नई दिल्ली, 05 नवम्बर (हि.स.)। भारत की समृद्ध सभ्यतागत और ज्ञान परंपरा को एक बड़ी वैश्विक पहचान मिली है। कश्मीर के इतिहासकार कल्हण की 12वीं शताब्दी की कृति ‘राजतरंगिणी’, महाकाव्य महाभारत और कौटिल्य के अर्थशास्त्र को यूनेस्को के ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रीजनल रजिस्टर फॉर एशिया एंड द पैसिफिक’ (एमओडब्ल्यूसीएपी) में शामिल किया गया है।
इंडोनेशिया के जकार्ता में आयोजित एमओडब्ल्यूसीएपी के 11वें सत्र के दौरान इन तीनों कालजयी ग्रंथों को यह प्रतिष्ठित मान्यता प्रदान की गई। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने गुरुवार को यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इन ग्रंथों के नामांकन के लिए डोजियर तैयार करने में आईजीएनसीए की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
इन ग्रंथों का एक विशेष महत्व है। इनमें राजतरंगिणी का 12वीं शताब्दी में रचित यह ग्रंथ कश्मीर के राजाओं और राजनीतिक-सामाजिक इतिहास का क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत करता है। महाभारत महाकाव्य केवल युद्ध की गाथा नहीं, बल्कि धर्म, कर्तव्य, न्याय और मानवीय मूल्यों का व्यापक और शाश्वत दार्शनिक विमर्श है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र प्राचीन भारत की राजनीतिक, प्रशासनिक दूरदर्शिता, कूटनीति और राज्य संचालन के सिद्धांतों का असाधारण दस्तावेज है। इस नवीन उपलब्धि के साथ ही इस क्षेत्रीय रजिस्टर में भारत की कुल प्रविष्टियों की संख्या बढ़कर छह हो गई है।
डॉ जोशी का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में चलाई जा रही ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ जैसी पहलें देश की पांडुलिपि विरासत के संरक्षण, संवर्धन और डिजिटलीकरण में अहम भूमिका निभा रही हैं। यूनेस्को की यह मान्यता यह रेखांकित करती है कि भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत केवल एक देश तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की साझा वैश्विक धरोहर है।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी