अरुणाचल प्रदेश में कल से दर्शनार्थ रखे जाएंगे भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष

30 Oct 2026 10:56:53
भगवान बुद्ध। (फाइल फोटो)


नई दिल्ली, 30 अक्टूबर (हि.स.)। भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष 31 अक्टूबर से 21 नवंबर तक अरुणाचल प्रदेश के तीन प्रमुख बौद्ध केंद्रों तवांग, बोमडिला और नामसाई में श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए रखे जाएंगे। केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत 31 अक्टूबर को तवांग स्थित ऐतिहासिक गादेन नामग्याल ल्हात्से (तवांग मठ) में आयोजन के उद्घाटन समारोह में शामिल होंगे। राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में संरक्षित भगवान बुद्ध के ये पवित्र अवशेष इस आयोजन के तहत अरुणाचल प्रदेश के इन तीन स्थानों पर ले जाए जाएंगे।

केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय अरुणाचल प्रदेश सरकार, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ और राष्ट्रीय संग्रहालय के सहयोग से इस आयोजन का संचालन कर रहा है। इसका उद्देश्य श्रद्धालुओं को पवित्र अवशेषों के दर्शन का अवसर देने के साथ राज्य की समृद्ध बौद्ध परंपराओं और भारत की बौद्ध विरासत को सामने लाना है। आयोजन में बौद्ध भिक्षु, धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधि, विद्वान और विभिन्न क्षेत्रों के लोग शामिल होंगे।

पवित्र अवशेषों को आज रात राष्ट्रीय संग्रहालय से विशेष धार्मिक अनुष्ठानों के साथ रवाना किया जाएगा। उन्हें भारतीय वायुसेना के विशेष विमान से दिल्ली के पालम वायुसेना स्टेशन से गुवाहाटी स्थित बोरझार वायुसेना स्टेशन ले जाया जाएगा। वहां से हेलीकॉप्टर के माध्यम से तवांग पहुंचाया जाएगा। तवांग में धार्मिक परंपराओं के अनुसार उनका स्वागत किया जाएगा और तवांग मठ में स्थापित किया जाएगा। यहां 31 अक्टूबर को सुबह 10 से 11:30 बजे के बीच उद्घाटन समारोह प्रस्तावित है। एक नवंबर को अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू की मौजूदगी में प्रदर्शनी और इससे जुड़े कार्यक्रमों का औपचारिक उद्घाटन होगा।

यह आयोजन तिब्बती बौद्ध परंपरा के महत्वपूर्ण पर्व ल्हाबाब दुचेन के अवसर पर हो रहा है। यह पर्व भगवान बुद्ध के स्वर्गलोक से धरती पर लौटने की स्मृति में मनाया जाता है। तवांग में एक से सात नवंबर तक श्रद्धालु पवित्र अवशेषों के दर्शन कर सकेंगे। इसके बाद आठ से 13 नवंबर तक बोमडिला स्थित टीजीएल मठ (लोअर गोम्पा) और 14 से 20 नवंबर तक नामसाई स्थित गोल्डन पैगोडा में दर्शन की व्यवस्था रहेगी। 21 नवंबर को अवशेषों को तेजू और पालम के रास्ते वापस राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली लाया जाएगा।

आयोजन के दौरान पवित्र अवशेषों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं। संस्कृति मंत्रालय रक्षा मंत्रालय, भारतीय वायुसेना, अरुणाचल प्रदेश सरकार और राष्ट्रीय संग्रहालय के साथ मिलकर परिवहन और अन्य व्यवस्थाओं का समन्वय कर रहा है। पहाड़ी क्षेत्र और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए विमान और हेलीकॉप्टर से अवशेषों को ले जाने की योजना बनाई गई है। हालांकि, परिवहन का समय और व्यवस्था मौसम, सुरक्षा तथा परिचालन संबंधी परिस्थितियों के अधीन रहेगी।

