मध्य प्रदेश स्थापना दिवस राज्योत्सव को लोकगीत एवं जनजातीय प्रस्तुतियों ने बनाया अविस्मरणीय

03 Nov 2026 23:42:53
मध्य प्रदेश स्थापना दिवस राज्योत्सव में प्रस्तुति देते हुए मामे खान


मध्य प्रदेश स्थापना दिवस राज्योत्सव में प्रस्तुति देते हुए मामे खान


- मप्र के 71वें स्थापना दिवस समारोह का समापन, मरुधरा की सुगंध और सूफियाना सुरों से महकी शाम, मामे खान की दमदार प्रस्तुति ने बाँधा समां

भोपाल, 03 नवंबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के 71वें स्थापना दिवस समारोह 'राज्योत्सव' के अंतिम दिन मंगलवार की शाम प्रदेश की समृद्ध लोक एवं जनजातीय कला-संस्कृति के विविध रंगों के साथ राजस्थान की सुरमयी लोक-परंपराओं का अनूठा संगम देखने को मिला। कलाकारों ने अपनी मनोहारी प्रस्तुतियों से दर्शकों को देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से रूबरू कराया।

राज्योत्सव में मंगलवार की शाम सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का सिलसिला मध्य प्रदेश के लोक एवं जनजातीय नृत्यों से आरंभ हुआ। पारंपरिक वेशभूषा, लोकवाद्यों की मधुर धुनों और लयबद्ध नृत्य-मुद्राओं ने प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता को जीवंत कर दिया। वहीं, जैसलमेर के सुविख्यात लोक गायक मामे खान एवं उनके साथियों की प्रस्तुति ने राजस्थानी लोकसंगीत की माटी की महक और मरुस्थलीय संस्कृति की मिठास से वातावरण को संगीतमय बना दिया। ऊर्जा से भरपूर उनकी आवाज़ और लोकसंगीत की विशिष्ट शैली ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। इस अवसर पर संस्कृति संचालक एनपी नामदेव ने कलाकारों का स्वागत किया।

विभिन्न प्रदर्शनियाँ, देशज व्यंजन मेला, किसान बाज़ार एवं महिला उद्यमिता मंडप आमजन के मुख्य आकर्षण का केंद्र बने रहे। तीन दिनों तक चले इस आयोजन में मध्य प्रदेश की गौरवशाली विरासत, सांस्कृतिक परंपराओं, लोककलाओं और विकास-यात्रा की विविध झलकियों ने प्रदेश के स्थापना दिवस समारोह को एक जन-उत्सव का स्वरूप प्रदान किया।

जनजातीय जीवन के रंगों से गुलज़ार हुआ मंच

समारोह के अंतिम दिन सर्वप्रथम पूर्वरंग में लोक एवं जनजातीय नृत्य प्रस्तुतियाँ हुईं। इसका शुभारंभ भारिया जनजाति के 'भड़म' नृत्य के साथ हुआ। पारंपरिक लय, सामूहिक गति और स्थानीय सांस्कृतिक विशेषताओं से सजी इस प्रस्तुति ने भारिया जनजातीय जीवन के रंगों को मंच पर साकार किया। मोजीलाल डांडोलिया एवं उनके साथियों ने इस नृत्य की प्रस्तुति दी।

इसके बाद कोरकू जनजाति के 'गदली' नृत्य में कोरकू समुदाय की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक नृत्य-संगीत की छटा दिखाई दी, जिसे बुरहानपुर के नीलेश कुमार पटेल एवं उनके साथियों ने प्रस्तुत किया। अगले क्रम में घासी जनजाति के 'घसियाबाजा' नृत्य में लोकवाद्यों की लय और पारंपरिक नृत्य-गतियों के माध्यम से जनजातीय सांस्कृतिक अभिव्यक्ति प्रस्तुत की गई। सिंगरौली के आने लाल एवं उनके साथियों की इस प्रस्तुति को दर्शकों ने खूब सराहा।

इसके पश्चात भारिया जनजाति का 'अहिराई' नृत्य प्रस्तुत हुआ, जो विवाह जैसे मांगलिक अवसरों पर किया जाता है; इसकी प्रस्तुति सीधी के संतोष कुमार यादव एवं उनके साथियों ने दी। तत्पश्चात 'डंडा' नृत्य की प्रस्तुति हुई, जिसमें डंडों की लयबद्ध गति, सामूहिक तालमेल और पारंपरिक संगीत ने दर्शकों को रोमांचित किया। हरदा के विकास शुक्ला एवं उनके साथियों ने इसे प्रस्तुत किया।

पारंपरिक वेशभूषा और ऊर्जावान पदचाल

नृत्य प्रस्तुतियों की इस शृंखला में अन्य राज्यों के लोकनृत्यों की भी प्रस्तुतियाँ हुईं। इसमें सबसे पहले गुजरात की राठवा जनजाति का 'राठ नृत्य' प्रस्तुत किया गया, जिसमें राठवा समुदाय की सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक परंपराओं की झलक देखने को मिली। इसे वडोदरा (बड़ौदा) के बनसिंहभाई चामायड़ा भाई राठवा एवं उनके साथियों ने प्रस्तुत किया। अगले क्रम में बस्तर (छत्तीसगढ़) के माड़िया जनजातीय समुदाय का 'माड़िया नृत्य' प्रस्तुत हुआ, जिसमें बस्तर के सामुदायिक जीवन, पारंपरिक वेशभूषा, लोकसंगीत और सामूहिक नृत्य की परंपरा देखने को मिली; इसे बस्तर के बुटलूराम माथरा एवं उनके साथियों ने प्रस्तुत किया।

महाराष्ट्र राज्य का 'लेझिम नृत्य' भी अत्यंत आकर्षक रहा। पारंपरिक वाद्य लेझिम को हाथों में लेकर कलाकार लयबद्ध गति, सामूहिक तालमेल और ऊर्जावान पदचाल के साथ नृत्य कर रहे थे। मुंबई के दत्ता भोएर एवं उनके साथियों ने महाराष्ट्र की इस लोक-परंपरा से परिचित कराया। इसके बाद तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश क्षेत्र की लोक-परंपराओं से जुड़ा ऊर्जावान वादन-नृत्य 'ओग्गु ढोलू' प्रस्तुत किया गया।

ढोल की प्रभावशाली थाप, सामूहिक गति और लोकसंगीत के माध्यम से इस प्रस्तुति ने दक्षिण भारतीय लोकसंस्कृति का सजीव परिचय कराया; इसकी प्रस्तुति आंध्र प्रदेश के थाला श्रीधर एवं उनके साथियों ने दी। अगले क्रम में राजस्थान के कालबेलिया समुदाय के 'सपेरा नृत्य' की मनमोहक प्रस्तुति जयपुर के सुरमनाथ कालबेलिया एवं उनके साथियों द्वारा दी गई। इन नृत्य प्रस्तुतियों के साथ ही जयपुर के फ़िरोज़ खान एवं उनके साथियों ने बहरूपिया कला का भी शानदार प्रदर्शन किया।

‘केसरिया बालम’ से ‘रेशम का रूमाल’ तक राजस्थानी रंग

मध्य प्रदेश स्थापना दिवस समारोह की अंतिम सांस्कृतिक संध्या में जैसलमेर (राजस्थान) के सुविख्यात लोक गायक मामे खान एवं उनके साथियों ने अपनी सशक्त आवाज़ और अनूठी गायन शैली से सुरों का जादू बिखेरा। जैसलमेर की मरुधरा से निकली लोकसंगीत की सुगंध जब सूफ़ियाना रंगों और समकालीन संगीत की लय से मिली, तो लाल परेड ग्राउंड का वातावरण संगीतमय हो उठा।

15 से अधिक पीढ़ियों की संगीत परंपरा से जुड़े परिवार में पले-बढ़े मामे खान ने पारंपरिक राजस्थानी लोकगायन को देश-दुनिया के मंचों तक पहुँचाने में विशिष्ट पहचान बनाई है। वर्ष 2022 में वे कान्स फिल्म समारोह के रेड कार्पेट पर पहुँचने वाले भारत के पहले लोक गायक बने। मामे खान ने अपनी प्रस्तुति का प्रारंभ ‘केसरिया बालम’ की पारंपरिक मिठास के साथ किया। इसके बाद 'वंदे मातरम्', ‘बावरे’ की मस्ती, ‘चौधरी’ की लोक-लय और ‘बदरी बदरिया’ की सुरमयी छटा ने श्रोताओं को राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ दिया। वहीं ‘छाप तिलक’, ‘साँसों की माला’, ‘दमादम मस्त कलंदर’ और ‘मेरे रश्के क़मर’ जैसी सूफ़ियाना प्रस्तुतियों ने शाम को आध्यात्मिकता एवं आत्मीयता के रंगों से सराबोर कर दिया।

संगीत संध्या में ‘माँ तुझे सलाम’, ‘श्रीकृष्ण गोविंद’, ‘लाल पीली अखियां’, ‘लागी रे लगन’, ‘बंजारा झूम’, ‘तू बूंद-बूंद’, ‘सानू इक पल’ और ‘महादेवा शिवा ट्रिलॉजी’ जैसे गीत भी प्रस्तुत किए गए। अंत में ‘रेशम का रूमाल’ की चंचल लय और लोकरंग ने इस संगीतमय संध्या को यादगार बना दिया।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर

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