नई दिल्ली, 30 अक्टूबर (हि.स.)। भारत की उन्नत तकनीकी क्षमता और श्रीलंका की स्थानीय आवश्यकताओं को एक मंच पर लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (आईआईटी मद्रास) की प्रवर्तक टेक्नोलॉजीज फाउंडेशन और श्रीलंका की प्रमुख दूरसंचार कंपनी डायलॉग एक्सियाटा पीएलसी ने अनुसंधान, नवाचार और प्रौद्योगिकी विकास को बढ़ावा देने के लिए रणनीतिक साझेदारी की है।
इस सहयोग का उद्देश्य दोनों देशों के बीच तकनीकी ज्ञान, विशेषज्ञता और संसाधनों का आदान-प्रदान करते हुए ऐसी तकनीकों का विकास करना है, जो समाज और उद्योगों की वास्तविक जरूरतों को पूरा कर सकें। इस साझेदारी के तहत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), डेंगू की रोकथाम, मानव-हाथी संघर्ष का समाधान तथा उद्योगों के लिए कुशल और प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करने जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
कोलंबो में हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन के अंतर्गत एआई आधारित तकनीकी समाधानों के विकास और उनके व्यावहारिक उपयोग को प्रोत्साहित किया जाएगा। वहीं, डेंगू जैसी गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती से निपटने के लिए तकनीक आधारित निगरानी, शोध और रोकथाम के उपायों पर सहयोग की संभावनाएं तलाश की जाएंगी।
संबंधों को तकनीकी सहयोग से मिलेगी मजबूती
श्रीलंका में भारत के उच्चायुक्त संतोष झा ने इस साझेदारी का स्वागत करते हुए कहा कि भारत और श्रीलंका के संबंध ऐतिहासिक जुड़ाव और प्रगति के प्रति साझा प्रतिबद्धता पर आधारित हैं। दोनों देशों की द्विपक्षीय साझेदारी लगातार विकसित हो रही है और प्रौद्योगिकी एवं अनुसंधान में सहयोग से संस्थानों तथा लोगों के बीच संबंधों को और गहरा करने के महत्वपूर्ण अवसर मिलेंगे। उन्होंने इस पहल को दोनों देशों के बीच बढ़ती साझेदारी में सार्थक योगदान बताया।
दूसरी ओर यह समझौता ऐसे समय में महत्वपूर्ण हो गया है, जब तकनीकी नवाचार, स्थानीय जरूरतों के अनुरूप अनुसंधान और ज्ञान के व्यावहारिक उपयोग को आर्थिक एवं सामाजिक विकास का अहम आधार माना जा रहा है। साझेदारी के माध्यम से भारत की अनुसंधान क्षमताओं और श्रीलंका के स्थानीय अनुभव को एक साथ लाकर ऐसी परियोजनाओं को बढ़ावा देने की योजना है, जिनके परिणामों का आकलन किया जा सके और सफल प्रयोगों को व्यापक स्तर पर लागू किया जा सके।
पांच क्षेत्रों में मिलकर काम करेंगे संस्थान
इस समझौते के तहत डायलॉग एक्सियाटा सहयोग के आधार और प्रौद्योगिकी प्रदाता की भूमिका निभाएगा। वह आईआईटीएम प्रवर्तक के अनुसंधान नेटवर्क को श्रीलंका के विश्वविद्यालयों, संबंधित सरकारी संस्थानों और उद्योग जगत के हितधारकों से जोड़ेगा। साझेदारी में पांच प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाएगा।
पहला क्षेत्र नवाचार और इनक्यूबेशन है, जिसके तहत नए विचारों को विकसित करने और उन्हें व्यावहारिक उपयोग तक पहुंचाने के अवसर तलाशे जाएंगे। दूसरा क्षेत्र अनुप्रयुक्त अनुसंधान और विश्वविद्यालय प्रयोगशालाओं से जुड़ा है, जहां अकादमिक ज्ञान को वास्तविक समस्याओं के समाधान में इस्तेमाल करने पर जोर होगा।
तीसरे क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मानव-केंद्रित समाधान विकसित किए जाएंगे। चौथे क्षेत्र के तहत उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप कौशल विकास और प्रतिभाओं को तैयार करने पर ध्यान दिया जाएगा। पांचवां क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय ज्ञान साझाकरण का है, जिसके माध्यम से शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और उद्योग विशेषज्ञों के बीच अनुभव तथा तकनीकी जानकारी का आदान-प्रदान बढ़ाया जाएगा।
