
भोपाल, 16 फ़रवरी (हि.स.)। यदि किसी देश की जनसंख्या युवा और सक्रिय नहीं है तो उसकी जीडीपी में गिरावट आना स्वाभाविक है। इसके विपरीत, यदि जनसांख्यिकीय संरचना मजबूत और संतुलित है, तो आर्थिक विकास को गति मिलती है। वर्तमान में भारत की जीडीपी वृद्धि दर लगभग 7.3 से 7.4 प्रतिशत है और इसके पीछे सबसे बड़ा कारण देश की विशाल युवा आबादी है, जोकि आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभा रही है। यह बात स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-आयोजक सतीश कुमार ने कही। वे सोमवार को कुशाभाऊ ठाकरे अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सभागार में आयोजित ‘स्वदेशी फॉर अभ्युदय’ विषय पर हुए उद्योग सम्मेलन में बोल रहे थे।
भोपाल में ऑर्गेनाइजर वीकली द्वारा आयोजित अभ्युदय लीडरशिप कॉन्क्लेव में सतीश कुमार ने देश की आर्थिक प्रगति और जनसंख्या संरचना के बीच गहरे संबंध पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था केवल संसाधनों या नीतियों से नहीं, बल्कि उसकी जनसंख्या की संरचना से भी तय होती है। उनका मानना है कि यदि किसी देश की आबादी युवा और ऊर्जावान है, तो उसकी उत्पादकता बढ़ती है और इसका सीधा असर जीडीपी पर पड़ता है।
चीन का उदाहरण और चेतावनी
उन्होंने चीन का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां की अर्थव्यवस्था पर बढ़ती उम्र वाली आबादी का असर दिखाई देने लगा है। समाज बूढ़ा हो रहा है और पर्याप्त संख्या में नए बच्चे जन्म नहीं ले रहे हैं, जिसके कारण श्रमशक्ति कम हो रही है। यह स्थिति किसी भी देश के लिए चेतावनी हो सकती है, क्योंकि जनसंख्या का संतुलन बिगड़ने से आर्थिक विकास की गति धीमी हो जाती है।
लक्ष्य निर्धारण की आवश्यकता
सतीश कुमार ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति, समाज, राष्ट्र या संपूर्ण मानवता प्रगति करना चाहती है, तो उसके सामने एक स्पष्ट लक्ष्य होना जरूरी है। बिना लक्ष्य के प्रयास दिशाहीन हो जाते हैं। इसी सोच के साथ भारत ने ‘विकसित भारत @ 2047’ का संकल्प लिया है, जो देश को एक मजबूत, समृद्ध और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने की दिशा में मार्गदर्शन करता है।
भारतीय विकास मॉडल की दार्शनिक प्रेरणा
उन्होंने कहा कि भारत के विकास का आदर्श केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें भारतीय दर्शन में भी हैं। 1960 के दशक में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ‘एकात्म मानव दर्शन’ का विचार प्रस्तुत किया था, जो मानव-केंद्रित विकास का मार्ग दिखाता है। इसी दर्शन से भारतीय विकास मॉडल की नींव रखी गई, जिसमें समाज, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का संतुलित समन्वय शामिल है। इसके साथ ही उनका कहना रहा कि आज सरकार उसी दर्शन को अपने तरीके से ‘विकसित भारत 2047’ के रूप में प्रस्तुत कर रही है। वहीं ऑर्गेनाइजर वीकली इस व्यापक दृष्टि को ‘अभ्युदय’ की संज्ञा देता है। इसका अर्थ केवल आर्थिक समृद्धि नहीं, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण है जो नैतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से भी महान हो।
युवा शक्ति भारत की सबसे बड़ी ताकत
इस दौरान सतीश कुमार ने जोर देकर कहा कि भारत की 7.4 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि का एक बड़ा कारण यह है कि देश न केवल दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला राष्ट्र है, बल्कि सबसे बड़ी युवा आबादी भी यहां है। यह युवा वर्ग देश की ऊर्जा, नवाचार और उत्पादन क्षमता का प्रमुख स्रोत है। यदि इस शक्ति का सही दिशा में उपयोग किया जाए, तो भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।
परिवार संरचना और सामाजिक समृद्धि
उन्होंने यह भी कहा कि परिवार की संरचना का भी राष्ट्र की प्रगति से गहरा संबंध होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जिन परिवारों में तीन बच्चे होते हैं, वे अधिक संतुलित और स्थिर माने जाते हैं। उनके अनुसार, ऐसी पारिवारिक संरचना समाज और राष्ट्र दोनों की समृद्धि का आधार बन सकती है।
टीएफआर का महत्व और भविष्य की दिशा
अपने संबोधन के अंत में सतीश कुमार ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि भारत अपनी आर्थिक वृद्धि और समृद्धि को लंबे समय तक बनाए रखना चाहता है, तो उसकी कुल प्रजनन दर (टीएफआर) 2.1 से ऊपर रहना बेहद आवश्यक है। यह केवल जनसंख्या बढ़ाने का सवाल नहीं, बल्कि भविष्य की श्रमशक्ति, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक संतुलन से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने कहा कि संतुलित जनसंख्या संरचना ही देश को मजबूत, आत्मनिर्भर और दीर्घकालिक रूप से विकसित बना सकती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी