जेन-जी यूजलेस नहीं, उसकी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा : इंद्रेश उपाध्याय

26 Oct 2026 17:52:53
युवाओं से संवाद करते हुए कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय


- कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय ने इंदौर में ‘जेन-जी चर्चा’ के दौरान युवाओं से किया संवाद

भोपाल/इंदौर, 26 अक्टूबर (हि.स.)। प्रसिद्ध कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय ने कहा कि आज की जेन-जी पीढ़ी यूजलेस नहीं है, बल्कि उसकी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। युवाओं में अपार संभावनाएं हैं, लेकिन उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने और निर्णय लेने वाली व्यवस्थाओं में पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे हैं। उन्होंने केंद्र सरकार से युवाओं की क्षमताओं पर ध्यान देने और उन्हें राजनीति एवं संवैधानिक व्यवस्थाओं में भागीदारी का अवसर देने की अपील की।

कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय सोमवार को इंदौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (डीएवीवी) के तक्षशिला परिसर स्थित ऑडिटोरियम में आयोजित 'जेन-जी चर्चा' कार्यक्रम में बोल रहे थे। इंदोरीएक्स और आईईटी डीएवीवी के संयुक्त आयोजन में उन्होंने नई पीढ़ी की सोच, धैर्य, सफलता, सामाजिक जिम्मेदारियों और आध्यात्मिक जीवन सहित विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखे।

संवाद के दौरान इंद्रेश उपाध्याय ने कहा कि समाज में अब चर्चा केवल राजपूत और ब्राह्मण जैसी जातियों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि जेन-जी और जेन-अल्फा जैसी नई पीढ़ियों के बीच भी अंतर और टकराव की स्थिति दिखाई देने लगी है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी की सोच और क्षमताओं को समझना जरूरी है। युवाओं को केवल आलोचना का विषय बनाने के बजाय उन्हें जिम्मेदारियां और निर्णय लेने के अवसर दिए जाने चाहिए।

धोनी, सचिन और विराट का उदाहरण देकर समझाया धैर्य का महत्व

इंद्रेश उपाध्याय ने युवाओं में धैर्य और सहनशक्ति की कमी पर चिंता जताई। उन्होंने भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी, महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली का उदाहरण देते हुए कहा कि इन खिलाड़ियों ने कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखा। उनकी सफलता के पीछे प्रतिभा के साथ संघर्ष करने और मुश्किल समय में हार नहीं मानने की भावना रही है।

उन्होंने कहा कि आज के युवाओं में धैर्य का स्तर शून्य से भी नीचे जाता दिखाई दे रहा है। किसी भी लक्ष्य को हासिल करने के लिए लगातार प्रयास करना और असफलताओं के बावजूद आगे बढ़ते रहना आवश्यक है। सफलता केवल प्रतिभा से नहीं मिलती, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में डटे रहने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

युवाओं को राजनीति और संवैधानिक व्यवस्थाओं में मिले अवसर

कथावाचक ने कहा कि जेन-जी को बेकार समझना गलत है। इस पीढ़ी में ऊर्जा, प्रतिभा और नए विचारों की कमी नहीं है, लेकिन इन क्षमताओं का अपेक्षित उपयोग नहीं हो पा रहा है। उन्होंने केंद्र सरकार से इस दिशा में गंभीरता से विचार करने की अपील की।

उन्होंने कहा कि युवाओं को केवल सामाजिक चर्चाओं तक सीमित रखने के बजाय राजनीति और संवैधानिक व्यवस्थाओं में भी आगे आने का अवसर मिलना चाहिए। इससे उनकी ऊर्जा और विचारों का व्यापक स्तर पर उपयोग हो सकेगा। नई पीढ़ी को जिम्मेदारी और भागीदारी देकर ही उसकी वास्तविक क्षमता का लाभ समाज को मिल सकता है।

इंद्रेश उपाध्याय ने देवी अहिल्याबाई होलकर का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने न केवल होलकर वंश, बल्कि पूरे देश में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनके कार्यों और योगदान ने उन्हें समाज में विशेष सम्मान दिलाया।

उन्होंने पारिवारिक जिम्मेदारियों पर चर्चा करते हुए कहा कि बहू ऐसी होनी चाहिए, जो विवाह से पहले अपने पिता और भाई का सम्मान करे और विवाह के बाद अपने ससुराल का नाम रोशन करे। देवी अहिल्याबाई के जीवन का उदाहरण देते हुए उन्होंने परिवार के प्रति सम्मान, जिम्मेदारी और अपने कार्यों से पहचान बनाने के महत्व पर जोर दिया।

कलयुग में भगवान का नाम ही बदलाव का माध्यम बनेगा

धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों पर विचार रखते हुए इंद्रेश उपाध्याय ने कहा कि कलयुग में भगवान का नाम ही सकारात्मक बदलाव का माध्यम बनेगा। उन्होंने कहा कि वर्तमान युग में भगवान स्वयं प्रकट होकर बुराइयों का अंत करने नहीं आएंगे। कल्कि भगवान के आगमन का समय अभी बहुत दूर है। उन्होंने कहा कि आज समाज में रावण और कंस जैसी प्रवृत्तियों के रूप में अनेक बुराइयां मौजूद हैं। इनसे मुक्ति पाने और जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए व्यक्ति को स्वयं प्रयास करना होगा।

इंद्रेश उपाध्याय ने बच्चों को नियमित रूप से भगवान का नाम लेने की सलाह देते हुए कहा कि लगातार 30 दिन तक प्रतिदिन भगवान का नाम लेने का अभ्यास करें। उनके अनुसार, 31वें दिन व्यक्ति स्वयं अपने जीवन में बदलाव महसूस कर सकता है।

कार्यक्रम में नई पीढ़ी के सामने मौजूद चुनौतियों, सामाजिक जिम्मेदारियों और सफलता प्राप्त करने के तरीकों पर चर्चा हुई। इंद्रेश उपाध्याय ने युवाओं की क्षमताओं को पहचानने, उनमें धैर्य विकसित करने और उन्हें सामाजिक एवं संवैधानिक व्यवस्थाओं में अधिक भागीदारी देने की आवश्यकता बताई।-------------

हिन्दुस्थान समाचार / उम्मेद सिंह रावत

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