(लीड)भारत में अराजकता से सत्ता परिवर्तन संभव नहीं : मोहन भागवत

20 Oct 2026 13:56:53
सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत नागपुर मे आयोजित विजयादशमी महोत्सव मे पाथेय देते हुए


- आंदोलन का उद्देश्य समाधान हो, राजनीति और सस्ती लोकप्रियता नहीं, नागपुर में संघ के विजयादशमी उत्सव में दिया राष्ट्रहित का संदेश

नागपुर, 20 अक्टूबर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि भारत में सामाजिक सौहार्द और संविधान के दायरे में चुनावी प्रक्रिया से सत्ता परिवर्तन संभव है, लेकिन हमारे देश में अराजकता से कभी सत्ता परिवर्तन न हुआ है, न होगा।

सरसंघचालक डॉ. भागवत मंगलवार काे महाराष्ट्र के नागपुर के रेशिमबाग मैदान पर आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विजयादशमी उत्सव में देश और दुनिया की मौजूदा परिस्थितियों और समस्याओं पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्हाेंने कहा कि पश्चिमी जगत की प्रेरणा और अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप से दुनिया के कई देशों में उथल-पुथल हो रही है। नेपाल, बांग्लादेश, अल्बानिया और फ्रांस में व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर चल रही हिंसक गतिविधियाँ और सत्ता परिवर्तन हम सभी देख रहे हैं। भारत में भी ऐसा असफल प्रयास हो रहा है।

डॉ. भागवत ने कहा कि पश्चिमी जगत की कुछ शक्तियाँ व्यवस्था, सांस्कृतिक मूल्यों और मानवीय संस्कारों को कमजोर करना चाहती हैं। उनके अनुसार सत्ता परिवर्तन के जरिए परिस्थितियाँ बदलने का दावा किया जाता है, लेकिन केवल सत्ता या शासन बदलने से समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो जाता। उन्हाेंने आह्वान किया कि देश को किसी भी प्रकार की अव्यवस्था और विभाजनकारी प्रवृत्तियों से बचाने के लिए समाज को सजग रहना होग। इसके साथ संघ के शताब्दी वर्ष समाराेह कार्यक्रमाें का समापन हाे गया।

आंदोलन का उद्देश्य समाधान हो, राजनीतिक लाभ नहीं

आंदोलनों की भूमिका पर संघ प्रमुख डॉ. भागवत ने कहा कि आंदोलन का उद्देश्य समाधान होना चाहिए। किसी समस्या के निराकरण के लिए समाज या किसी समूह द्वारा आंदोलन करना स्वाभाविक है, लेकिन आंदोलन की दिशा और उसके उद्देश्य पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि आंदोलन करने वाले समूहों और शांति एवं सुव्यवस्था बनाए रखने वाले शासन—दोनों की जिम्मेदारी है कि उनके कार्यों से समाज में अनावश्यक टकराव और वैमनस्य पैदा न हो।

उन्होंने चेताया कि तीव्र भावनाओं के बीच भी संविधान की मर्यादा का पालन होना चाहिए। बोलचाल, व्यवहार और सार्वजनिक गतिविधियों में संयम आवश्यक है। वोट हासिल करने, सस्ती लोकप्रियता पाने अथवा राजनीतिक लाभ उठाने की इच्छा विवेक और सद्भावना पर हावी नहीं होनी चाहिए। उनके मुताबिक, जब आंदोलन किसी वास्तविक समस्या के समाधान के बजाय किसी अन्य राजनीतिक लक्ष्य का साधन बन जाता है, तो उसका मूल उद्देश्य पीछे छूट सकता है।

विविधता में एकता ही भारत की पहचान

देश की एकजुटता पर जोर देते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि भारत में अलग-अलग भाषाओं, धर्मों, जातियों और परंपराओं के लोग रहते हैं। इसके बावजूद देश को जोड़ने वाली साझा सामाजिक और भावनात्मक पहचान उसकी महत्वपूर्ण विशेषता रही है। उन्होंने कहा कि विविधताओं को स्वीकार करना और उनकी रक्षा करना भारतीय समाज की परंपरा का हिस्सा है।

संविधान की प्रस्तावना में दर्ज ‘हम भारत के लोग’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने साझा राष्ट्रीय पहचान और आपसी जुड़ाव के महत्व को रेखांकित किया। उनके अनुसार, समाज की भावनात्मक एकता कमजोर होने से उसकी सामूहिक शक्ति भी प्रभावित होती है। इसलिए मतभेदों के बावजूद परस्पर सम्मान और सद्भाव बनाए रखना आवश्यक है।

