हुआ है। बीपीसीएल, एयर इंडिया, शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, आईडीबीआई बैंक, बीईएमएल, पवन हंस और नीलाचल इस्पात निगम लिमिटेड समेत कई सौदे का विनिवेश वित्त वर्ष 2021-22 में पूरे किए जाने थे।''

सीतारमण ने कहा था कि आईडीबीआई बैंक के अलावा सरकार वित्त वर्ष 2021-22 में सार्वजनिक क्षेत्र के दो बैंकों और सामान्य बीमा कंपनी के निजीकरण की प्रक्रिया शुरू करने का प्रस्ताव रखती है। इसके लिए विधायी संशोधनों की जरूरत होगी और इन्हें उसी सत्र में पेश करने का प्रस्ताव था।

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने बैंकिंग क्षेत्र में बड़े सुधार की दिशा में कदम उठाते हुए आईडीबीआई बैंक की रणनीतिक बिक्री को मंजूरी दे दी है। आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने इसी हफ्ते बैंक की 60.72 फीसदी हिस्सेदारी 52,878 करोड़ रुपये में बेचने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रजेश शंकर

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