
नई दिल्ली, 23 मार्च (हि.स)। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) और राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के प्रमुख सुरक्षा उपायों से सहकारी बैंकों का संचालन सुदृढ़ हुआ है। केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने सोमवार को लोकसभा में यह जानकारी दी।
पंकज चौधरी ने लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में बताया कि बैंकिंग विनियमन अधिनियम और बहु-राज्य सहकारी समितियां (एमएससीएस) अधिनियम, 2002 में संशोधन से निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ी है। उन्होंने कहा कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) और राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) का नियामक और पर्यवेक्षी ढांचा यह सुनिश्चित करता है कि सहकारी बैंक वित्तीय पारदर्शिता के साथ कार्य करें।
वित्त राज्य मंत्री ने सदन को बताया कि इस संबंध में कई उपाय किए गए हैं, जिनमें अन्य बातों के अलावा निम्नलिखित बातें शामिल हैं :-
पंकज चौधरी ने कहा कि पारदर्शिता सुनिश्चित करने और जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करने के लिए सरकार ने बैंकिंग विनियमन अधिनियम में संशोधन किया है, ताकि सहकारी बैंकों के निदेशक मंडल (अध्यक्ष और पूर्णकालिक निदेशकों को छोड़कर) का कार्यकाल अधिकतम 10 वर्ष तक निर्धारित किया जा सके।
इसके साथ ही बहुराज्यीय सहकारी समितियां (एमएससीएस) अधिनियम, 2002 में संशोधन करके सहकारी लोकपाल की नियुक्ति का प्रावधान शामिल किया गया है, जो एमएससीएस के सदस्यों की जमा राशि, बहुराज्यीय सहकारी समिति के कामकाज के न्यायसंगत लाभों या संबंधित सदस्यों के व्यक्तिगत अधिकारों को प्रभावित करने वाले किसी अन्य मुद्दे के संबंध में शिकायतों या अपीलों से निपटता है। वहीं, संचालन और जवाबदेही को सुदृढ़ करने के लिए सहकारी चुनाव प्राधिकरण की स्थापना की गई है, जिसे सभी बहुराज्यीय सहकारी समितियों में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का दायित्व सौंपा गया है।
उन्होंने बताया कि आरबीआई ने सहकारी बैंकों के लिए धोखाधड़ी प्रबंधन पर मास्टर दिशा-निर्देश 2024 में जारी किए थे और इनमें धोखाधड़ी की रिपोर्टिंग, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन, संचालन तंत्र, प्रारंभिक चेतावनी तंत्र का कार्यान्वयन, कर्मचारियों की जवाबदेही, तीसरे पक्ष की जिम्मेदारी का निर्धारण और बाहरी तथा आंतरिक लेखा परीक्षकों की भूमिका आदि से संबंधित व्यापक दिशानिर्देश शामिल हैं।
पंकज चौधरी ने कहा कि आरबीआई के त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई (पीसीए) ढांचे के तहत चिन्हित सहकारी बैंकों को अपनी वित्तीय स्थिति को बहाल करने और जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करने के लिए समय पर उपचारात्मक उपाय शुरू करने और लागू करने की आवश्यकता होती है।
उन्होंने बताया कि नाबार्ड ने राज्य सहकारी बैंकों (एसटीसीबी) और जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (डीसीसीबी) के वित्तीय प्रदर्शन में सुधार लाने और घाटे को रोकने/कम करने के लिए टर्न अराउंड प्लान (टीएपी) लागू किया है। टीएपी का उद्देश्य वित्तीय घाटे को कम करना और इन सहकारी बैंकों के समग्र स्वास्थ्य में सुधार करना है। इसके लिए एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाया गया है जिसमें वित्तीय मापदंडों की समीक्षा और निगरानी, व्यवसाय विविधीकरण, आंतरिक जांच और नियंत्रण, संचालन, लागत युक्तिकरण, मानव संसाधन विकास, प्रौद्योगिकी को अपनाना, वित्तीय समावेशन आदि शामिल हैं।
आरबीआई ने बैंकों (सहकारी बैंकों सहित) के खाताधारकों के लिए डीआईसीजीसी के माध्यम से जमा बीमा के रूप में एक वित्तीय सुरक्षा जाल लागू किया है, जिसमें सहकारी बैंकों में प्रति जमाकर्ता 5,00,000 रुपये तक की विभिन्न प्रकार की जमा राशि (मूलधन और ब्याज सहित) का बीमा किया जाता है। आरबीआई ने शहरी सहकारी बैंकों में जोखिम आधारित आंतरिक लेखापरीक्षा (आरबीआईए) प्रणाली के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रजेश शंकर