
नई दिल्ली, 16 फरवरी (हि.स.)। देशभर में आवारा कुत्तों के प्रबंधन को लेकर छिड़ी बहस के बीच सोमवार को दिल्ली स्थित प्रेस क्लब में एक उच्चस्तरीय पैनल चर्चा आयोजित की गई।
पैनल में विभिन्न दलों के सांसदों, कानूनी विशेषज्ञों और प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। चर्चा का मुख्य उद्देश्य कुत्तों के प्रबंधन के लिए एक मानवीय, संवैधानिक और राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत समाधान तैयार करना था।
पैनल ने स्वीकार किया कि अदालती फैसलों और समाज के बंटवारे के कारण पशु प्रेमियों और कुत्तों को हटाने की मांग करने वालों के बीच खाई गहरी हुई है। इसका खमियाजा न केवल बेजुबानों को भुगतना पड़ रहा है, बल्कि तेलंगाना जैसी जगहों से जानवरों और उनका भरण-पोषण करने वालों पर हिंसक हमलों की खबरें भी सामने आई हैं। वक्ताओं ने कहा कि पशु जन्म नियंत्रण प्रोग्राम को अब तक न तो पर्याप्त कोष मिला है और न ही इसे सही से लागू किया गया है। मास शेल्टरिंग (बड़े पैमाने पर बाड़े बनाना) कोई टिकाऊ या मानवीय समाधान नहीं है।
इस मौके पर कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने कहा कि जानवरों के प्रति क्रूरता भविष्य में इंसानों के प्रति हिंसा का संकेत होती है। उन्होंने बताया कि केंद्र और राज्य सरकारों ने पिछले पांच वर्षों में कार्यान्वयन के लिए पर्याप्त बजट नहीं दिया है।
शिवसेना (यूबीटी) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने मानव-पशु संघर्ष को जिम्मेदारी से सुलझाने पर जोर दिया। उन्होंने बृहन्मुंबई नगर निगम के मॉडल का जिक्र करते हुए सुझाव दिया कि नसबंदी और टीकाकरण के लिए एआई टूल्स और ट्रांसपेरेंट डैशबोर्ड का उपयोग हो। सार्वजनिक-निजी भागीदारी और क्रॉस-पार्टी सहयोग से एक संरचित बजट बनाया जाए।
कांग्रेस सांसद अनीश गवांडे ने महाराष्ट्र का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि यह समस्या दरअसल नगरपालिका शासन की विफलता है। उन्होंने जनता से अपील की कि वे प्रशासन पर एबीसी नियमों को सही ढंग से लागू करने के लिए राजनीतिक दबाव बनाएं।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी