नेपाल में पूर्व प्रधानमंत्री ओली, लेखक और प्रधान सेनापति के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश

21 Mar 2026 15:00:53
मानवाधिकार आयोग के द्वारा रिपोर्ट सौंपते हुए


काठमांडू, 21 मार्च (हि.स.)। नेपाल में पिछले वर्ष 8 एवं 9 सितंबर को जेन-जी आंदोलन के दौरान की घटनाओं की जांच के लिए राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग द्वारा गठित समिति ने तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा 'ओली', तत्कालीन गृहमंत्री रमेश लेखक, प्रधान सेनापति अशोकराज सिग्देल सहित राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सभी पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है। समिति ने अपनी जांच रिपोर्ट आयोग के अध्यक्ष तपबहादुर मगर के समक्ष प्रस्तुत की।

आयोग की सदस्य डॉ. लिली थापा के संयोजकत्व में यह जांच समिति जेन-जी आंदोलन के दौरान हुए मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच के लिए गठित की गई थी। आयोग के प्रवक्ता टीकाराम पोखरेल ने बताया, “समिति ने अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष को सौंप दी है। अब आयोग की पूर्ण बैठक में इस पर निर्णय लिया जाएगा।”

जांच रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि जेन-जी आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से निभाने में असफल रही। रिपोर्ट के अनुसार परिषद पर देश की सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी होने के बावजूद वह घटनाओं की गंभीरता का सही आकलन कर उपयुक्त सुरक्षा योजना बनाने और उसे लागू करने में विफल रही।

सूत्रों के अनुसार रिपोर्ट में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के पदाधिकारियों सहित कई लोगों को मानवाधिकार उल्लंघन के लिए दोषी ठहराते हुए कार्रवाई की सिफारिश की गई है। आयोग द्वारा रिपोर्ट पारित होने के बाद सिफारिशों के कार्यान्वयन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बनने वाली राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में रक्षा मंत्री, गृहमंत्री, विदेश मंत्री, वित्त मंत्री, मुख्य सचिव और प्रधान सेनापति सदस्य होते हैं, जबकि रक्षा मंत्रालय के सचिव सदस्य-सचिव होते हैं।

आंदोलन के समय ओली बतौर प्रधानमंत्री परिषद के अध्यक्ष थे। परिषद में तत्कालीन उपप्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्री विष्णुप्रसाद पौडेल, गृहमंत्री रमेश लेखक, विदेश मंत्री डॉ. आरजू राणा देउवा, रक्षा मंत्री मानवीर राई, मुख्य सचिव एकनारायण अर्याल तथा प्रधानसेनापति अशोक सिग्देल सदस्य थे।

परिषद के पदाधिकारियों के खिलाफ मानव अधिकार आयोग अधिनियम और अन्य कानूनों के तहत कार्रवाई की सिफारिश की गई है।

आयोग ने जांच के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री ओली, गृहमंत्री लेखक, संचार मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुंग, नेपाल पुलिस के महानिरीक्षक चन्द्रकुवेर खापुङ, सशस्त्र पुलिस बल के महानिरीक्षक राजु अर्याल सहित कई अधिकारियों के बयान दर्ज किए। इसके अलावा पूर्व गृहमंत्री रवि लामिछाने, काठमांडू तत्कालीन मेयर बालेन्द्र शाह, कलाकार दीपकराज गिरी और निश्चल बस्नेत से भी पूछताछ की गई। हालांकि प्रधान सेनापति अशोकराज सिग्देल को बयान के लिए बुलाया गया था, लेकिन वे उपस्थित नहीं हुए।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि विशेष सुरक्षा योजना लागू नहीं की जा सकी और आंदोलन को नियंत्रित करने के दौरान चरणबद्ध तरीके से बल प्रयोग करने के बजाय एक साथ अत्यधिक बल और घातक हथियारों का इस्तेमाल किया गया। इसमें शामिल लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की सिफारिश की गई है।

आयोग ने 300–400 संदेश, वीडियो और ऑडियो का अध्ययन किया तथा फोरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर घटनाओं का गहन विश्लेषण किया।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार 8 सितंबर 2025 को पुलिस गोलीबारी में मारे गए अधिकांश लोगों को कमर के ऊपर गोली लगी थी।

जांच में काठमांडू महानगरपालिका की भूमिका और रवि लामिछाने के जेल से बाहर आने के दौरान हुए मानवाधिकार मुद्दों को भी शामिल किया गया। आयोग ने इन दोनों से बयान लेकर उनकी भूमिका पर चर्चा की।

डॉ. लिली थापा के नेतृत्व में 6 सदस्यीय समिति ने 600 पृष्ठ से अधिक की रिपोर्ट तैयार की है, जबकि परिशिष्ट सहित कुल रिपोर्ट लगभग 10,000 पृष्ठों की है।

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हिन्दुस्थान समाचार / पंकज दास

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