
दिल्ली के पास राजमार्ग पर 36 हजार से अधिक वाहनों और 90 लाख लोकेशन डेटा का विश्लेषण
नई दिल्ली, 05 नवंबर (हि.स.)। भारतीय सड़कों पर यातायात की अव्यवस्थित आवाजाही, वाहनों की विविधता और अचानक लगने वाले जाम की समस्या को समझने के लिए अब ड्रोन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद ली जा रही है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने दिल्ली के निकट एक राजमार्ग पर ड्रोन से जुटाए गए उच्च गुणवत्ता वाले यातायात आंकड़ों का विश्लेषण कर भारत की सड़क परिस्थितियों के अनुकूल नए यातायात प्रवाह मॉडल विकसित किए हैं।
गौरतलब है कि इस शोध में 36 हजार से अधिक वाहनों और लगभग 90 लाख वाहन-स्थिति संबंधी आंकड़ों का अध्ययन किया गया। इसके आधार पर वैज्ञानिकों ने छह गणितीय मॉडल और दो मशीन लर्निंग मॉडल तैयार किए हैं, जो यातायात के घनत्व, वाहनों की गति और उनके बीच की दूरी के बदलते संबंधों को समझने के साथ संभावित जाम का पूर्वानुमान लगाने में उपयोगी हो सकते हैं। इस शोध की विशेषता यह है कि इसमें भारतीय सड़कों पर दिखाई देने वाली वास्तविक परिस्थितियों और वाहनों की विविधता को मॉडल तैयार करने का आधार बनाया गया है।
आईआईटी गुवाहाटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर अखिलेश के. मौर्य के नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया। इसमें शोधार्थी शेखर सिंह और सूर्य एच. रविकुमार ने भी योगदान दिया। शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम्स रिसर्च में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन का उद्देश्य ऐसे यातायात मॉडल विकसित करना है, जो भारतीय सड़कों पर वाहनों की वास्तविक आवाजाही और उनके बीच होने वाली जटिल अंतःक्रियाओं को अधिक सटीकता से समझ सकें।
पश्चिमी देशों के मॉडल भारतीय सड़कों पर पूरी तरह कारगर नहीं
शोधकर्ताओं शेखर सिंह और सूर्य एच. रविकुमार के अनुसार, वर्तमान में प्रचलित अनेक यातायात प्रवाह मॉडल उन देशों की सड़क परिस्थितियों के आधार पर विकसित किए गए हैं, जहां वाहन अपेक्षाकृत एकसमान होते हैं और यातायात का संचालन अधिक व्यवस्थित तरीके से होता है। भारतीय सड़कों की स्थिति इससे काफी अलग है। यहां दोपहिया, तिपहिया, कार, बस और भारी वाहन एक ही सड़क पर चलते हैं। कई स्थानों पर पैदल यात्रियों की आवाजाही भी इसी यातायात व्यवस्था का हिस्सा होती है। वाहनों के आकार, गति, उनके बीच की दूरी और सड़क पर चलने के तरीके में व्यापक अंतर रहता है।
ऐसी परिस्थितियों में यातायात का व्यवहार किसी एक निश्चित गणितीय संबंध से समझना कठिन हो जाता है। पारंपरिक मॉडल अक्सर यह मानकर चलते हैं कि समान यातायात घनत्व पर वाहनों की गति लगभग एक जैसी होगी, जबकि भारतीय सड़कों पर ऐसा जरूरी नहीं है। यहां एक ही घनत्व की स्थिति में भी वाहन अलग-अलग गति से चल सकते हैं। यही कारण है कि भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप अलग आंकड़ों और वैज्ञानिक मॉडल की आवश्यकता महसूस की गई।
ड्रोन से जुटाया गया विशाल यातायात डेटाबेस
इस चुनौती का समाधान खोजने के लिए शोध दल ने दिल्ली के बाहरी इलाके में स्थित आठ लेन वाले विभाजित राजमार्ग को अध्ययन के लिए चुना। इस राजमार्ग पर चौड़े पक्के शोल्डर भी उपलब्ध थे। शोधकर्ताओं ने दिन के समय ड्रोन के माध्यम से यातायात की वीडियो रिकॉर्डिंग की। इससे सड़क के बड़े हिस्से पर एक साथ वाहनों की आवाजाही, उनकी स्थिति, गति और आपसी दूरी का सूक्ष्म विश्लेषण संभव हुआ।
ड्रोन आधारित डेटा संग्रह की विशेषता यह है कि इससे किसी एक वाहन को अलग से देखने के बजाय सड़क के पूरे हिस्से पर यातायात के सामूहिक व्यवहार का अध्ययन किया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने इस तकनीक के माध्यम से 36 हजार से अधिक वाहनों और लगभग 90 लाख वाहन-स्थिति संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया। इस विशाल डेटासेट ने उन्हें यह समझने में मदद की कि सड़क पर वाहनों की संख्या बढ़ने के साथ उनकी गति और आपसी दूरी किस प्रकार बदलती है।
प्रोफेसर अखिलेश कुमार मौर्य ने भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप यातायात आंकड़ों की आवश्यकता पर कहा, भारत में यातायात की स्थिति उन कई देशों से अलग है, जहां मौजूदा यातायात मॉडल विकसित किए गए हैं। हमें ऐसे यातायात डेटा की आवश्यकता है, जो भारतीय सड़कों की विविधता और विशेषताओं को दर्शाता हो। ड्रोन आधारित डेटा संग्रह से उच्च स्थानिक और लौकिक रिजॉल्यूशन पर सड़क के एक खंड पर बड़ी संख्या में वाहनों और उनकी गतिविधियों का अवलोकन करने का अवसर मिलता है।
भारी यातायात में बदल जाता है वाहनों की दूरी का गणित
उन्होंने बताया कि अध्ययन में यातायात घनत्व और वाहनों के बीच की दूरी को लेकर कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आए। शोधकर्ताओं ने पाया कि जब सड़क पर यातायात कम होता है तो वाहन एक-दूसरे से अधिक दूरी बनाकर चलते हैं। जैसे-जैसे वाहनों की संख्या बढ़ती है, उनके बीच की दूरी घटने लगती है और वाहन अपेक्षाकृत करीब आ जाते हैं। वहीं, शोध में यह भी सामने आया कि जाम लगने से पहले प्रत्येक लेन से लगभग 3,000 वाहन गुजर रहे थे। वहीं, जब यातायात पूरी तरह रुकने की स्थिति में पहुंचा तो सड़क की पूरी चौड़ाई में प्रति किलोमीटर लगभग 900 वाहनों का घनत्व दर्ज किया गया। ये आंकड़े यातायात की क्षमता और भीड़भाड़ के स्तर को समझने के लिए महत्वपूर्ण आधार उपलब्ध कराते हैं।
आठ मॉडल से तैयार होगा अधिक यथार्थवादी पूर्वानुमान
शोधकर्ताओं ने एकत्रित आंकड़ों के आधार पर छह गणितीय मॉडलों का परीक्षण किया और दो मशीन लर्निंग मॉडल को प्रशिक्षित किया। इनका उद्देश्य यातायात की स्थिति का आकलन करने के साथ वाहनों की संभावित गति का पूर्वानुमान लगाना था। इस शोध की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वैज्ञानिकों ने वाहनों की गति के लिए कोई एक निश्चित मान निर्धारित करने के बजाय संभावित गति की विस्तृत सीमा का अनुमान लगाने वाले मॉडल विकसित किए। इससे भारतीय सड़कों पर मौजूद अनिश्चितता और विविधता को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।
प्रोफेसर मौर्य के अनुसार, विश्वसनीय यातायात प्रबंधन की शुरुआत ऐसे मॉडलों से होती है, जो भारतीय सड़कों पर यातायात के वास्तविक व्यवहार को प्रदर्शित कर सकें। ड्रोन से प्राप्त उच्च गुणवत्ता वाले प्रक्षेप पथ संबंधी आंकड़े विभिन्न प्रकार के वाहनों के बीच परस्पर क्रिया और उनकी गति में व्यापक भिन्नता को समझने में मदद करते हैं। इससे अधिक वास्तविक यातायात सिमुलेशन, बेहतर सड़क एवं चौराहा डिजाइन, भीड़ प्रबंधन और सड़क क्षमता के मूल्यांकन में सहायता मिल सकती है।
स्मार्ट सिटी और डिजिटल ट्रैफिक प्रबंधन में भी उपयोग
इस शोध का भविष्य में उपयोग शहरी यातायात प्रबंधन की कई महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं में हो सकता है। भारत के बड़े शहरों में बढ़ते वाहन दबाव के कारण ट्रैफिक जाम, ईंधन की खपत, वायु प्रदूषण और यात्रा समय जैसी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित मॉडल यातायात नियंत्रण को अधिक प्रभावी बनाने में सहायक हो सकते हैं।
इनका उपयोग स्मार्ट ट्रैफिक सिग्नल, अनुकूली यातायात प्रबंधन, सड़क की क्षमता का आकलन, आपातकालीन वाहनों के लिए रास्ता उपलब्ध कराने और भविष्य की सड़क परियोजनाओं की योजना बनाने में किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त शहरी यातायात का डिजिटल ट्विन तैयार करने में भी ऐसे आंकड़े महत्वपूर्ण होंगे। डिजिटल ट्विन के माध्यम से किसी शहर की सड़क व्यवस्था का आभासी मॉडल तैयार कर विभिन्न यातायात परिस्थितियों का पहले ही परीक्षण किया जा सकेगा।
भविष्य में कनेक्टेड और स्वचालित वाहनों के संचालन तथा उनकी सुरक्षा का मूल्यांकन करने में भी भारत-विशिष्ट यातायात मॉडल उपयोगी हो सकते हैं। इस तरह से यह शोध भारतीय सड़कों की वास्तविकताओं को वैज्ञानिक मॉडलिंग में शामिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है। इसकी खासियत यही है कि यातायात को किसी आदर्श और व्यवस्थित व्यवस्था के रूप में देखने के बजाय उसकी वास्तविक विविधता, अनिश्चितता और जटिलता को समझने का प्रयास किया गया है। इससे भविष्य में भारत की जरूरतों के अनुरूप अधिक व्यावहारिक और प्रभावी यातायात प्रबंधन प्रणालियां विकसित करने का आधार तैयार होगा, अब यह सुनिश्चित हो गया है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी