
मुंबई, 30 अक्टूबर (हि.स.)। हॉरर फिल्मों में डर के साथ रहस्य का होना भी जरूरी है। निर्देशक राजन रामगोपाल वर्मा की 'झाड़-फूंक' इसी मेल के जरिए दर्शकों को डर और अनिश्चितता के माहौल में ले जाने की कोशिश करती है। उत्तराखंड की पहाड़ियों में बुनी गई इस कहानी में यशपाल शर्मा का रहस्यमयी अंदाज और सुम्बुल तौकीर खान का भावनात्मक अभिनय खास तौर पर ध्यान खींचता है। अंधविश्वास, भूत-प्रेत और एक गर्भवती महिला के संघर्ष पर आधारित यह फिल्म रहस्य को धीरे-धीरे सामने लाती है।
कहानी
फिल्म की शुरुआत उत्तराखंड की पहाड़ियों में सफर कर रही आस्था (सुम्बुल तौकीर खान) और राजवीर (हर्ष राजपूत) से होती है। आस्था गर्भवती है और राजवीर से नाराज है, क्योंकि उसने अभी तक अपने परिवार से उनकी शादी की बात नहीं की है। सफर के दौरान अचानक उनकी कार के सामने एक रहस्यमयी महिला आ जाती है। उसे बचाने की कोशिश में कार दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है और दोनों घायल हो जाते हैं। होश आने पर आस्था खुद को एक अनजान घर में पाती है, जहां मोहन ठाकुर (यशपाल शर्मा) और उनकी पत्नी कामिनी (पद्मिनी कोल्हापुरे) उसकी देखभाल कर रहे होते हैं। आस्था राजवीर के बारे में पूछती है, लेकिन उसे बताया जाता है कि दुर्घटना के समय वह कार में अकेली थी। यह सुनकर वह हैरान रह जाती है।
कुछ समय बाद उस घर में अजीब घटनाएं होने लगती हैं। अनजानी आहटें और रहस्यमयी अनुभव आस्था के डर को बढ़ा देते हैं। जब वह मोहन और कामिनी से इन घटनाओं के बारे में पूछती है, तो वे उसे मंजरी नाम की एक महिला की कहानी सुनाते हैं। उनके मुताबिक, कई साल पहले गांव वालों ने मंजरी को उसके गर्भ में पल रही बच्ची के साथ मार दिया था। मरने से पहले उसने कथित तौर पर गांव में किसी बच्चे को जन्म नहीं लेने देने की कसम खाई थी। अब आस्था को लगने लगता है कि वह भी इसी रहस्य का हिस्सा बन चुकी है। क्या वह इस घर से बाहर निकल पाएगी? राजवीर कहां है और उसके होने वाले बच्चे का क्या होगा? फिल्म इन्हीं सवालों के सहारे आगे बढ़ती है।
अभिनय
यशपाल शर्मा फिल्म के प्रमुख आकर्षण हैं। मोहन ठाकुर के किरदार में वह गंभीरता और रहस्य का अच्छा मेल पेश करते हैं। उनके चेहरे के भाव, संवाद अदायगी और संयमित अभिनय किरदार को दिलचस्प बनाते हैं। कई दृश्यों में उनकी मौजूदगी ही कहानी के तनाव को बढ़ाने के लिए काफी साबित होती है। सुम्बुल तौकीर खान ने आस्था के किरदार में अच्छा काम किया है। दुर्घटना के बाद अनजान जगह पर फंस जाने और अपने होने वाले बच्चे की चिंता के बीच उनका किरदार डर, बेचैनी और असुरक्षा से गुजरता है। सुम्बुल इन भावनाओं को सहजता से प्रस्तुत करती हैं। तनावपूर्ण दृश्यों में उनका अभिनय प्रभावी लगता है। पद्मिनी कोल्हापुरे कामिनी के किरदार में अपनी अनुभवी अदाकारी से कहानी को गंभीरता देती हैं। वहीं, हर्ष राजपूत सीमित दृश्यों के बावजूद राजवीर की भूमिका में प्रभाव छोड़ते हैं। अन्य कलाकार भी कहानी के रहस्य को बनाए रखने में सहयोग करते हैं।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष
राजन रामगोपाल वर्मा ने कहानी में रहस्य को धीरे-धीरे खोलने की कोशिश की है। दुर्घटना, अनजान घर, लापता साथी और मंजरी के अतीत से जुड़े सवाल दर्शकों की उत्सुकता बनाए रखते हैं। फिल्म का एकांत वातावरण और उत्तराखंड की पहाड़ियां कहानी के अनुरूप हैं। हॉरर फिल्मों में खामोशी, ध्वनि और वातावरण की अहम भूमिका होती है। ‘झाड़-फूंक’ में इन पहलुओं का इस्तेमाल डर और तनाव पैदा करने के लिए किया गया है। बैकग्राउंड म्यूजिक और साउंड डिजाइन रहस्यमयी दृश्यों के प्रभाव को बढ़ाते हैं। हालांकि, कुछ दृश्यों को अधिक कसाव और बेहतर प्रस्तुति के साथ फिल्माया जा सकता था, लेकिन कुल मिलाकर तकनीकी पक्ष कहानी के माहौल को सहारा देते हैं।
अंतिम फैसला
'झाड़-फूंक' हॉरर, अंधविश्वास और रहस्य को एक साथ जोड़ने वाली फिल्म है। इसकी कहानी एक गर्भवती महिला के इर्द-गिर्द घूमती है, जो दुर्घटना के बाद एक ऐसी जगह पहुंच जाती है, जहां हर घटना उसके लिए नया सवाल बन जाती है। यशपाल शर्मा का रहस्यमयी अभिनय और सुम्बुल तौकीर खान की प्रभावशली अदाकारी फिल्म को मजबूती देते हैं। पद्मिनी कोल्हापुरे और हर्ष राजपूत भी अपनी भूमिकाओं में अच्छा काम करते हैं। फिल्म में डर और रहस्य का माहौल काफी हद तक बना रहता है, हालांकि कुछ हिस्सों में कहानी को और बेहतर तरीके से पेश किया जा सकता था। अगर आप भूत-प्रेत, अंधविश्वास और सस्पेंस से भरी कहानियां पसंद करते हैं, तो 'झाड़-फूंक' आपके लिए एक अच्छा विकल्प हो सकती है।
फिल्म: 'झाड़-फूंक'
कलाकार: यशपाल शर्मा, पद्मिनी कोल्हापुरे, सुम्बुल तौकीर खान, हर्ष राजपूत, अप्रतिम सिंह
निर्देशक: राजन रामगोपाल वर्मा
निर्माता: शैलेश परिहार
सह-निर्माता: वृंदा ब्रह्मभट्ट
शैली: हॉरर
प्लेटफॉर्म: जियो हॉटस्टार
रेटिंग: ★★★½ (3.5/5)
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हिन्दुस्थान समाचार / लोकेश चंद्र दुबे