भारत ने विकसित की ‘यांत्रिक बुद्धिमत्ता’ जिसमें संरचना स्वयं बदलेगी अपनी अवस्था

05 Nov 2026 20:49:53
बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (बीआईटीएस) पिलानी के सहायक प्रोफेसर डॉ. हेमंत शर्मा


भारत, दक्षिण कोरिया और चीन के वैज्ञानिकों का बहु-संस्थागत शोध

मशीनों, वाहनों और सटीक उपकरणों की सुरक्षा में मिलेगी मदद

नई दिल्ली, 05 नवंबर (हि.स.)। मशीनों, वाहनों और अत्याधुनिक उपकरणों को कंपन से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए अब सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रक और बाहरी बिजली पर निर्भरता कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सफलता मिली है।

बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (बीआईटीएस) पिलानी के सहायक प्रोफेसर डॉ. हेमंत शर्मा सहित भारत, दक्षिण कोरिया और चीन के शोधकर्ताओं की बहु-संस्थागत टीम ने ‘यांत्रिक बुद्धिमत्ता’ (मैकेनिकल इंटेलिजेंस) पर आधारित एक ऐसी नवीन तकनीक प्रदर्शित की है, जिसमें कोई संरचना स्वयं अपनी गति और यांत्रिक ऊर्जा के आधार पर बदलती कंपन परिस्थितियों के अनुरूप अपनी अवस्था बदल सकती है।

दरअसल, इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके लिए बाहरी सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण प्रणाली, एक्चुएटर अथवा बिजली की आवश्यकता नहीं होती। प्रतिष्ठित इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मैकेनिकल साइंसेज में प्रकाशित यह शोध भविष्य में मशीनों, परिवहन प्रणालियों, औद्योगिक उपकरणों और सटीक इंजीनियरिंग संरचनाओं को कंपन से सुरक्षा देने के नए रास्ते खोल सकता है।

शोध का मूल विचार यह है कि किसी मशीन या संरचना को बाहरी निर्देश देकर कंपन से बचाने के बजाय उसकी बनावट में ही इतनी अनुकूलन क्षमता विकसित कर दी जाए कि वह प्रतिकूल परिस्थितियों को स्वयं पहचानकर अपनी यांत्रिक अवस्था बदल सके। सामान्यतः कंपन नियंत्रण के लिए इस्तेमाल होने वाली निष्क्रिय प्रणालियां पहले से निर्धारित परिचालन परिस्थितियों के अनुसार तैयार की जाती हैं। ऐेसे में परिस्थितियों में बदलाव होने पर उनकी प्रभावशीलता कम हो सकती है।

दूसरी ओर सक्रिय नियंत्रण प्रणालियों में सेंसर, नियंत्रक, एक्चुएटर और बाहरी ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इससे उपकरणों की लागत, जटिलता और रखरखाव बढ़ जाता है। नए शोध में वैज्ञानिकों ने इसी चुनौती का समाधान संरचना के भीतर ही अनुकूलन क्षमता विकसित करके खोजने का प्रयास किया है।

अनुनाद की स्थिति में स्वयं बदल लेगी संरचना अपनी अवस्था

इस तकनीक की वैज्ञानिक विशेषता इसके स्वत: अवस्था परिवर्तन के सिद्धांत में छिपी है। जब किसी संरचना पर कंपन का प्रभाव असहनीय होने लगता है और वह अनुनाद (रेजोनेंस) के निकट पहुंचती है, तब उसकी अपनी गति और उसमें संचित यांत्रिक ऊर्जा एक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तन को प्रेरित कर सकती है। इस परिवर्तन के दौरान संरचना की प्रभावी कठोरता और अनुनादी व्यवहार बदल जाता है। परिणामस्वरूप वह अवांछित कंपन की स्थिति से स्वयं को दूर ले जाने में सक्षम होती है। इससे अत्यधिक कंपन की प्रतिक्रिया कम हो सकती है।

आपको बतादें कि आमतौर पर किसी उपकरण में कंपन की तीव्रता और आवृत्ति का पता लगाने के लिए सेंसर लगाए जाते हैं। इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रक प्राप्त आंकड़ों के आधार पर एक्चुएटर को निर्देश देते हैं कि वह कंपन को नियंत्रित करे। इस पूरी प्रक्रिया में ऊर्जा की खपत होती है और कई इलेक्ट्रॉनिक घटकों की आवश्यकता पड़ती है। शोधकर्ताओं की नई अवधारणा इस पूरी व्यवस्था को संरचना की आंतरिक यांत्रिक क्षमता से प्रतिस्थापित करने की संभावना प्रस्तुत करती है।

कंप्यूटेशनल डिजाइन से प्रयोगशाला तक पहुंचा शोध

शोध दल ने पहले गणनात्मक डिजाइन और अनुकूलन (कम्प्यूटेशनल डिजाइन एंड ऑप्टिमाइजेशन) के माध्यम से ऐसी यांत्रिक संरचना तैयार की, जो अलग-अलग स्थिर अवस्थाओं को बनाए रखने में सक्षम हो। इसके बाद उसका प्रोटोटाइप तैयार कर स्थैतिक और गतिशील प्रयोगों के माध्यम से परीक्षण किया गया। इन परीक्षणों में यह प्रदर्शित हुआ कि संरचना दो अलग-अलग अवस्थाओं में स्थिर रह सकती है और कंपन की परिस्थितियों में बदलाव आने पर स्वतः एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जा सकती है।

इस शोध की प्रयोगात्मक पुष्टि में दक्षिण कोरिया की सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर जिनक्यू यांग की प्रयोगशाला की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वहां परिष्कृत प्रयोगात्मक विश्लेषण और भौतिक प्रदर्शन के माध्यम से इस अवधारणा की व्यावहारिक क्षमता की जांच की गई। प्रयोगों ने यह स्थापित करने में मदद की कि यांत्रिक संरचना के भीतर ही अनुकूलनशील व्यवहार विकसित करना संभव है।

चार प्रमुख संस्थानों के वैज्ञानिकों का संयुक्त प्रयास

यह शोध भारत, दक्षिण कोरिया और चीन के वैज्ञानिकों के सहयोग से पूरा हुआ है। इसमें बीआईटीएस पिलानी, सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी, कोरिया इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी और शंघाई जियाओ टोंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने योगदान दिया है। बीआईटीएस पिलानी के सहायक प्रोफेसर डॉ. हेमंत शर्मा ने शोध की अवधारणा तैयार करने, वैज्ञानिक पर्यवेक्षण, गहन समीक्षा और शोधपत्र को अंतिम रूप देने में योगदान दिया। वहीं प्रोफेसर जिनक्यू यांग की प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगात्मक परीक्षणों ने विकसित संरचना की वास्तविक कार्यक्षमता को प्रमाणित करने में अहम भूमिका निभाई।

शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मैकेनिकल साइंसेज में प्रकाशित हुए हैं। यह अध्ययन इंजीनियरिंग के उस उभरते क्षेत्र को आगे बढ़ाता है, जिसमें बुद्धिमत्ता को इलेक्ट्रॉनिक सॉफ्टवेयर या बाहरी नियंत्रण तक सीमित रखने के बजाय किसी वस्तु की भौतिक बनावट और यांत्रिक व्यवहार में ही समाहित करने पर काम हो रहा है।

उद्योग से लेकर परिवहन तक व्यापक उपयोग की संभावना

इस तकनीक का महत्व इसके संभावित औद्योगिक अनुप्रयोगों में भी है। मशीनों में लगातार होने वाले कंपन से उनके पुर्जों की टूट-फूट बढ़ती है, उत्पादन की सटीकता प्रभावित होती है और रखरखाव की लागत बढ़ जाती है। वाहनों में कंपन यात्रियों के आराम, उपकरणों की कार्यक्षमता और संरचनात्मक मजबूती को प्रभावित करता है। इसी प्रकार चिकित्सा उपकरणों, प्रयोगशाला के सटीक यंत्रों और संवेदनशील औद्योगिक मशीनों में कंपन का नियंत्रण अत्यंत आवश्यक होता है।

ऐसी परिस्थितियों में स्वयं अनुकूलित होने वाली यांत्रिक संरचनाएं उपकरणों को अधिक विश्वसनीय और टिकाऊ बनाने में उपयोगी हो सकती हैं। सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण पर निर्भरता घटने से प्रणाली की जटिलता तथा रखरखाव की जरूरत भी कम हो सकती है। साथ ही बाहरी ऊर्जा की आवश्यकता घटने से ऊर्जा दक्षता बढ़ाने की संभावना है।

इस शोध की विशेषता यह है कि यह मशीनों को अधिक बुद्धिमान बनाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की संख्या बढ़ाने के बजाय उनकी मूल संरचना में ही बुद्धिमत्ता विकसित करने की अवधारणा सामने रखता है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह मैकेनिकल इंजीनियरिंग में एक महत्वपूर्ण दिशा है, जहां किसी संरचना का आकार, उसकी कठोरता और यांत्रिक ऊर्जा ही उसके अनुकूलन का आधार बन सकते हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

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