भारत की नीति पड़ोसी देशों के सांस्कृतिक क्षेत्र पर समावेशिता को बढ़ावा देना है : डॉ जोशी

19 Feb 2026 20:58:53
आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ सच्चिदानंद जोशी अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन को संबोधित करते हुए


नई दिल्ली, 19 फरवरी (हि.स.)। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के सदस्य सचिव डॉ सच्चिदानंद जोशी ने गुरुवार को कहा कि भारत की नीति पड़ोसी देशों के सांस्कृतिक क्षेत्र पर साम्राज्यवाद स्थापित करना नहीं बल्कि समावेशिता को बढ़ावा देना है।

डॉ जोशी ने यह बात आज नई दिल्ली स्थित आईजीएनसीए के बृहत्तर भारत एवं क्षेत्र अध्ययन विभाग की ओर से आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के समापन के अवसर पर कही। यह कार्यक्रम 'भारत और मंगोलिया के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान' विषय पर आधारित था। इसका उद्देश्य भारत और ‘बृहत्तर भारत’ की परिधि में आने वाले देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर चर्चा कराना था।

समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ जोशी ने कहा, भारत- मंगोलिया के बीच सांस्कृतिक संबंध हमेशा से मजबूत रहे हैं। ‘बृहत्तर भारत’ की मूल भावना यही है कि हम अपने पड़ोसी देशों में उन जड़ों को तलाशें, जिनमें संस्कृति, समाजशास्त्र, दर्शन, मनोविज्ञान और यहां तक कि राजनीति के स्तर पर भी समानताएं मौजूद हैं। ऐसे कार्यक्रम हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए भारत-मंगोलिया सम्बंधों के अध्ययन का मार्ग प्रशस्त करेंगे।

उन्होंने देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों, संस्थानों और महाविद्यालयों में सांस्कृतिक संबंधी शोध, कार्यशालाएं और प्रदर्शनी आयोजित करने तथा शिलालेखों, पाण्डुलिपियों और अन्य दस्तावेज़ों के अध्ययन को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में पड़ोसी देशों के साथ सांस्कृतिक संबंध और अधिक सुदृढ़ होंगे।

आईजीएनसीए की ट्रस्टी और सम्मेलन की संयोजक प्रो. निर्मला शर्मा ने पाण्डुलिपि संरक्षण, बौद्ध अध्ययन, सांस्कृतिक अनुसंधान और शैक्षिक आदान-प्रदान के क्षेत्र में संयुक्त परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।

आईजीएनसीए के बृहत्तर भारत एवं क्षेत्र अध्ययन विभाग के प्रमुख प्रो. धर्म चंद चौबे ने कहा कि यह सम्मेलन भारत–मंगोलिया सम्बंधों को और अधिक सुदृढ़ बनाने तथा भविष्य में संयुक्त शोध एवं सांस्कृतिक परियोजनाओं के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा।

उल्लेखनीय है कि इस सम्मेलन का उद्घाटन बुधवार को केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने किया था। उन्होंने इस सम्मेलन को केवल अकादमिक अभ्यास भर नहीं, बल्कि साझा आध्यात्मिक और कलात्मक परम्पराओं तथा निरंतर सांस्कृतिक प्रवाह से प्रेरित बताया। उन्होंने भारत और मंगोलिया के बीच ऐतिहासिक आदान–प्रदान के बारे में बताते हुए कहा कि है कि दोनों सभ्यताओं ( भारत- मंगोलिया) के बीच आध्यात्मिक आदान–प्रदान के साथ–साथ वैज्ञानिक ज्ञान भी प्रवाहित हुआ। मंगोलियाई कंजूर को उन्होंने दोनों देशों के लोगों के बीच एक पवित्र सेतु बताया।

18–19 फरवरी को आयोजित इस सम्मेलन में भारत और मंगोलिया के विद्वानों, शोधकर्ताओं, सांस्कृतिक विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और नीति-निर्माताओं ने भाग लेकर दोनों देशों के बहुआयामी सांस्कृतिक संबंधों पर व्यापक विचार-विमर्श किया।

इस मौके पर मंगोलिया के पूर्व राजदूत और भारतीय अध्ययन केंद्र (सीआईएस) के निदेशक प्रो. ओ. न्यामदाव्वा सहित अन्य देशों से आए कई प्रतिनिधि मौजूद रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी

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