


तमिलनाडु के राज्यपाल आर्लेकर ने काशी और तमिलनाडु के हजारों वर्ष पुराने सांस्कृतिक संबंधों को बताया राष्ट्रीय एकता का आधार
चेन्नई, 03 नवंबर (हि.स.)। काशी तमिल संगमम में अब तिरुक्कुरल के ज्ञान से पूरा भारत जुड़ेगा। काशी और तमिलनाडु का संबंध भूगोल की सीमाओं से कहीं आगे भारत की साझा सभ्यता, संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और ज्ञान परंपरा में रचा-बसा है। मंगलवार को काशी तमिल संगमम के 5.0 संस्करण का शंखनाद हुआ।
इस बार आयोजन का केंद्रीय विषय ‘तिरुक्कुरल पायिलोम’ अर्थात ‘आइए, तिरुक्कुरल सीखें’ रखा गया है। 28 नवंबर से 12 दिसंबर 2026 तक आयोजित होने वाले इस संस्करण में तमिल के महान शास्त्रीय ग्रंथ तिरुक्कुरल के अध्ययन, अनुवाद और प्रसार के माध्यम से देशभर के विद्यार्थियों तथा युवाओं को भारतीय जीवन दर्शन से जोड़ने का व्यापक प्रयास किया जाएगा।
रामेश्वरम से काशी तक प्रवाहित होने वाली आस्था की धारा हो अथवा तमिल साहित्य में अभिव्यक्त भारतीय जीवन दर्शन, दोनों क्षेत्रों के बीच सदियों से कायम सांस्कृतिक एकात्मता भारत की विविधता में निहित एकता का जीवंत प्रमाण है। इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध को नई पीढ़ी तक पहुंचाने तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को देशव्यापी संवाद का विषय बनाने की दिशा में काशी तमिल संगमम का पांचवां संस्करण एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है।
इस कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता कर रहे तमिलनाडु के राज्यपाल थिरु राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने काशी और तमिलनाडु के हजारों वर्ष पुराने सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक संबंधों को भारत की राष्ट्रीय एकता का आधार बताया। उन्होंने कहा कि काशी और तमिलनाडु सांस्कृतिक, पारंपरिक और ऐतिहासिक रूप से सदैव एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं। हमारे पूर्वजों की अपने देवी-देवताओं के प्रति गहरी श्रद्धा थी और उन्हें विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी का भी ज्ञान था। काशी विश्वनाथ और रामेश्वरम के बीच का संबंध भारत में हजारों वर्षों से विद्यमान सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय एकरूपता को दर्शाता है।
राज्यपाल आर्लेकर ने कहा कि काशी तमिल संगमम बार-बार इस बात का स्मरण कराता है कि भारत सदैव से एक संस्कृति और एक सभ्यतागत चेतना वाला राष्ट्र रहा है। रामेश्वरम में गंगाजल ले जाने से लेकर रामेश्वरम का पवित्र जल गंगा में प्रवाहित करने तक हमारी परंपराएं उस गहरे भावनात्मक और आध्यात्मिक संबंध को अभिव्यक्त करती हैं, जो देश के अलग-अलग क्षेत्रों को एक सूत्र में बांधता है। ऐसे आयोजन भारत की सांस्कृतिक और वैचारिक एकता को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
इस अवसर पर आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामाकोटी ने कहा कि इस आयोजन का प्रमुख उद्देश्य भारत की ओर से विश्व को दिए गए सबसे मूल्यवान साहित्यिक और दार्शनिक योगदानों में शामिल थिरुक्कुरल को वैश्विक स्तर पर पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि ‘थिरुक्कुरल पायिलोम’ की संकल्पना के माध्यम से काशी के विद्यार्थियों और युवाओं को इस महान ग्रंथ का अध्ययन करने तथा शोध पत्रों के माध्यम से इसके विचारों और जीवन मूल्यों का अन्वेषण करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। यह प्रयास थिरुक्कुरल में निहित शाश्वत मानवीय मूल्यों को विश्व के साथ साझा करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
उन्होंने कहा कि इस बार काशी तमिल संगमम का विशेष केंद्र युवाओं और विद्यार्थियों की सहभागिता होगी। आयोजन के माध्यम से उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को अपनी मातृभाषाओं के माध्यम से थिरुक्कुरल से जुड़ने का अवसर दिया जाएगा। इसके लिए राष्ट्रव्यापी छात्र सहभागिता अभियान की परिकल्पना की गई है। इसके अंतर्गत विद्यार्थी इस ग्रंथ का अध्ययन करेंगे, उसमें निहित नैतिकता, जीवन दर्शन, सामाजिक व्यवहार, शासन व्यवस्था और मानवीय संबंधों से जुड़े विचारों को समझेंगे तथा अपने शैक्षणिक संस्थानों में इन मूल्यों के प्रसार के लिए प्रेरित होंगे। शैक्षणिक गतिविधियों, बहुभाषी अध्ययन सामग्री और डिजिटल माध्यमों के जरिए थिरुक्कुरल को तमिल भाषा की साहित्यिक विरासत से आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने का प्रयास किया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि कवि और दार्शनिक तिरुवल्लुवर द्वारा रचित थिरुक्कुरल तमिल साहित्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण शास्त्रीय कृतियों में शामिल है। इसमें 1330 दोहे हैं, जिन्हें तीन प्रमुख भागों अरम, पोरुल और इन्बम में व्यवस्थित किया गया है। अरम में सद्गुण, नैतिकता और आदर्श आचरण की चर्चा है, पोरुल में धन, शासन, सामाजिक व्यवस्था और सार्वजनिक जीवन से जुड़े विचार हैं, जबकि इन्बम में प्रेम और मानवीय संबंधों का दार्शनिक पक्ष सामने आता है। इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि इसमें प्रस्तुत जीवन मूल्य किसी एक क्षेत्र, समुदाय अथवा कालखंड तक सीमित नहीं हैं। मानवीय आचरण, सामाजिक उत्तरदायित्व, सुशासन और नैतिक जीवन से जुड़े इसके विचार व्यापक मानवीय अनुभवों को संबोधित करते हैं। यही कारण है कि काशी तमिल संगमम के पांचवें संस्करण में इसे सांस्कृतिक और शैक्षणिक संवाद का केंद्र बनाया गया है।
इस आयोजन में तमिलनाडु से लगभग 1400 प्रतिनिधियों के शामिल होने की उम्मीद है। इन्हें लगभग 200 प्रतिभागियों के सात समूहों में विभाजित किया जाएगा। प्रत्येक समूह आठ दिवसीय यात्रा करेगा। इस दौरान प्रतिभागियों को काशी, प्रयागराज और अयोध्या के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्थलों का भ्रमण कराया जाएगा। शैक्षणिक चर्चाएं, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और विरासत से जुड़े कार्यक्रम इस यात्रा का हिस्सा होंगे। इसके माध्यम से तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश के विद्यार्थियों, शिक्षकों, विद्वानों, कलाकारों, पेशेवरों तथा विभिन्न सामाजिक वर्गों के लोगों के बीच प्रत्यक्ष संवाद और अनुभवों का आदान-प्रदान होगा।
जानकारी के अनुसार, प्रतिनिधियों की भागीदारी को समाज के व्यापक स्वरूप से जोड़ने के लिए सात श्रेणियां निर्धारित की गई हैं। इनमें विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक एवं मीडिया पेशेवर, कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों के प्रतिनिधि, पेशेवर एवं पारंपरिक कारीगर, महिलाएं तथा आध्यात्मिक और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों से जुड़े लोग शामिल होंगे। विद्यार्थियों में विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, तकनीकी और कौशल विकास संस्थानों के छात्र शामिल होंगे। शिक्षकों की श्रेणी में विद्यालय एवं महाविद्यालय के अध्यापक, शिक्षक प्रशिक्षु और शिक्षाविदों को स्थान दिया जाएगा। लेखक, पत्रकार, प्रकाशक, संपादक और डिजिटल मीडिया से जुड़े पेशेवर भी इस सांस्कृतिक संवाद का हिस्सा बनेंगे।
साथ ही कृषि क्षेत्र से किसान, कृषि विज्ञान के विद्यार्थी, पशुपालन और मत्स्य पालन से जुड़े प्रतिनिधियों को अवसर मिलेगा। इसी प्रकार उद्यमियों, स्टार्टअप से जुड़े लोगों, कुशल श्रमिकों, पारंपरिक कारीगरों, स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं और स्वरोजगार से जुड़ी महिलाओं की सहभागिता भी सुनिश्चित की जाएगी। आध्यात्मिक श्रेणी में वैदिक अध्ययन, शास्त्रीय संगीत, पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों, धार्मिक परंपराओं और मंदिरों से जुड़े लोगों को शामिल किया जाएगा।
काशी तमिल संगमम का पांचवां संस्करण अपने पूर्ववर्ती चार आयोजनों से प्राप्त अनुभवों को आगे बढ़ाते हुए तमिल शास्त्रीय साहित्य को सांस्कृतिक संवाद का प्रमुख आधार बना रहा है। इस पहल की शुरुआत वर्ष 2022 में आजादी का अमृत महोत्सव के अवसर पर हुई थी। तब से अब तक इसके चार संस्करण आयोजित किए जा चुके हैं। इन आयोजनों के माध्यम से तमिलनाडु और काशी के बीच शैक्षणिक संवाद, सांस्कृतिक कार्यक्रम, ऐतिहासिक स्थलों के भ्रमण और जन-जन के संपर्क को बढ़ावा मिला है। पांचवें संस्करण में इस संवाद को थिरुक्कुरल के अध्ययन और उसके बहुभाषी प्रसार से नई दिशा देने की तैयारी है।
इस पहल के पीछे भारत सरकार की ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को मजबूत करने का व्यापक उद्देश्य भी जुड़ा है। भारत की सांस्कृतिक विविधता को समझने का सबसे प्रभावी माध्यम विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों की ज्ञान परंपराओं के बीच संवाद स्थापित करना है।
आपको बतादें कि तमिल साहित्य की महान कृति थिरुक्कुरल को देशभर के विद्यार्थियों तक पहुंचाने का प्रयास इसी दिशा में महत्वपूर्ण है। इससे एक क्षेत्र की साहित्यिक विरासत दूसरे क्षेत्र के विद्यार्थियों और समाज के लिए भी अध्ययन तथा चिंतन का विषय बनेगी। काशी और तमिलनाडु के बीच ऐतिहासिक संबंधों को नई पीढ़ी के अनुभवों से जोड़ने वाला यह आयोजन भारतीय सभ्यता की उस निरंतरता को रेखांकित करता है, जिसमें भाषाएं अलग होते हुए भी जीवन के मूल मूल्य और सांस्कृतिक चेतना एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। वहीं, काशी तमिल संगमम 5.0 के कार्यक्रम, सहभागिता और पंजीकरण से जुड़ी विस्तृत जानकारी आधिकारिक वेबसाइट https://kashitamil.iitm.ac.in/ पर उपलब्ध है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी