
कहा-स्वातंत्रयवीर सावरकर को भारत रत्न मिला तो उस सम्मान का सम्मान ही बढ़ेगा
मुंबई, 08 फरवरी (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने रविवार को मुंबई में कहा कि समान नागरिक संहिता का विचार अच्छा है। विविधता में भी हमारा कोई विरोध नहीं है। यदि समानता से देश की एकता मजबूत होती है तो हमारा उसे समर्थन है। उन्होंने यह भी कहा कि स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न मिला तो उस सम्मान का सम्मान ही बढ़ेगा।
संघ प्रमुख डॉ. भागवत आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर मुंबई में आयोजित नए क्षितिज कार्यक्रम के दूसरे दिन के दूसरे सत्र को संबोधित कर रहे थे। संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में कहा कि समान नागरिक संहिता का विचार अच्छा है। विविधता में भी हमारा कोई विरोध नहीं है। यदि समानता से देश की एकता मजबूत होती है तो हमारा उसे समर्थन है। उसके लिए संघर्ष की स्थिति पैदा न हो। उत्तराखंड राज्य ने समान नागरिक संहिता के संबंध में पहले प्रस्ताव किया, फिर लोगों के सुझाव मांगे, तीन लाख सुझाव आए। उसके बाद उन्होंने कानून बनाया। कानून बन जाना पर्याप्त नहीं है। कानून का पालन होना चाहिए। इस सबके बावजूद हम विविधता में एकता के पक्षधर हैं। हम एक समाज है, हमें अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक मानकर विचार नहीं करना चाहिए। अलग-अलग होने पर हम सब अल्पसंख्यक ही हैं।
संघ प्रमुख डॉ. भागवत ने कहा कि बुद्ध ने अपने धर्म को भी सनातन धर्म ही कहा है। हिन्दू अपने आप में कोई धर्म नहीं है। सनातन धर्म की दो शाखाएँ-वैदिक धर्म और बौद्ध धर्म हैं। आज जो इस्लाम का स्वरूप दिख रहा है, वह मोहम्मद साहब का इस्लाम नहीं है। आज जो ईसाइयत है, वह ईसा मसीह की ईसाइयत नहीं है। आज का इस्लाम और ईसाइयत उनकी आध्यात्मिक अवधारणा को छोडक़र राजनीतिक वर्चस्व के रास्ते पर चल निकले हैं। वे सच्चे इस्लाम और सच्ची ईसाइयत की ओर लौटें, इसकी आवश्यकता है। हिंदू को सबको अपनेपन और शांति की बात करनी है। हिंदू के बारे में बस इतना हो जाए कि इनका कोई बाल-बाँका नहीं कर सकता।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में कोई एकाकी नहीं रह सकता, अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर डील करनी ही पड़ती है। उसमें कुछ लेना पड़ता है तो कुछ छोडऩा भी पड़ता है। अपने हित में क्या है, इसका ध्यान रखना ही चाहिए। हमें विश्वास है कि वर्तमान समय में उसका ध्यान रखा ही गया होगा। पिछले 10 वर्षों का जो एडमिनिस्ट्रेशन है, वह अड़नेवाला और तन कर खड़ा रहने वाला है। ज्ञान तो सारी दुनिया से आना चाहिए, परंतु जो लेना है, परिक्षण करके लेना चाहिए। बिना अपने देश की आकांक्षा, परंपरा और किसानों के हित को जाने, नया है इसलिए बराबर स्वीकार कर लेना ठीक नहीं। इसलिए हमारा संवेदनशील होना ठीक है।
उन्होंने कहा कि भाजपा के सत्ता में आने से हमारे अच्छे दिन शुरू हुए, ऐसा नहीं है। बल्कि उसका उल्टा है। हम राम मंदिर के पक्ष में खड़े हुए, जो राजनीतिक पक्ष उस पक्ष में खड़े हुए, उसको लाभ हुआ। बाकी दलों के लोग साथ नहीं आए। आपातकाल, गुरूजी जन्मशती, राम मंदिर आंदोलन का आदि के माध्यम से आप सभी के सहयोग और स्वयंसेवकों के पुरूषार्थ से ही हमारे अच्छे दिन आए हैं। उसका लाभ हमारा समर्थन करने वालों को मिला है। कम्युनिस्ट पार्टी का 100 वर्षों में विस्तार नहीं हुआ, यह प्रश्न उनसे पूछना चाहिए। अगर वे हमसे आकर पूछते हैं, तो हम उनका मार्गदर्शन करने को तैयार हैं। सिद्धांतहीन राजनीति चल जाती है, इसलिए चलाते हैं। जब पता चलेगा कि नहीं चलेगी तो वे करना बंद कर देंगे। संस्कृत बोलनी चाहिए, भाषा वही जीवित रहती है, जो चलन में रहती है। जेन जी भी यह समझ रही है कि आइडेंटिटी नाम की एक चीज है। हम नई पीढ़ी को उनकी भाषा में अपनी थाती सौंप सकते हैं क्या? क्या जो हिन्दुत्व हम उन्हें सौंपना चाहते हैं, वह हिन्दुत्व हम समझ चुके हैं। नई पीढ़ी को देने के लिए हमें तैयार होना है। रेव पार्टी के स्थान पर सत्संग पार्टी का चलन शुरू हुआ, यह हमने नहीं किया, सहजता से यह परिवर्तन हुआ।
संघ प्रमुख ने कहा कि फास्डफूड खाने के लिए कोई कानून नहीं लाया गया, तो उसे बैन करने के लिए कानून क्यों लाना चाहिए। फास्डफूड लालच के चलते आया। खुद पर संयम रखकर उससे दूर रहना, यही एक उपाय है। हर काम संघ को ही करना चाहिए, ऐसा नहीं है। चरित्रवान समाज के निर्माण का हमारा काम हम पूरा समय देकर भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं। पेरिस समझौते के वादों को सबसे पहले पूरा करने में भारत सर्वप्रथम है। पर्यावरण के बारे में केवल संघ को विचार नहीं करना है। सारे समाज को विचार करना चाहिए। हालांकि पर्यावरण संरक्षण हमारी गतिविधियों में से एक है।
उन्होंने कहा कि संघ चिर तरूण संगठन है। संघ की औसत आयु आज की तारीख में 28 साल है। हम चाहते हैं कि यह 25 साल के भीतर आ जाए। संघ केवल शाखा चलाने का कार्य करता है। संघ कोई गुरूकुल नहीं चलाता, चलाएगा भी नहीं। संघ के स्वयंसेवक गुरुकुल चलाते हैं, समाज के लोग गुरूकुल चलाते हैं तो संघ उनकी सहायता करता है। भारतीय शिक्षण मंडल के माध्यम से देश भर में गुरूकुल आदि का संचालन किया जाता है। सरकार के माध्यम से भी शिक्षा क्षेत्र में परिवर्तन के प्रयास किए जा रहे हैं। वैचारिक और राजनीतिक विरोध के चलते राज्य स्तर पर उसमें अवरोध नहीं पैदा किये जाने चाहिए। ध्येय के लिए आत्मीयतापूर्ण वातावरण से स्व अनुशासन ही संघ के कार्य का आधार है। संघ का कार्य पहुंचाने के लिए संघ के स्वयंसेवक को ही वहां पहुंचना होता है। संघ को समझना है तो परसेप्शन या प्रोपेगेंडा से नहीं खुद के अनुभव के आधार पर समझिए। अपने बारे में, अपनी पहचान के बारे में, अपने देश के बारे में स्पष्ट कल्पना कर सक्रिय हो जाइये, यही मेरा आप सभी से आह्वान है।
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हिन्दुस्थान समाचार / राजबहादुर यादव