संघ और भारत की यात्रा अलग-अलग नहीं : आंबेकर

युगवार्ता    18-Mar-2026
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नई दिल्ली, 18 मार्च (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने बुधवार को कहा कि संघ और भारत की यात्रा अलग-अलग नहीं है। उन्होंने कहा कि नए भारत में लोग दर्शक नहीं, सहभागिता करना चाहते हैं। संघ में महिलाओं के भयमुक्त होकर नेतृत्व पर विचार किया जाता है।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों में विकसित होने वाले छात्र नेतृत्व को अंततः राष्ट्र सेवा की दिशा मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में हम भारत की संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं की और अधिक प्रभावी भागीदारी और नेतृत्व देखेंगे। ये विचार उन्होंने आज डॉ. शोभा विजेंद्र द्वारा लिखित पुस्तक ‘शतायु संघ और महिला सहभागिता’ के लोकार्पण के अवसर पर व्यक्त किए।

एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने आगे कहा कि शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक और समसामयिक विषयों पर सार्थक बौद्धिक जुड़ाव एक रचनात्मक विमर्श को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने इस पुस्तक को इस दिशा में एक विचारशील और सामयिक योगदान बताया।

इस अवसर पर दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता, राष्ट्र सेविका समिति की दिल्ली प्रांत कार्यवाहिका स्मिता भाटिया, पीयूष सहित कई गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत पुष्पांजलि से हुई, जिसमें दिल्ली विधानसभा के माननीय उपाध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट, विधायक भी शामिल हुए।

1925 में डॉ. केबी हेडगेवार द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के बाद से इसके विकास पर प्रकाश डालते हुए आंबेकर ने कहा कि 'व्यक्ति निर्माण' इस यात्रा के केंद्र में रहा है। उन्होंने रेखांकित किया कि 1936 में लक्ष्मीबाई केलकर के नेतृत्व में 'राष्ट्र सेविका समिति' की स्थापना इस विजन का एक स्वाभाविक और आवश्यक विस्तार था, जिससे महिलाओं की भागीदारी को संघ के साथ बढ़ने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि परिवार और समाज में महिलाओं की भूमिका सदैव मौलिक रही है और उनके योगदान को समझने के लिए भारत के सभ्यतागत दृष्टिकोण को गहराई से समझना आवश्यक है।

आंबेकर ने कहा कि जितना पवित्र पुरुष है उतनी ही महिला है, यह हमारी संस्कृति में है। धर्म के अनुसार समस्या का समाधान किया गया है। अपने धर्म की समझ के अभाव में समस्या उत्पन्न हुई है। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में महिलाएं पहले से ही सक्रिय भूमिका निभा रही है। आज की पीढ़ी ज्यादा समझदार है,वह पूरी दुनिया को देख रहे हैं।

आंबेकर ने कहा कि बाजारों के हिसाब से परिवारों का गठन नहीं होगा। भारत के लोग अपने विचार से संस्कृति गढ़ते हैं। वह भारत होगा। आज मॉडल देश हमारे योग अपना रहे है। उन्होंने कहा कि नए जमाने के मुताबिक भारत बनाएगा। संघ अपनी पद्धति से काम करता है।

मां से जितना प्यार करते हैं, उतना ही प्यार भारत माता से करते हैं।

समारोह को संबोधित करते हुए दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि आज जब हम परंपरा और प्रगति के मोड़ पर खड़े हैं, यह पुस्तक हमें याद दिलाती है कि हमारे राष्ट्र की असली ताकत हमेशा महिलाओं की समान भागीदारी पर टिकी रही है। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि नवरात्रि की पूर्व संध्या पर इस पुस्तक का विमोचन अत्यंत प्रतीकात्मक है, क्योंकि यह पर्व 'नारी शक्ति' के सर्वोच्च स्वरूप मां दुर्गा की आराधना का है।

गुप्ता ने आगे कहा कि संघ के वैचारिक ढांचे ने महिलाओं को सदैव राष्ट्र-निर्माण की सह-निर्मात्री और सामाजिक प्रेरणा के अटूट स्रोत के रूप में देखा है।

गुप्ता ने डॉ. शोभा विजेंद्र द्वारा रचित इस कृति को एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक योगदान बताया, जो संघ की शताब्दी यात्रा में महिलाओं की उस भूमिका को संकलित करती है जिसकी अक्सर चर्चा कम होती है। उन्होंने कहा, राष्ट्र सेविका समिति के शुरुआती वर्षों से लेकर आज तक, महिलाएं हमारे सांस्कृतिक मूल्यों और राष्ट्रीय चेतना की रक्षक रही हैं। अध्यक्ष ने विश्वास व्यक्त किया कि यह पुस्तक केवल सैद्धांतिक नहीं बल्कि जीवंत अनुभवों का दस्तावेज है, जो युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने और 'विकसित भारत' के प्रति उनके कर्तव्यों का बोध कराने में सहायक होगी।

पुस्तक की लेखिका और प्रसिद्ध समाज सेविका डॉ. शोभा विजेंद्र ने अपनी कृति का सार प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह पुस्तक भ्रांतियों को दूर करने और विलक्षण एकात्मता के विचार को प्रस्तुत करने का एक प्रयास है। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, कुछ लोग संघ को महिला विरोधी बताने का प्रयास करते हैं, लेकिन मेरा अपना जीवन एक संघ परिवार में जन्म लेना और पलना, उस संस्कृति का प्रमाण है जिसने मेरे जन्म से ही मेरी शिक्षा, स्वतंत्रता और समानता को प्राथमिकता दी, वह भी उन समयों में जब ये आधुनिक विमर्श का हिस्सा नहीं थे। उन्होंने आगे विस्तार से बताया कि यह पुस्तक डॉ. बी.आर. अंबेडकर और आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत द्वारा प्रतिपादित समानता के भारतीय दृष्टिकोण को रेखांकित करती है, जहां स्वतंत्रता और समानता उधार लिए गए शब्द नहीं बल्कि धर्म और बंधुत्व में निहित हैं।

राष्ट्र सेविका समिति की दिल्ली प्रांत कार्यवाहिका स्मिता भाटिया ने अपने संबोधन में परिवार और समाज को आकार देने में महिलाओं की मौलिक भूमिका पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि किसी भी संस्थान की मजबूती महिलाओं के उस मौन लेकिन निरंतर योगदान पर टिकी होती है, जो मूल्यों और सामूहिक उद्देश्य की भावना को सींचती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सेवा की भावना घर से शुरू होती है और महिलाएं इसकी नैतिक और भावनात्मक धुरी होती हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / धीरेन्द्र यादव

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