वंदे मातरम् से कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए

राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् पर भागवत ने कहा कि लॉर्ड कर्जन ने धार्मिक आधार पर बंगाल का विभाजन किया था। इसी दौरान ‘वंदे मातरम्’ एकता और देशभक्ति के प्रतीक के रूप में उभरा। नतीजतन, अंग्रेजों को अपना निर्णय वापस लेना पड़ा और बंगाल का विभाजन विफल हो गया। हालांकि, 1947 में ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि लोग घृणा में डूब गए और राष्ट्रीय एकता को भूल गए। अंततः देश का विभाजन हो गया।

सरसंघचालक के अनुसार, वंदे मातरम्, जिसने बंगाल के विभाजन की साजिश को विफल किया, आज भी एकता की उसी शक्तिशाली प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। यह हमारा राष्ट्रगीत है और इसे पूर्ण रूप से, गर्व के साथ तथा बुलंद स्वर में गाने में कोई संकोच या आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

नशे की लत गंभीर राष्ट्रीय समस्या

सरसंघचालक ने युवाओं में बढ़ती नशे की लत और मादक पदार्थों के बढ़ते प्रभाव पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि विवेक और नैतिक मूल्यों के अभाव में युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में आ रही है। यह समस्या केवल किसी परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय चुनौती है। इससे निपटने के लिए शासन, प्रशासन और समाज को मिलकर निर्णायक प्रयास करने होंगे।

उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी में नैतिक मूल्यों और सद्विवेक को जागृत रखना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। नशे के खिलाफ देशव्यापी जनजागरण और रोकथाम अभियान चलाने के लिए संघ के स्वयंसेवक भी प्रयास करेंगे।

पंच परिवर्तन को दैनिक जीवन में अपनाने पर जोर

संघ के शताब्दी वर्ष के दौरान किए गए कार्यों का उल्लेख करते हुए डॉ. भागवत ने सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वबोध एवं स्वदेशी और नागरिक कर्तव्यपालन के पाँच सूत्रों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पंच परिवर्तन केवल एक वर्ष तक चलने वाला अभियान नहीं है, बल्कि इसे दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

विज्ञान, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते उपयोग पर उन्होंने कहा कि इनके साथ नैतिक अनुशासन और विवेक भी आवश्यक हैं। तकनीक का इस्तेमाल असत्य फैलाने या लोगों को गुमराह करने के लिए नहीं होना चाहिए। इसके प्रति समाज को सजग रहने की जरूरत है।

संघ नहीं होता तो हिंदू संस्कृति और जीवन पद्धति विलुप्त हो गई होतीकार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्त ने कहा कि

यदि संघ नहीं होता, तो हिंदू संस्कार और जीवन पद्धति न जाने कब विलुप्त हो गए होते। उन्होंने विजयादशमी और संघ के स्थापना दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि मुगलों और अंग्रेजों के शासन सहित लगभग 600 वर्षों की गुलामी के बाद भी आज भारतीयता और हिंदुत्व की विश्व में जो पहचान और प्रभाव है, उसका प्रमुख श्रेय संघ को जाता है। उन्हाेंने कहा कि संघ अपने शताब्दी वर्ष के बाद अगले 100 वर्षों के लिए भी समाज में सकारात्मक बदलाव लाने और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना के लक्ष्य के साथ कार्य कर रहा है। संघ और दैनिक जागरण की नीतियों में भारतीय सनातन संस्कृति, सद्भावना और राष्ट्र के प्रति समर्पण के मूलभूत बिंदुओं पर समानता है। दोनों का उद्देश्य देशवासियों में यह भावना जगाना है कि वे राष्ट्र के लिए क्या योगदान दे सकते हैं?

गुप्त ने कहा कि जनसंघ से लेकर आज विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं में भारतीयता और राष्ट्रीयता के संस्कार विकसित करने में संघ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भाजपा की अभूतपूर्व सफलता का श्रेय संघ की दृढ़ वैचारिक प्रतिबद्धता और अनुशासन को जाता है। उन्हाेंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद एक वर्ग ने संघ की विचारधारा को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि वह उसके तुष्टीकरण के एजेंडे के अनुरूप नहीं थी। तमाम चुनौतियों और आरोपों के बावजूद संघ व्यक्ति निर्माण और राष्ट्रनिष्ठा के अपने मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ता रहा है।

कई प्रमुख हस्तियाँ रहीं उपस्थित

समारोह में संघ के विदर्भ प्रांत संघचालक दीपक तामशेट्टीवार, विदर्भ प्रांत सहसंघचालक श्रीधर गाडगे और नागपुर महानगर संघचालक राजेश लोया सहित पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ तथा इजरायल के मिडवेस्ट इंडिया स्थित कॉन्सुल जनरल यानिव रेवाच माैजूद रहे।

इसके अलावा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, राज्य के राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले और राष्ट्र सेविका समिति की प्रमुख संचालिका शांताक्का सहित अनेक जनप्रतिनिधियों ने भाग लिया। -------------------------

हिन्दुस्थान समाचार / मनीष कुलकर्णी

Powered By Sangraha 9.0