इन पवित्र अवशेषों का संबंध उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में स्थित पिपरहवा पुरातात्विक स्थल से है। यह स्थान प्राचीन कपिलवस्तु और शाक्य परंपरा से जुड़ा माना जाता है। वर्ष 1898 में विलियम क्लैक्सटन पेप्पे ने यहां एक स्तूप की खुदाई की थी। इस दौरान अस्थि अवशेषों और बहुमूल्य वस्तुओं से युक्त पात्र मिले थे। इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1971 से 1977 के बीच पुरातत्वविद् के.एम. श्रीवास्तव के निर्देशन में यहां आगे की खुदाई की। इस दौरान दो अन्य अवशेष पात्र मिले, जिनमें भगवान बुद्ध से परंपरागत रूप से जुड़े 22 अस्थि अवशेष प्राप्त हुए। इनमें से 20 राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली और दो भारतीय संग्रहालय, कोलकाता में संरक्षित हैं।

इस आयोजन के साथ ‘अनअर्थिंग द सेक्रेड पिपरहवा’ नाम से एक विशेष प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी। अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ की ओर से आयोजित यह प्रदर्शनी तवांग, बोमडिला और नामसाई तीनों स्थानों पर लगेगी। इसमें पिपरहवा की खुदाई, पवित्र अवशेषों की खोज, उनके ऐतिहासिक महत्व और वर्ष 2025 में भारत वापस लाए गए पिपरहवा के आभूषणों से जुड़ी जानकारी प्रदर्शित की जाएगी। इसका उद्देश्य लोगों को भगवान बुद्ध के अवशेषों की परंपरा और भारत की पुरातात्विक विरासत से परिचित कराना है।

तवांग में दो नवंबर को ‘बौद्ध धर्म : हिमालयी क्षेत्र और उससे आगे प्रसार’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भी आयोजित किया जाएगा। कालावांगपो कन्वेंशन हॉल में होने वाले इस सम्मेलन में भारत के अलावा नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, मलेशिया, इंडोनेशिया और जर्मनी के भिक्षु, बौद्ध विद्वान और प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे। सम्मेलन में भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनकी शिक्षाओं के प्रसार, बौद्ध परंपराओं की निरंतरता, मठों और धार्मिक संस्थाओं की भूमिका तथा आधुनिक समय में बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता पर चर्चा होगी।

सम्मेलन में बौद्ध धर्म की ऐतिहासिक और सैद्धांतिक निरंतरता, हिमालयी क्षेत्र में बौद्ध परंपराओं के संरक्षण और समकालीन जीवन में बौद्ध नैतिक शिक्षाओं की भूमिका जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया जाएगा। इसके साथ ही सांस्कृतिक पर्यटन, तीर्थयात्रा, कौशल विकास, टिकाऊ आजीविका और वैश्वीकरण के दौर में बौद्ध विचारों की प्रासंगिकता पर भी चर्चा होगी।

अरुणाचल प्रदेश में बौद्ध धर्म की अलग-अलग परंपराएं प्रचलित हैं। तवांग और पश्चिम कामेंग क्षेत्र महायान और वज्रयान बौद्ध परंपराओं से जुड़े हैं, जबकि नामसाई और आसपास के इलाकों में ताई खामती समुदाय सहित अन्य बौद्ध समुदाय थेरवाद परंपरा का पालन करते हैं। तवांग, बोमडिला और नामसाई में पवित्र अवशेषों का आयोजन इन विविध बौद्ध परंपराओं से जुड़े समुदायों को एक साझा आध्यात्मिक विरासत से जोड़ने का अवसर देगा।

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार इससे पहले मंगोलिया, थाईलैंड, वियतनाम, रूस के काल्मिकिया क्षेत्र, भूटान, श्रीलंका और लद्दाख में भी भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों की प्रदर्शनियां आयोजित कर चुकी है। वर्ष 2022 में मंगोलिया, 2024 में थाईलैंड और 2025 में वियतनाम में आयोजित प्रदर्शनियों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया था। फरवरी 2026 में देवनीमोरी के पवित्र अवशेष श्रीलंका ले जाए गए थे। मई 2026 में लद्दाख में भगवान बुद्ध के अवशेषों के दर्शन का आयोजन हुआ था। इसके बाद मई-जून 2026 में भगवान बुद्ध के प्रमुख शिष्यों अरहंत सारिपुत्त और अरहंत महामोग्गल्लान के अवशेष मंगोलिया ले जाए गए थे।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर

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