पाकिस्तान में ‘ब्लास्फेमी बिजनेस’ का विस्तार, फर्जी डिजिटल सबूतों के सहारे दर्ज हो रहे मामले

25 Feb 2026 21:23:53

इस्लामाबाद, 25 फरवरी (हि.स.)। पाकिस्तान में डिजिटल माध्यमों से कथित ईशनिंदा (ब्लास्फेमी) के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। मानवाधिकार संगठनों ने इसे “ब्लास्फेमी बिजनेस” करार देते हुए कहा है कि फर्जी सबूत, एडिट किए गए स्क्रीनशॉट और झूठे गवाहों के आधार पर लोगों को गंभीर धाराओं में फंसाया जा रहा है।

लाहौर उच्च न्यायालय की रावलपिंडी पीठ ने दिसंबर 2025 में एक डिजिटल ईशनिंदा मामले में उम्रकैद या मौत की सजा पाए छह लोगों को बरी कर दिया था। अदालत ने अपने अवलोकन में ऐसे मामलों में बढ़ते दुरुपयोग और अप्रमाणित डिजिटल सामग्री के इस्तेमाल पर चिंता जताई थी।

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज्ड हेट की एक की एक रिपोर्ट में शोध निदेशक नियाला मोहम्मद और क्रिश्चियन सॉलिडेरिटी वर्ल्डवाइड से जुड़े सेसिल शेन चौधरी ने लिखा कि अब ईशनिंदा के आरोप “संगठित जालसाजी” का रूप ले चुके हैं। रिपोर्ट के अनुसार, खासतौर पर धार्मिक अल्पसंख्यक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोग निशाना बनते हैं, जिन्हें केस रद्द कराने या समझौते के लिए बिचौलियों को भुगतान करने के लिए दबाव डाला जाता है।

रिपोर्ट में रावलपिंडी के एक युवक का मामला भी सामने आया, जिसे नौकरी के नाम पर व्हाट्सऐप के जरिए जाल में फंसाया गया। कथित रूप से एक महिला भर्ती अधिकारी बनकर संपर्क करने वाले व्यक्ति ने आपत्तिजनक तस्वीर साझा की, जिसमें धार्मिक सामग्री जोड़ी गई थी। बाद में उसी तस्वीर को आधार बनाकर युवक पर ईशनिंदा का आरोप लगा दिया गया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान दंड संहिता की धारा 295-सी, जिसमें पैगंबर के अपमान पर मौत की सजा का प्रावधान है, के चलते ऐसा माहौल बन गया हैस जहां अपुष्ट आरोप भी गिरफ्तारी, भीड़ हिंसा या न्यायेतर हत्या का कारण बन सकते हैं। 1994 से 2024 के बीच ईशनिंदा के आरोपों के बाद कम से कम 104 लोगों की न्यायेतर हत्या होने का उल्लेख किया गया है।

आरोप है कि फेडरल इंवेस्टीगेशन एजेंसी (एफआईए) के साइबर क्राइम विंग द्वारा कई मामलों में बिना फॉरेंसिक जांच के शिकायत दर्ज की गई। वहीं कुछ निजी सतर्कता समूह, जिनके संबंध तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) जैसे कट्टरपंथी संगठनों से बताए जाते हैं, ऑनलाइन ईशनिंदा मामलों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनसीएचआर) के अनुसार, सोशल मीडिया सामग्री के आधार पर सैकड़ों युवाओं और कमजोर वर्ग के लोगों पर आरोप लगाए गए हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईसाई, अहमदी, हिंदू, सिख और शिया मुस्लिम समुदाय विशेष रूप से संवेदनशील स्थिति में हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि संगठित नेटवर्क, सांप्रदायिक तनाव और कानून के दुरुपयोग के चलते यह समस्या जटिल होती जा रही है। भीड़ हिंसा के मामलों में जवाबदेही तय करना भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है, जिससे पीड़ितों को न्याय मिलना कठिन हो जाता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / आकाश कुमार राय

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