सिंहली और तमिल में संवादात्मक एआई विकसित करने की तैयारी
इस साझेदारी के शुरुआती चरण में तीन संभावित क्षेत्रों को विशेष महत्व दिया गया है। इनमें सिंहली और तमिल भाषाओं में संवादात्मक कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकसित करना, प्रौद्योगिकी के माध्यम से डेंगू की रोकथाम और उसके प्रकोप से निपटने की क्षमता बढ़ाना तथा मानव-हाथी संघर्ष के समाधान तलाशना शामिल है। दरअसल, सिंहली और तमिल संवादात्मक एआई पर अनुसंधान से स्थानीय भाषाओं में तकनीक के उपयोग की संभावनाओं को आगे बढ़ाया जा सकता है। इसका उद्देश्य स्थानीय भाषायी जरूरतों के अनुरूप संवादात्मक तकनीक विकसित करने के रास्ते तलाशना होगा।
वहीं, डेंगू की रोकथाम और नियंत्रण के क्षेत्र में तकनीक आधारित उपायों की संभावनाओं का अध्ययन किया जाएगा। इसी तरह मानव-हाथी संघर्ष के समाधान के लिए भी अनुसंधान और तकनीकी प्रयोगों के जरिए व्यावहारिक विकल्प तलाशे जाएंगे। इन विषयों पर केंद्रित अनुसंधान पहलों और पायलट परियोजनाओं के माध्यम से काम आगे बढ़ाया जाएगा। शुरुआती परियोजनाओं के परिणामों का मूल्यांकन करने के बाद उनके विस्तार की संभावनाएं देखी जाएंगी।
आईआईटी मद्रास निदेशक बोले, परिणामोन्मुखी सहयोग की उम्मीद
आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामाकोटी ने इस साझेदारी को भारत और श्रीलंका के बीच तकनीकी सहयोग की महत्वपूर्ण पहल बताया। उन्होंने कहा, भारत और श्रीलंका कई मोर्चों पर साझेदारी कर रहे हैं। उन्नत तकनीकों पर डायलॉग एक्सियाटा पीएलसी के साथ काम करने की यह विशेष साझेदारी बेहद रोमांचक है। मैं एक सक्रिय और परिणामोन्मुखी सहयोग की उम्मीद कर रहा हूं।
उनके वक्तव्य से स्पष्ट है कि इस पहल का जोर तकनीकी क्षमताओं को साझा करने के साथ-साथ अनुसंधान के ऐसे परिणाम हासिल करने पर है, जिनका उपयोग व्यावहारिक परिस्थितियों में किया जा सके। विश्वविद्यालयों, उद्योगों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच सहयोग से नए प्रयोगों तथा समाधान विकसित करने के अवसर बढ़ेंगे।
आईआईटीएम प्रवर्तक टेक्नोलॉजीज फाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. शंकर रमन ने शुक्रवार को बताया कि यह सहयोग अकादमिक अनुसंधान और व्यावहारिक अनुप्रयोग के बीच संबंध मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है। डायलॉग, श्रीलंकाई विश्वविद्यालयों और स्थानीय हितधारकों के साथ मिलकर काम करते हुए ऐसा वातावरण विकसित करने की उम्मीद है, जहां शोधकर्ता और विद्यार्थी ज्ञान का आदान-प्रदान कर सकें, तकनीकी क्षमताएं बढ़ा सकें और वास्तविक दुनिया की जरूरतों को पूरा करने वाले समाधान विकसित कर सकें।
डॉ. रमन के इस दौरान यह भी बताया कि इस साझेदारी का उद्देश्य अनुसंधान समुदाय और उद्योग, दोनों के लिए मूल्य सृजित करना है। इससे शैक्षणिक संस्थानों में विकसित विचारों और तकनीकों को उद्योग तथा समाज की जरूरतों से जोड़ने के अवसर मिल सकते हैं।
डायलॉग की भूमिका, वैश्विक विशेषज्ञता को स्थानीय प्रतिभा से जोड़ना
डायलॉग एक्सियाटा पीएलसी के निदेशक एवं समूह मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुपुन वीरसिंघे का इस संबंध में कहना रहा कि प्रौद्योगिकी का वास्तविक महत्व वास्तविक चुनौतियों का समाधान करने और लोगों तथा समुदायों के लिए सार्थक अवसर पैदा करने में है। इस साझेदारी के जरिए वैश्विक विशेषज्ञता को श्रीलंकाई प्रतिभा से जोड़कर ऐसे समाधान विकसित करने का लक्ष्य है, जो स्थायी बदलाव ला सकें। उन्होंने सहयोग को सफल बनाने में योगदान के लिए भारत के उच्चायुक्त और भारतीय उच्चायोग की टीम के प्रति आभार भी व्यक्त किया।
डायलॉग श्रीलंका में कनेक्टिविटी और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपनी भूमिका के माध्यम से इस पहल को सहयोग प्रदान करेगा। आईआईटीएम प्रवर्तक के अनुसंधान नेटवर्क और श्रीलंका के शैक्षणिक तथा औद्योगिक संस्थानों के बीच संपर्क स्थापित करना इस समझौते का प्रमुख हिस्सा है।
दोनों संस्थानों ने साझेदारी को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने की योजना बनाई है। शुरुआत चुनिंदा पायलट परियोजनाओं से होगी, जिनके संभावित लाभों का मूल्यांकन किया जाएगा। इसके बाद सफल पहलों के विस्तार के अवसर तलाशे जाएंगे। इस प्रक्रिया में प्रत्येक परियोजना के उद्देश्य स्पष्ट रूप से निर्धारित किए जाएंगे और उनके परिणामों को मापने पर जोर रहेगा। इससे अनुसंधान की दिशा, तकनीकी समाधान की उपयोगिता और परियोजनाओं के व्यावहारिक प्रभाव का आकलन करने में मदद मिलेगी। वहीं, शुरुआती प्रयोगों से प्राप्त अनुभव के आधार पर आगे की योजनाएं तैयार की जा सकेंगी और उन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जा सकेगी, जहां तकनीकी हस्तक्षेप से स्थानीय स्तर पर अधिक लाभ मिलने की संभावना होगी।
आईआईटीएम प्रवर्तक की विशेष भूमिका
आईआईटीएम प्रवर्तक टेक्नोलॉजीज फाउंडेशन एक सेक्शन आठ कंपनी है, जिसके अंतर्गत सेंसर, नेटवर्किंग, एक्चुएटर्स और कंट्रोल सिस्टम्स (एसएनएसीएस) पर आधारित टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब संचालित होता है। यह केंद्र अंतरविषयक साइबर-भौतिक प्रणालियों पर राष्ट्रीय मिशन के तहत स्थापित किया गया है और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास द्वारा संचालित है।
फाउंडेशन का उद्देश्य प्रौद्योगिकी नवाचार को बढ़ावा देना और शिक्षा जगत, उद्योग, सरकार तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों के बीच सहयोग को मजबूत करना है। इसके स्टार्टअप इकोसिस्टम में प्रतिभाशाली पेशेवरों, नवोन्मेषी उद्यमियों, युवा प्रतिभाओं और विद्यार्थियों को आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करने पर जोर दिया जाता है। विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे, उपकरणों और अनुभवी मार्गदर्शकों के माध्यम से यह संस्थान तकनीकी विचारों को विकसित करने और नवाचार के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने की दिशा में काम करता है।
भारत और श्रीलंका की इस नई साझेदारी में भी यही दृष्टिकोण महत्वपूर्ण रहेगा। अनुसंधान नेटवर्क, विश्वविद्यालयों, उद्योगों और सरकारी संस्थानों को जोड़कर दोनों पक्ष तकनीकी ज्ञान के आदान-प्रदान और व्यावहारिक समाधानों के विकास को आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे। ऐसे में यह समझौता भारत और श्रीलंका के बीच सहयोग को पारंपरिक द्विपक्षीय संबंधों से आगे बढ़ाकर अनुसंधान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तकनीकी कौशल और सामाजिक चुनौतियों के समाधान से जोड़ने की पहल है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी