एम्स रायपुर में जीनोमिक निदान पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित

05 Oct 2026 22:12:53
कार्यशाला में आये  देश के विभिन्न हिस्सों से आए चिकित्सकों, विशेषज्ञों, विद्यार्थियों और प्रयोगशाला पेशेवर


एम्स रायपुर के कार्यपालक निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल अशोक जिंदल (सेवानिवृत्त) ने किया। प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए


- साइटोजेनेटिक तकनीकों पर विशेषज्ञों ने साझा किया अनुभव

रायपुर, 05 अक्टूबर (हि.स.)। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), रायपुर के साइटोजेनेटिक्स विभाग द्वारा एनाटॉमी विभाग के सहयोग से “फ्लोरोसेंट इन सिटू हाइब्रिडाइजेशन में संवेदनशीलता एवं कौशल विकास” विषय पर सतत चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम एवं राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन आज किया गया।

कार्यशाला का उद्देश्य उन्नत आणविक साइटोजेनेटिक तकनीक फ्लोरोसेंट इन सिटू हाइब्रिडाइजेशन के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ ही इसके व्यावहारिक उपयोग और नैदानिक कौशल को विकसित करना था।

कार्यक्रम का उद्घाटन एम्स रायपुर के कार्यपालक निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल अशोक जिंदल (सेवानिवृत्त) ने किया। प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए उन्होंने इस पहल को संस्थान की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में एक मील का पत्थर बताया। उन्होंने एम्स रायपुर में उन्नत जीनोमिक निदान सुविधाओं की स्थापना और सुदृढ़ीकरण के साथ चिकित्सा आनुवंशिकी के क्षेत्र में विशेषज्ञता तथा कौशल विकास की आवश्यकता पर जोर दिया।

वैज्ञानिक सत्र में सेंटर ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स, बेंगलुरु के आमंत्रित विशेषज्ञ डॉ जयराम ने फ्लोरोसेंट इन सिटू हाइब्रिडाइजेशन के सिद्धांत, कार्यप्रणाली और नैदानिक उपयोगिता पर व्याख्यान दिया। उन्होंने विभिन्न विशिष्ट गुणसूत्रीय एवं आनुवंशिक असामान्यताओं की पहचान में इस तकनीक की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि ऐसे जटिल मामलों में यह तकनीक विशेष रूप से उपयोगी है, जहां पारंपरिक जांचों से पर्याप्त और स्पष्ट निदान प्राप्त करना संभव नहीं हो पाता।

एम्स रायपुर की प्रोफेसर डॉ मनीषा बी. सिन्हा ने “कैरियोटाइपिंग के बाद फ्लोरोसेंट इन सिटू हाइब्रिडाइजेशन की आवश्यकता क्यों और कहां होती है” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि पारंपरिक कैरियोटाइपिंग संख्यात्मक तथा बड़ी संरचनात्मक गुणसूत्रीय असामान्यताओं की पहचान के लिए महत्वपूर्ण जांच है, जबकि फ्लोरोसेंट इन सिटू हाइब्रिडाइजेशन किसी विशिष्ट गुणसूत्र अथवा गुणसूत्रीय क्षेत्र के संबंध में लक्षित और अधिक विशिष्ट जानकारी प्रदान करता है। ऐसी जानकारी कई बार नियमित कैरियोटाइपिंग से स्पष्ट रूप से प्राप्त नहीं हो पाती।

डॉ सिन्हा ने विभिन्न नैदानिक मामलों का प्रस्तुतिकरण करते हुए यह समझाया कि कैरियोटाइपिंग के बाद किन परिस्थितियों में उपयुक्त फ्लोरोसेंट इन सिटू हाइब्रिडाइजेशन जांच का चयन किया जाना चाहिए। केस आधारित चर्चा के माध्यम से उन्होंने बताया कि पारंपरिक साइटोजेनेटिक्स और आणविक साइटोजेनेटिक तकनीकों का समन्वय नैदानिक सटीकता बढ़ाने तथा जटिल गुणसूत्रीय असामान्यताओं के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

कार्यशाला में फ्लोरोसेंट इन सिटू हाइब्रिडाइजेशन के विभिन्न नैदानिक उपयोगों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। इनमें एनीयूप्लॉइडी, सूक्ष्म विलोपन, द्विगुणन, मार्कर गुणसूत्र और अन्य गुणसूत्रीय असामान्यताओं की पहचान प्रमुख रही। विशेषज्ञों ने आधुनिक जीनोमिक निदान के क्षेत्र में फ्लोरोसेंट इन सिटू हाइब्रिडाइजेशन को एक महत्वपूर्ण आणविक साइटोजेनेटिक तकनीक के रूप में रेखांकित किया।

राष्ट्रीय स्तर की इस कार्यशाला में देश के विभिन्न हिस्सों से आए चिकित्सकों, विशेषज्ञों, विद्यार्थियों और प्रयोगशाला पेशेवरों ने सहभागिता की। कार्यक्रम के दौरान ज्ञान के आदान-प्रदान, व्यावहारिक प्रशिक्षण और कौशल विकास पर विशेष जोर दिया गया। सतत चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम ने प्रतिभागियों को फ्लोरोसेंट इन सिटू हाइब्रिडाइजेशन की व्यावहारिक उपयोगिता समझने तथा उन्नत नैदानिक तकनीक के प्रयोग में अपने कौशल को विकसित करने का अवसर प्रदान किया।

एम्स रायपुर की यह पहल संस्थान में जीनोमिक एवं आणविक साइटोजेनेटिक निदान सुविधाओं को सुदृढ़ करने तथा चिकित्सा आनुवंशिकी के क्षेत्र में उन्नत नैदानिक क्षमताओं के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

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हिन्दुस्थान समाचार / केशव केदारनाथ शर्मा

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