कंचनवन में रंग अबीर खेलने के साथ मिथिलांचल में होली का औपचारिक आगाज

23 Feb 2026 21:54:53
कंचनवन में होली का आयोजन


काठमांडू, 23 फरवरी (हि.स.)। त्रेता युग में भगवान श्रीराम और सीता द्वारा होली खेले जाने की स्मृति में नेपाल के महोत्तरी जिले के कंचनवन में मिथिला मध्यमा परिक्रमा में रंग अबीर की होली खेले जाने के साथ ही मिथिलांचल में होली की औपचारिक शुरुआत हो गई।

मिथिला का महाकुंभ मानी जाने वाली 15 दिवसीय मिथिला मध्यमा परिक्रमा के अंतर्गत मिथिला बिहारी की डोला के साथ कंचनवन पहुंचे श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे को रंग-अबीर लगाकर तथा भगवान राम से जुड़े होली गीत गाकर पर्व मनाया।

इस होली समारोह में मधेश प्रदेश के मुख्यमंत्री कृष्णप्रसाद यादव, भंगहा नगरपालिका के मेयर संजीव साह सहित विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, मठ-मंदिरों के महंत और साधु-संतों की विशेष उपस्थिति रही।

संस्कृतिविदों के अनुसार कंचनवन में रंग खेलने के साथ ही मिथिलांचल क्षेत्र में होली पर्व की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है। परंपरा है कि परिक्रमा टोली जैसे ही कंचनवन पहुंचती है, होली खेली जाती है।

फागुन शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होने वाली यह परिक्रमा फागुन शुक्ल सप्तमी के दिन ध्रुवकुंड से कंचनवन पहुंचती है। धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाने वाले कंचनवन में इच्छावती गंगा और वीरजा गंगा के संगम स्थल होने की मान्यता है।

किंवदंती है कि इच्छावती नदी ने भगवान राम को होली उत्सव मनाने में सहयोग किया था और इसी स्थल पर राम-जानकी ने होली खेली थी। इसी कारण कंचनवन को मिथिलांचल की सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है।

इस वर्ष की परिक्रमा जनकपुरधाम स्थित हनुमान नगर से डोला के साथ प्रारंभ हुई थी। परिक्रमा टोली कल्याणेश्वर, गिरिजास्थान, मटिहानी, जलेश्वर, मडै होते हुए पुनः ध्रुवकुंड पहुंचकर कंचनवन आई। तीर्थयात्रियों ने मार्गभर भजन-कीर्तन, आरती और धार्मिक अनुष्ठान करते हुए यात्रा पूरी की।

कंचनवन की होली की प्राचीनता और सांस्कृतिक महत्व को ध्यान में रखते हुए बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् पिछले कुछ वर्षों से यहां औपचारिक रूप से होली महोत्सव का आयोजन कर रही है। परिषद के अनुसार कंचनवन को धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने के उद्देश्य से कार्यक्रम को अधिक व्यवस्थित और आकर्षक बनाया गया है।

कंचनवन से परिक्रमा टोली धनुषा के पर्वता, धनुषाधाम, सतोषर और औरही में एक-एक रात विश्राम करते हुए पूर्णिमा से एक दिन पहले जनकपुरधाम पहुंचती है। पूर्णिमा के दिन जनकपुरधाम में नगर परिक्रमा (अंतर्गृह परिक्रमा) कर होली खेलते हुए 15 दिवसीय यात्रा का समापन किया जाता है।

सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और चारधाम के दर्शन के बराबर फल प्राप्त होने की आस्था के साथ श्रद्धालु इस धर्मयात्रा में नेपाल के 107 किलोमीटर और भारत के 26 किलोमीटर सहित कुल 133 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हैं।

नेपाल और भारत के सामाजिक सद्भाव के सेतु के रूप में मानी जाने वाली इस परिक्रमा में धार्मिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व निहित है। इसमें नेपाल और भारत से एक लाख से अधिक साधु-संत तथा गृहस्थ श्रद्धालु भाग लेते हैं।

परिक्रमा में सहभागी श्रद्धालुओं को 15 विश्राम स्थलों तक नंगे पांव पैदल चलना पड़ता है और बिना लहसुन-प्याज का भोजन करना होता है, जिससे इसे एक कठोर धार्मिक यात्रा माना जाता है।

साथ ही परिक्रमा अवधि के दौरान यात्री गृह प्रवेश नहीं करते और खुले आकाश के नीचे तंबू लगाकर वनवासी जीवन व्यतीत करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस परिक्रमा में भाग लेने से मन, वचन और कर्म से हुए पाप नष्ट होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / पंकज दास

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